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FCRA Amendment Bill: विरोध के बाद JPC को भेजा जा सकता है विधेयक, जानिए NGOs की संपत्तियों पर क्यों छिड़ा विवाद
भारत
सरकार विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने पर विचार कर सकती है। विपक्ष ने मौजूदा स्वरूप में विधेयक वापस लेने की मांग की है।
नई दिल्ली: विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े FCRA संशोधन विधेयक पर बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक विरोध के बीच केंद्र सरकार इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने पर विचार कर सकती है। विपक्षी दलों का दावा है कि प्रस्तावित प्रावधान सरकार को संगठनों की संपत्तियों पर अत्यधिक नियंत्रण दे सकते हैं। वहीं सरकार का कहना है कि बदलावों का उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था और यह अभी संसद के विचाराधीन है। मानसून सत्र के अंतिम दिनों की कार्यसूची को लेकर हुई चर्चा में विधेयक शामिल नहीं होने के बाद इसे JPC को भेजे जाने की संभावना तेज हुई है। हालांकि सरकार की ओर से अभी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
प्रमाणपत्र खत्म हुआ तो संपत्ति का क्या होगा?
विधेयक में उस स्थिति के लिए नया ढांचा प्रस्तावित किया गया है जब किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाए, संगठन उसे वापस कर दे अथवा उसका नवीनीकरण न हो। ऐसी स्थिति में विदेशी चंदे और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक ‘नामित प्राधिकरण’ बनाने का प्रावधान है। प्राधिकरण को संबंधित विदेशी अंशदान और उससे पूरी या आंशिक रूप से बनी संपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन, हस्तांतरण अथवा निस्तारण का अधिकार मिल सकता है। स्थायी रूप से प्राधिकरण में निहित संपत्तियों को सरकारी विभागों या एजेंसियों को दिया जा सकेगा अथवा निर्धारित प्रक्रिया के तहत बेचा जा सकेगा। यदि संपत्ति कोई धार्मिक स्थल है तो प्रस्ताव के अनुसार प्राधिकरण को उसका धार्मिक स्वरूप बनाए रखना होगा।
PRS ने उठाए अपील और सुनवाई से जुड़े सवाल
विधायी शोध संस्था PRS ने अपने विश्लेषण में कहा है कि प्रमाणपत्र का नवीनीकरण न होने पर भी संपत्ति प्राधिकरण के पास जाने का प्रावधान उन संस्थाओं को प्रभावित कर सकता है जो अब विदेशी चंदा नहीं लेतीं लेकिन पहले मिले विदेशी धन से अस्पताल, स्कूल या अन्य सार्वजनिक सुविधा बना चुकी हैं। विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि नवीनीकरण से इनकार के मामलों में अलग अपील व्यवस्था और निर्णय से पहले संगठन को सुनवाई का स्पष्ट अवसर विधेयक में नहीं दिया गया है। मिश्रित घरेलू और विदेशी धन से बनी संपत्तियों पर पूरे अधिकार के प्रावधान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
अधिकतम सजा पांच साल से घटकर एक साल करने का प्रस्ताव
विधेयक FCRA उल्लंघन के मामलों में अधिकतम कारावास की अवधि पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव करता है। किसी अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेने का प्रावधान भी जोड़ा गया है। केंद्र सरकार ने अपने आधिकारिक पक्ष में कहा है कि प्रस्ताव प्रशासनिक खामियों को दूर करने और विदेशी धन के प्रबंधन को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए है। दूसरी ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वाम दलों और पूर्वोत्तर के कुछ राजनीतिक तथा धार्मिक संगठनों ने विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया है। अब निगाह इस बात पर है कि सरकार विधेयक को पारित कराने के लिए आगे बढ़ती है, इसमें संशोधन करती है या विस्तृत विचार-विमर्श के लिए इसे JPC के पास भेजती है।
FCRA Amendment Bill: विरोध के बाद JPC को भेजा जा सकता है विधेयक, जानिए NGOs की संपत्तियों पर क्यों छिड़ा विवाद
भारत
नई दिल्ली: विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े FCRA संशोधन विधेयक पर बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक विरोध के बीच केंद्र सरकार इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने पर विचार कर सकती है। विपक्षी दलों का दावा है कि प्रस्तावित प्रावधान सरकार को संगठनों की संपत्तियों पर अत्यधिक नियंत्रण दे सकते हैं। वहीं सरकार का कहना है कि बदलावों का उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था और यह अभी संसद के विचाराधीन है। मानसून सत्र के अंतिम दिनों की कार्यसूची को लेकर हुई चर्चा में विधेयक शामिल नहीं होने के बाद इसे JPC को भेजे जाने की संभावना तेज हुई है। हालांकि सरकार की ओर से अभी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
प्रमाणपत्र खत्म हुआ तो संपत्ति का क्या होगा?
विधेयक में उस स्थिति के लिए नया ढांचा प्रस्तावित किया गया है जब किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाए, संगठन उसे वापस कर दे अथवा उसका नवीनीकरण न हो। ऐसी स्थिति में विदेशी चंदे और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक ‘नामित प्राधिकरण’ बनाने का प्रावधान है। प्राधिकरण को संबंधित विदेशी अंशदान और उससे पूरी या आंशिक रूप से बनी संपत्तियों की निगरानी, प्रबंधन, हस्तांतरण अथवा निस्तारण का अधिकार मिल सकता है। स्थायी रूप से प्राधिकरण में निहित संपत्तियों को सरकारी विभागों या एजेंसियों को दिया जा सकेगा अथवा निर्धारित प्रक्रिया के तहत बेचा जा सकेगा। यदि संपत्ति कोई धार्मिक स्थल है तो प्रस्ताव के अनुसार प्राधिकरण को उसका धार्मिक स्वरूप बनाए रखना होगा।
PRS ने उठाए अपील और सुनवाई से जुड़े सवाल
विधायी शोध संस्था PRS ने अपने विश्लेषण में कहा है कि प्रमाणपत्र का नवीनीकरण न होने पर भी संपत्ति प्राधिकरण के पास जाने का प्रावधान उन संस्थाओं को प्रभावित कर सकता है जो अब विदेशी चंदा नहीं लेतीं लेकिन पहले मिले विदेशी धन से अस्पताल, स्कूल या अन्य सार्वजनिक सुविधा बना चुकी हैं। विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि नवीनीकरण से इनकार के मामलों में अलग अपील व्यवस्था और निर्णय से पहले संगठन को सुनवाई का स्पष्ट अवसर विधेयक में नहीं दिया गया है। मिश्रित घरेलू और विदेशी धन से बनी संपत्तियों पर पूरे अधिकार के प्रावधान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
अधिकतम सजा पांच साल से घटकर एक साल करने का प्रस्ताव
विधेयक FCRA उल्लंघन के मामलों में अधिकतम कारावास की अवधि पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव करता है। किसी अपराध की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेने का प्रावधान भी जोड़ा गया है। केंद्र सरकार ने अपने आधिकारिक पक्ष में कहा है कि प्रस्ताव प्रशासनिक खामियों को दूर करने और विदेशी धन के प्रबंधन को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए है। दूसरी ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वाम दलों और पूर्वोत्तर के कुछ राजनीतिक तथा धार्मिक संगठनों ने विधेयक के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया है। अब निगाह इस बात पर है कि सरकार विधेयक को पारित कराने के लिए आगे बढ़ती है, इसमें संशोधन करती है या विस्तृत विचार-विमर्श के लिए इसे JPC के पास भेजती है।
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