Bengal Assembly Election 2026: चुनावी समर से पहले BJP ने बदली रणनीति, दूसरे राज्यों से उतरे सीनियर नेता

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संगठनात्मक कलह सुलझाने, कमजोर सीटों पर पकड़ मजबूत करने और TMC से सीधी टक्कर की तैयारी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जमीनी स्तर पर अपनी तैयारी तेज कर दी है। पार्टी नेतृत्व ने इस बार पारंपरिक चुनावी तरीकों से अलग रास्ता अपनाते हुए दूसरे राज्यों से अनुभवी नेताओं को बंगाल में सक्रिय जिम्मेदारियां सौंप दी हैं। इन नेताओं को संगठनात्मक मजबूती, आंतरिक असंतोष दूर करने और कमजोर इलाकों में पार्टी की मौजूदगी बढ़ाने का दायित्व दिया गया है।

बीते कुछ हफ्तों से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा और कर्नाटक से आए वरिष्ठ भाजपा नेता राज्य के विभिन्न हिस्सों में लगातार दौरे कर रहे हैं। ये नेता मंडल और जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं और बूथ स्तर की रिपोर्ट सीधे केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचा रहे हैं। पार्टी का मानना है कि चुनाव से पहले संगठन की अंदरूनी कमजोरियों को दूर करना सबसे अहम है।

सूत्रों के अनुसार, इन नेताओं की तैनाती का मुख्य उद्देश्य पार्टी के भीतर गुटबाजी पर लगाम लगाना और स्थानीय नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है। 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP ने मजबूत प्रदर्शन किया था, लेकिन कई सीटों पर आंतरिक खींचतान और रणनीतिक चूक का नुकसान झेलना पड़ा था। पार्टी इस बार उसी अनुभव के आधार पर पहले से ही सुधारात्मक कदम उठा रही है।

इन “प्रवासी नेताओं” को क्षेत्रवार जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। उत्तर प्रदेश के मंत्री जेपीएस राठौर को पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर के कई विधानसभा क्षेत्रों की निगरानी सौंपी गई है। यूपी के पूर्व मंत्री सुरेश राणा उत्तर 24 परगना जिले में संगठन को मजबूत करने का काम देख रहे हैं। हरियाणा भाजपा के वरिष्ठ नेता संजय भाटिया को हुगली और हावड़ा क्षेत्र की जिम्मेदारी मिली है, जबकि राजस्थान के कैलाश चौधरी उत्तर बंगाल में पार्टी की तैयारियों पर नजर रख रहे हैं।

BJP के आंतरिक आकलन के मुताबिक, 2026 में सत्ता में आने के लिए पार्टी को करीब पांच प्रतिशत अतिरिक्त वोट शेयर की जरूरत है। 2021 में TMC और BJP के बीच वोट प्रतिशत का अंतर बड़ा रहा था, लेकिन भाजपा का मानना है कि सीमांत सीटों पर फोकस और बूथ स्तर की मजबूती से यह अंतर कम किया जा सकता है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बाहरी नेताओं की तैनाती से संगठनात्मक अनुशासन बढ़ सकता है, हालांकि भाषा और स्थानीय मुद्दों को समझना एक चुनौती रहेगा। इसी वजह से इन नेताओं के साथ स्थानीय भाजपा पदाधिकारी भी लगातार मौजूद रह रहे हैं, ताकि संवाद और रणनीति में तालमेल बना रहे।

फिलहाल, भाजपा नेतृत्व किसी भी तरह की ढिलाई नहीं चाहता। चुनाव से पहले का यह दौर पार्टी के लिए निर्णायक माना जा रहा है, जहां हर सीट और हर वोट पर बारीकी से नजर रखी जा रही है।

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