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DRDO का बड़ा कदम, मिसाइल निर्माण में निजी कंपनियों को मौका
Sandeep Patel
DRDO ने मिसाइल और निर्देशित हथियारों के विकास व उत्पादन के लिए भारतीय कंपनियों से साझेदारी की पेशकश की है, जिससे रक्षा निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने मिसाइल और निर्देशित हथियार प्रणालियों के विकास तथा उत्पादन में भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की पहल की है। इसके तहत हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने संभावित डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर्स (DcPPs) की पहचान के लिए कंपनियों से रुचि पत्र मांगा है।
चयनित कंपनियां DRDO द्वारा विकसित प्रणालियों के इंजीनियरिंग, सिस्टम इंटीग्रेशन, उत्पादन और जीवनचक्र सहायता में भूमिका निभा सकती हैं। यह कदम भारत की आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन नीति के अनुरूप है, जिसके तहत देश जटिल सैन्य प्रणालियों के घरेलू विकास और निर्माण क्षमता को बढ़ाना चाहता है।
निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ेगी
प्रस्तावित व्यवस्था में कंपनियों की भूमिका केवल उपकरण या पुर्जों की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगी।
चयनित कंपनियों को सिस्टम के असेंबली और इंटीग्रेशन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी और उत्पादन क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें गुणवत्ता नियंत्रण और गुणवत्ता आश्वासन की मजबूत व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी।
विकास और उपयोगकर्ता परीक्षण पूरा होने के बाद संबंधित कंपनियां DRDO द्वारा निर्धारित आपूर्ति श्रृंखला के साथ मिलकर उत्पादन प्रक्रिया में शामिल हो सकती हैं।
हालांकि, किसी कंपनी का संभावित DcPP के रूप में चयन अपने आप उत्पादन ऑर्डर की गारंटी नहीं देता।
मिसाइल निर्माण पर फोकस
RCI, DRDO के मिसाइल और रणनीतिक प्रणाली क्लस्टर की प्रमुख प्रयोगशालाओं में शामिल है।
यह क्लस्टर देश की विभिन्न मिसाइल और रणनीतिक हथियार परियोजनाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से इन तकनीकों को प्रयोगशाला स्तर से बड़े पैमाने के उत्पादन तक पहुंचाने की क्षमता मजबूत हो सकती है।
हाल के वर्षों में DRDO ने कई रक्षा परियोजनाओं में निजी कंपनियों को विकास और उत्पादन प्रक्रिया से जोड़ा है।
उत्पादन क्षमता जरूरी
रुचि पत्र में भाग लेने वाली कंपनियों के लिए तकनीकी और उत्पादन क्षमता से जुड़ी कई शर्तें रखी गई हैं।
कंपनियों को जटिल रक्षा प्रणालियों के सिस्टम इंटीग्रेशन का अनुभव, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी और पर्याप्त बुनियादी ढांचा प्रदर्शित करना होगा।
बड़े पैमाने पर उत्पादन संभालने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी। इसका उद्देश्य ऐसी कंपनियों का चयन करना है जो शुरुआती विकास के बाद विश्वसनीय और लगातार उत्पादन कर सकें।
इससे सैन्य प्रणालियों की आपूर्ति में संभावित देरी और उत्पादन संबंधी बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
वित्तीय मानदंड भी लागू
DRDO की प्रक्रिया में कंपनियों की वित्तीय क्षमता का भी आकलन किया जाएगा।
रिपोर्ट किए गए EOI के अनुसार, आवेदक कंपनियों के लिए कम से कम 100 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार जरूरी है। संबंधित परियोजना के मूल्य के आधार पर न्यूनतम नेटवर्थ की शर्त भी रखी गई है।
कंपनियों को पिछले पांच वर्षों में कम से कम दो वर्षों में लाभ कमाने की शर्त पूरी करनी होगी।
इसके अलावा, क्रेडिट रेटिंग और गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली भी मूल्यांकन का हिस्सा होंगी। कंपनियों से गुणवत्ता आश्वासन और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए अलग व्यवस्था तथा मान्यता प्राप्त गुणवत्ता प्रमाणन की अपेक्षा की गई है।
उद्योग पहले से साझेदार
DRDO की नई पहल ऐसे समय आई है जब निजी उद्योग पहले से कई स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं में भाग ले रहा है।
DRDO और भारतीय वायुसेना ने हाल में टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन (TARA) जैसे निर्देशित हथियार कार्यक्रमों में उद्योग भागीदारों के साथ परीक्षण किए हैं।
