पेड़ों की कटाई पर 9 साल पुरानी याचिका खत्म, हाईकोर्ट ने दिया नया तरीका

जबलपुर (म.प्र.)

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जबलपुर हाईकोर्ट का निर्देश- पहले 25-25 फलदार पौधे लगाएं याचिकाकर्ता, फिर कटे पेड़ों और पौधरोपण का जुटाएं आंकड़ा

मध्य प्रदेश में सड़क और दूसरे विकास कार्यों के दौरान पेड़ों की कटाई को लेकर करीब नौ साल से चल रही दो याचिकाओं पर जबलपुर हाईकोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई करते हुए उनका निराकरण कर दिया। अदालत ने मामले को केवल आरोपों और दावों तक सीमित रखने के बजाय याचिकाकर्ताओं को पहले अपने स्तर पर पौधरोपण करने और फिर प्रदेश में पेड़ों की कटाई तथा नए पौधे लगाए जाने की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने को कहा है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने दोनों याचिकाकर्ताओं को 25-25 फलदार पौधे लगाने और इसकी रिपोर्ट अदालत के सामने रखने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद सड़क निर्माण समेत दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए कितने पेड़ काटे गए और उसके बदले कितने पौधे लगाए गए, इसका ठोस आंकड़ा जुटाया जाए। अभी याचिकाओं में इस संबंध में कोई ऐसा विस्तृत डेटा नहीं है, जिसके आधार पर पूरे प्रदेश की स्थिति का आकलन किया जा सके।

कोर्ट की टिप्पणी में यह बात भी सामने आई कि केवल यह कहना कि विकास कार्यों के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं और बदले में पौधरोपण नहीं हो रहा, पर्याप्त नहीं है। जमीनी स्थिति का अध्ययन जरूरी है। दोनों याचिकाएं वर्ष 2018 में जबलपुर निवासी विवेक कुमार शर्मा और नीमच निवासी आनंद मनावत की ओर से अलग-अलग दायर की गई थीं। इनमें प्रदेश में पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सड़क निर्माण और दूसरे कामों के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन उनके अनुपात में पौधरोपण नहीं हो रहा। करीब नौ साल तक मामला अदालत में चलता रहा। इस दौरान प्रदेश में कई सड़क और हाईवे प्रोजेक्ट पूरे हुए, लेकिन अब भी यह स्पष्ट आंकड़ा अदालत के सामने नहीं था कि कुल कितने पेड़ हटाए गए और उनकी भरपाई के लिए कितने नए पौधे लगाए गए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पेड़ कटाई और पौधरोपण को लेकर उपलब्ध जानकारी के आधार पर व्यापक अध्ययन की जरूरत बताई। बेंच ने यह भी माना कि प्रदेश में केवल पेड़ों की कटाई हो रही है, ऐसा मान लेना भी सही तस्वीर नहीं होगी। इसके लिए अदालत ने इंदौर में बड़े स्तर पर हुए पौधरोपण का उदाहरण सामने रखा। वहां करीब 12 लाख पौधे लगाए जाने का उल्लेख किया गया। पिछले साल हुए इस बड़े अभियान की वर्षगांठ भी मनाई गई थी। इसी तरह जबलपुर नगर निगम की ओर से इस वर्ष 11 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य तय किए जाने की जानकारी भी सामने आई। ऐसे में कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग शहरों और इलाकों में पेड़ों की कटाई के साथ पौधरोपण की स्थिति को आंकड़ों के आधार पर देखना जरूरी है।

याचिकाकर्ताओं को अब अपने स्तर पर प्रदेश की स्थिति का अध्ययन करने को कहा गया है। इसमें सड़क निर्माण के दौरान काटे गए पेड़ों की संख्या, संबंधित परियोजनाओं के तहत लगाए गए पौधों का रिकॉर्ड और उनकी वास्तविक स्थिति जैसी जानकारियां जुटाई जा सकती हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर इस अध्ययन के बाद याचिकाकर्ताओं को लगता है कि कहीं नियमों का पालन नहीं हुआ है या पौधरोपण के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई हुई है, तो वे नए तथ्यों के साथ फिर अदालत आ सकते हैं। यानी पुरानी याचिकाओं में उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे बढ़ने के बजाय अब नए और सत्यापित आंकड़ों के आधार पर मामला उठाने का रास्ता खुला रखा गया है। इस दौरान याचिकाकर्ताओं को पहले 25-25 फलदार पौधे लगाने की जिम्मेदारी भी दी गई है। पौधरोपण के बाद उसकी रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी। इसके साथ ही पेड़ों की कटाई और नए पौधों की स्थिति पर अध्ययन किया जाना है।

