सबरीमाला केस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज, आस्था बनाम समानता पर बड़ा फैसला संभव

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महिलाओं की एंट्री को लेकर 9 जजों की बेंच कर रही सुनवाई, देशभर के धार्मिक मामलों पर पड़ सकता है असर

केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पांचवें दिन भी जारी रही। नौ जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तार से दलीलें सुन रही है। यह मामला धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना आसान नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक संरचनाओं को कमजोर नहीं किया जा सकता। कोर्ट की ये टिप्पणियां मामले की संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।

इस विवाद की जड़ 2018 के फैसले में है, जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को बरकरार रखा था। 2018 के फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।

मंदिर का प्रबंधन करने वाला त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड इस परंपरा का समर्थन कर रहा है। बोर्ड का कहना है कि सबरीमाला के देवता भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है और यह परंपरा उसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। उनके अनुसार, यह किसी सार्वजनिक स्थान का मामला नहीं, बल्कि एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा है।

सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया। उनका तर्क है कि राज्य को धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं को प्रवेश से वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है।

यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। इसी सुनवाई में मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी अग्नि मंदिर में अधिकार, दाऊदी बोहरा समुदाय की प्रथाओं और धार्मिक संस्थाओं में जेंडर भेदभाव जैसे मुद्दों पर भी विचार हो रहा है। इससे स्पष्ट है कि अदालत का फैसला व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

 

 
 

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17 Apr 2026 By ANKITA

सबरीमाला केस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज, आस्था बनाम समानता पर बड़ा फैसला संभव

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केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पांचवें दिन भी जारी रही। नौ जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर विस्तार से दलीलें सुन रही है। यह मामला धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना आसान नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक संरचनाओं को कमजोर नहीं किया जा सकता। कोर्ट की ये टिप्पणियां मामले की संवेदनशीलता को दर्शाती हैं।

इस विवाद की जड़ 2018 के फैसले में है, जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 1991 में केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को बरकरार रखा था। 2018 के फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।

मंदिर का प्रबंधन करने वाला त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड इस परंपरा का समर्थन कर रहा है। बोर्ड का कहना है कि सबरीमाला के देवता भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है और यह परंपरा उसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी है। उनके अनुसार, यह किसी सार्वजनिक स्थान का मामला नहीं, बल्कि एक विशिष्ट धार्मिक परंपरा है।

सुनवाई के दौरान पक्षकारों ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया। उनका तर्क है कि राज्य को धार्मिक प्रथाओं के मूल स्वरूप में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं को प्रवेश से वंचित करना समानता के अधिकार के खिलाफ है।

यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। इसी सुनवाई में मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, पारसी अग्नि मंदिर में अधिकार, दाऊदी बोहरा समुदाय की प्रथाओं और धार्मिक संस्थाओं में जेंडर भेदभाव जैसे मुद्दों पर भी विचार हो रहा है। इससे स्पष्ट है कि अदालत का फैसला व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

 

 
 
https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/hearing-on-sabarimala-case-intensifies-in-supreme-court-big-decision/article-51448

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