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भारत-यूके ट्रेड डील का दिखा असर, ब्रिटिश कारें हुईं सस्ती; स्कॉच पर अभी इंतजार
Digital Desk
CETA लागू होते ही JLR और McLaren ने घटाईं कीमतें, शराब पर शुल्क में राहत का फायदा राज्य मंजूरियों के बाद मिलेगा; उपभोक्ताओं को सीमित राहत की उम्मीद
भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (Comprehensive Economic and Trade Agreement - CETA) लागू होने के साथ ही इसके असर बाजार में दिखाई देने लगे हैं। सबसे पहले ब्रिटिश लग्जरी कार कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में कटौती का ऐलान किया है। वहीं दूसरी ओर स्कॉच व्हिस्की और जिन जैसी ब्रिटिश शराब के दामों में कमी आने में अभी कुछ समय लगेगा। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि शराब की कीमतों में राहत मिलने से पहले राज्य आबकारी विभागों की मंजूरी और आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करनी होगी, जिसमें 15 से 30 दिन या उससे अधिक समय लग सकता है।
व्यापार समझौते के लागू होने के बाद ब्रिटिश कार निर्माता कंपनियों ने ग्राहकों को तत्काल राहत देना शुरू कर दिया है। जगुआर लैंड रोवर (JLR) ने अपने ब्रिटेन में निर्मित कुछ लग्जरी मॉडलों की कीमतों में बड़ी कटौती की है। कंपनी ने पहले ही रेंज रोवर एसवी की कीमत में लगभग 75 लाख रुपये और रेंज रोवर स्पोर्ट एसवी की कीमत में करीब 40 लाख रुपये की कमी कर दी थी। कंपनी का कहना है कि यह फैसला मुक्त व्यापार समझौते के तहत आयात शुल्क में मिलने वाली राहत को ग्राहकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से लिया गया है।
हालांकि यह छूट केवल उन वाहनों पर लागू होगी जो ब्रिटेन में निर्मित होकर भारत आयात किए जाते हैं। डिफेंडर और डिस्कवरी जैसे मॉडल इस राहत के दायरे में नहीं आएंगे क्योंकि उनका निर्माण स्लोवाकिया में होता है। वहीं, ब्रिटिश सुपरकार निर्माता मैकलारेन भी भारतीय बाजार में अपने वाहनों की कीमतों में लगभग 38 प्रतिशत तक की कटौती करने की तैयारी कर रही है। इससे लग्जरी कार बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है।
दूसरी ओर, स्कॉच व्हिस्की और जिन के शौकीनों को फिलहाल थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। व्यापार समझौते के तहत ब्रिटिश स्कॉच और जिन पर लगने वाला 150 प्रतिशत आयात शुल्क चरणबद्ध तरीके से कम किया जाएगा। शुरुआत में इसे आधा किया जाएगा और अगले दस वर्षों में यह घटकर 40 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। इसके बावजूद उपभोक्ताओं को तत्काल बड़ी राहत मिलने की संभावना नहीं है।
किसी भी आयातित उत्पाद पर नई शुल्क व्यवस्था का लाभ तभी मिलेगा जब कंपनियां यह प्रमाणित करेंगी कि संबंधित उत्पाद वास्तव में यूनाइटेड किंगडम से आयात किया गया है। इसके लिए प्रत्येक कंपनी को 'डिक्लेरेशन ऑफ ओरिजिन' सहित अन्य दस्तावेज दाखिल करने होंगे। इसके बाद संशोधित लागत और मूल्य संबंधी जानकारी राज्य आबकारी विभागों को भेजी जाएगी। सभी राज्यों की मंजूरी मिलने के बाद ही नई कीमतें लागू हो सकेंगी।
उद्योग जगत का अनुमान है कि करीब 3,000 रुपये कीमत वाली आयातित ब्लेंडेड स्कॉच व्हिस्की की बोतल पर लगभग 350 से 400 रुपये तक की कमी संभव है। वहीं भारत में निर्मित ब्लेंडेड व्हिस्की, जिसे इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) कहा जाता है, उसकी कीमत में लगभग 50 से 60 रुपये प्रति बोतल की कमी आ सकती है। हालांकि यह पूरी तरह कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति पर निर्भर करेगा। यदि कंपनियां चाहें तो शुल्क में मिली राहत का कुछ हिस्सा अपनी लाभप्रदता बढ़ाने के लिए भी रख सकती हैं।