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इन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान 1 मार्च 2025 को हाईकोर्ट की तीन जजों वाली फुल बेंच के एक पुराने फैसले का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि फुल बेंच ने 24 सितंबर 2015 की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया था, जिसके तहत 53 प्रजातियों के पेड़ों को काटने की अनुमति से जुड़ा प्रावधान था। याचिकाकर्ताओं का पक्ष इसी व्यापक मुद्दे से जुड़ा रहा कि विकास परियोजनाओं में पेड़ों को हटाने की अनुमति और उसके बदले पौधरोपण की व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है। लेकिन मौजूदा सुनवाई में अदालत ने आंकड़ों की कमी को अहम माना। करीब नौ वर्ष पहले दाखिल हुई याचिकाओं के दौरान जिस स्थिति को आधार बनाया गया था, वह अब काफी बदल चुकी है।

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इतने समय में नए हाईवे बने, सड़कें चौड़ी हुईं और कई निर्माण परियोजनाएं पूरी हुईं। ऐसे में पुराने आंकड़ों के आधार पर मौजूदा स्थिति तय करना आसान नहीं है। अदालत ने इसी वजह से वास्तविक और नए आंकड़े जुटाने पर जोर दिया। अब याचिकाकर्ताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई और पौधरोपण की स्थिति देखनी होगी। कितने पेड़ हटाए गए, किस परियोजना में हटाए गए, कितने पौधे लगाए गए और उनमें से कितने पौधे वास्तव में जीवित हैं, इस तरह के तथ्य अध्ययन का हिस्सा बन सकते हैं। पौधरोपण सिर्फ संख्या तक सीमित है या उसका जमीन पर असर भी दिखाई दे रहा है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

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14 Aug 2026 By Priyanka

पेड़ों की कटाई पर 9 साल पुरानी याचिका खत्म, हाईकोर्ट ने दिया नया तरीका

जबलपुर (म.प्र.)

मध्य प्रदेश में सड़क और दूसरे विकास कार्यों के दौरान पेड़ों की कटाई को लेकर करीब नौ साल से चल रही दो याचिकाओं पर जबलपुर हाईकोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई करते हुए उनका निराकरण कर दिया। अदालत ने मामले को केवल आरोपों और दावों तक सीमित रखने के बजाय याचिकाकर्ताओं को पहले अपने स्तर पर पौधरोपण करने और फिर प्रदेश में पेड़ों की कटाई तथा नए पौधे लगाए जाने की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने को कहा है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने दोनों याचिकाकर्ताओं को 25-25 फलदार पौधे लगाने और इसकी रिपोर्ट अदालत के सामने रखने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद सड़क निर्माण समेत दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए कितने पेड़ काटे गए और उसके बदले कितने पौधे लगाए गए, इसका ठोस आंकड़ा जुटाया जाए। अभी याचिकाओं में इस संबंध में कोई ऐसा विस्तृत डेटा नहीं है, जिसके आधार पर पूरे प्रदेश की स्थिति का आकलन किया जा सके।