इसी तरह, यूएवी-लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल-V3 कार्यक्रम में भी भारतीय रक्षा उद्योग और निजी कंपनियों की भागीदारी सामने आई है।
इन परियोजनाओं से संकेत मिलता है कि सरकार रक्षा अनुसंधान और निजी उत्पादन क्षमता के बीच संबंध को और मजबूत करना चाहती है।
आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन
निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी भारत की आत्मनिर्भर भारत रक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सरकार घरेलू रक्षा उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आयात पर निर्भरता कम करने और भारतीय कंपनियों को वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में शामिल करने की कोशिश कर रही है।
इस प्रक्रिया में बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तथा तकनीकी स्टार्टअप की भूमिका भी बढ़ सकती है।
DRDO के लिए निजी उद्योग के साथ साझेदारी का एक लाभ यह है कि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को बड़े पैमाने पर उत्पादन और सैन्य उपयोग तक तेजी से पहुंचाया जा सकता है।
भारत के लिए क्या मायने
DRDO की यह पहल भारत की मिसाइल और निर्देशित हथियार निर्माण क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इससे निजी कंपनियों को ऐसी परियोजनाओं में भाग लेने का अवसर मिलेगा जिनमें पहले सरकारी अनुसंधान संस्थानों और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भूमिका अधिक प्रमुख रही है।
हालांकि, संभावित DcPP के रूप में चयन के बाद भी प्रत्येक परियोजना के लिए तकनीकी मूल्यांकन, परीक्षण, गुणवत्ता प्रमाणन और अलग खरीद प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
फिर भी, DRDO का मिसाइल निर्माण में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का यह मॉडल भारत के रक्षा उद्योग को अधिक व्यापक और प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर सकता है। इससे सरकारी अनुसंधान क्षमता, निजी क्षेत्र की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और घरेलू उत्पादन नेटवर्क को एक साथ जोड़ने का रास्ता मजबूत होगा।
DRDO का बड़ा कदम, मिसाइल निर्माण में निजी कंपनियों को मौका
Sandeep Patel
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने मिसाइल और निर्देशित हथियार प्रणालियों के विकास तथा उत्पादन में भारतीय कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की पहल की है। इसके तहत हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमारत (RCI) ने संभावित डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर्स (DcPPs) की पहचान के लिए कंपनियों से रुचि पत्र मांगा है।
चयनित कंपनियां DRDO द्वारा विकसित प्रणालियों के इंजीनियरिंग, सिस्टम इंटीग्रेशन, उत्पादन और जीवनचक्र सहायता में भूमिका निभा सकती हैं। यह कदम भारत की आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन नीति के अनुरूप है, जिसके तहत देश जटिल सैन्य प्रणालियों के घरेलू विकास और निर्माण क्षमता को बढ़ाना चाहता है।
निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ेगी
प्रस्तावित व्यवस्था में कंपनियों की भूमिका केवल उपकरण या पुर्जों की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगी।
चयनित कंपनियों को सिस्टम के असेंबली और इंटीग्रेशन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी और उत्पादन क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें गुणवत्ता नियंत्रण और गुणवत्ता आश्वासन की मजबूत व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी।
विकास और उपयोगकर्ता परीक्षण पूरा होने के बाद संबंधित कंपनियां DRDO द्वारा निर्धारित आपूर्ति श्रृंखला के साथ मिलकर उत्पादन प्रक्रिया में शामिल हो सकती हैं।
हालांकि, किसी कंपनी का संभावित DcPP के रूप में चयन अपने आप उत्पादन ऑर्डर की गारंटी नहीं देता।
मिसाइल निर्माण पर फोकस
RCI, DRDO के मिसाइल और रणनीतिक प्रणाली क्लस्टर की प्रमुख प्रयोगशालाओं में शामिल है।
यह क्लस्टर देश की विभिन्न मिसाइल और रणनीतिक हथियार परियोजनाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से इन तकनीकों को प्रयोगशाला स्तर से बड़े पैमाने के उत्पादन तक पहुंचाने की क्षमता मजबूत हो सकती है।
हाल के वर्षों में DRDO ने कई रक्षा परियोजनाओं में निजी कंपनियों को विकास और उत्पादन प्रक्रिया से जोड़ा है।
उत्पादन क्षमता जरूरी
रुचि पत्र में भाग लेने वाली कंपनियों के लिए तकनीकी और उत्पादन क्षमता से जुड़ी कई शर्तें रखी गई हैं।
कंपनियों को जटिल रक्षा प्रणालियों के सिस्टम इंटीग्रेशन का अनुभव, प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी और पर्याप्त बुनियादी ढांचा प्रदर्शित करना होगा।
बड़े पैमाने पर उत्पादन संभालने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी। इसका उद्देश्य ऐसी कंपनियों का चयन करना है जो शुरुआती विकास के बाद विश्वसनीय और लगातार उत्पादन कर सकें।
इससे सैन्य प्रणालियों की आपूर्ति में संभावित देरी और उत्पादन संबंधी बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
वित्तीय मानदंड भी लागू
DRDO की प्रक्रिया में कंपनियों की वित्तीय क्षमता का भी आकलन किया जाएगा।
रिपोर्ट किए गए EOI के अनुसार, आवेदक कंपनियों के लिए कम से कम 100 करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार जरूरी है। संबंधित परियोजना के मूल्य के आधार पर न्यूनतम नेटवर्थ की शर्त भी रखी गई है।
कंपनियों को पिछले पांच वर्षों में कम से कम दो वर्षों में लाभ कमाने की शर्त पूरी करनी होगी।
इसके अलावा, क्रेडिट रेटिंग और गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली भी मूल्यांकन का हिस्सा होंगी। कंपनियों से गुणवत्ता आश्वासन और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए अलग व्यवस्था तथा मान्यता प्राप्त गुणवत्ता प्रमाणन की अपेक्षा की गई है।
उद्योग पहले से साझेदार
DRDO की नई पहल ऐसे समय आई है जब निजी उद्योग पहले से कई स्वदेशी रक्षा परियोजनाओं में भाग ले रहा है।
DRDO और भारतीय वायुसेना ने हाल में टैक्टिकल एडवांस्ड रेंज ऑगमेंटेशन (TARA) जैसे निर्देशित हथियार कार्यक्रमों में उद्योग भागीदारों के साथ परीक्षण किए हैं।
इसी तरह, यूएवी-लॉन्च्ड प्रिसीजन गाइडेड मिसाइल-V3 कार्यक्रम में भी भारतीय रक्षा उद्योग और निजी कंपनियों की भागीदारी सामने आई है।
इन परियोजनाओं से संकेत मिलता है कि सरकार रक्षा अनुसंधान और निजी उत्पादन क्षमता के बीच संबंध को और मजबूत करना चाहती है।
आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन
निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी भारत की आत्मनिर्भर भारत रक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सरकार घरेलू रक्षा उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आयात पर निर्भरता कम करने और भारतीय कंपनियों को वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में शामिल करने की कोशिश कर रही है।
इस प्रक्रिया में बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तथा तकनीकी स्टार्टअप की भूमिका भी बढ़ सकती है।
DRDO के लिए निजी उद्योग के साथ साझेदारी का एक लाभ यह है कि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को बड़े पैमाने पर उत्पादन और सैन्य उपयोग तक तेजी से पहुंचाया जा सकता है।
भारत के लिए क्या मायने
DRDO की यह पहल भारत की मिसाइल और निर्देशित हथियार निर्माण क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इससे निजी कंपनियों को ऐसी परियोजनाओं में भाग लेने का अवसर मिलेगा जिनमें पहले सरकारी अनुसंधान संस्थानों और रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भूमिका अधिक प्रमुख रही है।
हालांकि, संभावित DcPP के रूप में चयन के बाद भी प्रत्येक परियोजना के लिए तकनीकी मूल्यांकन, परीक्षण, गुणवत्ता प्रमाणन और अलग खरीद प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
फिर भी, DRDO का मिसाइल निर्माण में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का यह मॉडल भारत के रक्षा उद्योग को अधिक व्यापक और प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर सकता है। इससे सरकारी अनुसंधान क्षमता, निजी क्षेत्र की इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और घरेलू उत्पादन नेटवर्क को एक साथ जोड़ने का रास्ता मजबूत होगा।
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