कोर्ट की टिप्पणी में यह बात भी सामने आई कि केवल यह कहना कि विकास कार्यों के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं और बदले में पौधरोपण नहीं हो रहा, पर्याप्त नहीं है। जमीनी स्थिति का अध्ययन जरूरी है। दोनों याचिकाएं वर्ष 2018 में जबलपुर निवासी विवेक कुमार शर्मा और नीमच निवासी आनंद मनावत की ओर से अलग-अलग दायर की गई थीं। इनमें प्रदेश में पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सड़क निर्माण और दूसरे कामों के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन उनके अनुपात में पौधरोपण नहीं हो रहा। करीब नौ साल तक मामला अदालत में चलता रहा। इस दौरान प्रदेश में कई सड़क और हाईवे प्रोजेक्ट पूरे हुए, लेकिन अब भी यह स्पष्ट आंकड़ा अदालत के सामने नहीं था कि कुल कितने पेड़ हटाए गए और उनकी भरपाई के लिए कितने नए पौधे लगाए गए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पेड़ कटाई और पौधरोपण को लेकर उपलब्ध जानकारी के आधार पर व्यापक अध्ययन की जरूरत बताई। बेंच ने यह भी माना कि प्रदेश में केवल पेड़ों की कटाई हो रही है, ऐसा मान लेना भी सही तस्वीर नहीं होगी। इसके लिए अदालत ने इंदौर में बड़े स्तर पर हुए पौधरोपण का उदाहरण सामने रखा। वहां करीब 12 लाख पौधे लगाए जाने का उल्लेख किया गया। पिछले साल हुए इस बड़े अभियान की वर्षगांठ भी मनाई गई थी। इसी तरह जबलपुर नगर निगम की ओर से इस वर्ष 11 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य तय किए जाने की जानकारी भी सामने आई। ऐसे में कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग शहरों और इलाकों में पेड़ों की कटाई के साथ पौधरोपण की स्थिति को आंकड़ों के आधार पर देखना जरूरी है।

याचिकाकर्ताओं को अब अपने स्तर पर प्रदेश की स्थिति का अध्ययन करने को कहा गया है। इसमें सड़क निर्माण के दौरान काटे गए पेड़ों की संख्या, संबंधित परियोजनाओं के तहत लगाए गए पौधों का रिकॉर्ड और उनकी वास्तविक स्थिति जैसी जानकारियां जुटाई जा सकती हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर इस अध्ययन के बाद याचिकाकर्ताओं को लगता है कि कहीं नियमों का पालन नहीं हुआ है या पौधरोपण के नाम पर केवल कागजी कार्रवाई हुई है, तो वे नए तथ्यों के साथ फिर अदालत आ सकते हैं। यानी पुरानी याचिकाओं में उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे बढ़ने के बजाय अब नए और सत्यापित आंकड़ों के आधार पर मामला उठाने का रास्ता खुला रखा गया है। इस दौरान याचिकाकर्ताओं को पहले 25-25 फलदार पौधे लगाने की जिम्मेदारी भी दी गई है। पौधरोपण के बाद उसकी रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होगी। इसके साथ ही पेड़ों की कटाई और नए पौधों की स्थिति पर अध्ययन किया जाना है।

इन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान 1 मार्च 2025 को हाईकोर्ट की तीन जजों वाली फुल बेंच के एक पुराने फैसले का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि फुल बेंच ने 24 सितंबर 2015 की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया था, जिसके तहत 53 प्रजातियों के पेड़ों को काटने की अनुमति से जुड़ा प्रावधान था। याचिकाकर्ताओं का पक्ष इसी व्यापक मुद्दे से जुड़ा रहा कि विकास परियोजनाओं में पेड़ों को हटाने की अनुमति और उसके बदले पौधरोपण की व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी है। लेकिन मौजूदा सुनवाई में अदालत ने आंकड़ों की कमी को अहम माना। करीब नौ वर्ष पहले दाखिल हुई याचिकाओं के दौरान जिस स्थिति को आधार बनाया गया था, वह अब काफी बदल चुकी है।

इतने समय में नए हाईवे बने, सड़कें चौड़ी हुईं और कई निर्माण परियोजनाएं पूरी हुईं। ऐसे में पुराने आंकड़ों के आधार पर मौजूदा स्थिति तय करना आसान नहीं है। अदालत ने इसी वजह से वास्तविक और नए आंकड़े जुटाने पर जोर दिया। अब याचिकाकर्ताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई और पौधरोपण की स्थिति देखनी होगी। कितने पेड़ हटाए गए, किस परियोजना में हटाए गए, कितने पौधे लगाए गए और उनमें से कितने पौधे वास्तव में जीवित हैं, इस तरह के तथ्य अध्ययन का हिस्सा बन सकते हैं। पौधरोपण सिर्फ संख्या तक सीमित है या उसका जमीन पर असर भी दिखाई दे रहा है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/9-year-old-petition-on-cutting-of-trees-ended-high/article-61445

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