इंटरनेशनल स्पिरिट्स एंड वाइंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ISWAI) का कहना है कि भारत-यूके व्यापार समझौते का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब आयात शुल्क में कमी का फायदा सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचे। यदि राज्य सरकारें स्थानीय करों में वृद्धि कर देती हैं या अतिरिक्त नियामकीय शुल्क लगा देती हैं तो कीमतों में अपेक्षित राहत नहीं मिल पाएगी।
भारत में शराब पहले से ही सबसे अधिक कर लगाए जाने वाले उत्पादों में शामिल है। आयात शुल्क के अलावा राज्यों द्वारा अलग-अलग प्रकार के उत्पाद शुल्क, वैट और अन्य स्थानीय कर लगाए जाते हैं। ऐसे में केवल केंद्रीय आयात शुल्क कम होने से अंतिम खुदरा मूल्य (MRP) में सीमित कमी देखने को मिल सकती है।
उद्योग के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आयातित बोतलबंद स्कॉच व्हिस्की की एमआरपी का लगभग 60 से 61 प्रतिशत हिस्सा केवल करों का होता है। वहीं भारतीय सिंगल माल्ट पर भी करों का भार लगभग 56 प्रतिशत तक पहुंचता है। ऐसे में शुल्क में कमी के बावजूद उपभोक्ताओं को केवल 12 से 13 प्रतिशत तक की वास्तविक राहत मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है।
भारतीय मादक पेय उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि अंतिम कीमत तय करने का अधिकार कंपनियों और राज्य सरकारों के बीच की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। राज्यों द्वारा नियंत्रित मूल्य प्रणाली और स्थानीय करों के कारण पूरे देश में एक समान कीमत लागू करना संभव नहीं है। इसलिए अलग-अलग राज्यों में शराब की कीमतों में राहत का स्तर भी अलग हो सकता है।
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भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (Comprehensive Economic and Trade Agreement - CETA) लागू होने के साथ ही इसके असर बाजार में दिखाई देने लगे हैं। सबसे पहले ब्रिटिश लग्जरी कार कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में कटौती का ऐलान किया है। वहीं दूसरी ओर स्कॉच व्हिस्की और जिन जैसी ब्रिटिश शराब के दामों में कमी आने में अभी कुछ समय लगेगा। उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि शराब की कीमतों में राहत मिलने से पहले राज्य आबकारी विभागों की मंजूरी और आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करनी होगी, जिसमें 15 से 30 दिन या उससे अधिक समय लग सकता है।
व्यापार समझौते के लागू होने के बाद ब्रिटिश कार निर्माता कंपनियों ने ग्राहकों को तत्काल राहत देना शुरू कर दिया है। जगुआर लैंड रोवर (JLR) ने अपने ब्रिटेन में निर्मित कुछ लग्जरी मॉडलों की कीमतों में बड़ी कटौती की है। कंपनी ने पहले ही रेंज रोवर एसवी की कीमत में लगभग 75 लाख रुपये और रेंज रोवर स्पोर्ट एसवी की कीमत में करीब 40 लाख रुपये की कमी कर दी थी। कंपनी का कहना है कि यह फैसला मुक्त व्यापार समझौते के तहत आयात शुल्क में मिलने वाली राहत को ग्राहकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से लिया गया है।
हालांकि यह छूट केवल उन वाहनों पर लागू होगी जो ब्रिटेन में निर्मित होकर भारत आयात किए जाते हैं। डिफेंडर और डिस्कवरी जैसे मॉडल इस राहत के दायरे में नहीं आएंगे क्योंकि उनका निर्माण स्लोवाकिया में होता है। वहीं, ब्रिटिश सुपरकार निर्माता मैकलारेन भी भारतीय बाजार में अपने वाहनों की कीमतों में लगभग 38 प्रतिशत तक की कटौती करने की तैयारी कर रही है। इससे लग्जरी कार बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है।
दूसरी ओर, स्कॉच व्हिस्की और जिन के शौकीनों को फिलहाल थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। व्यापार समझौते के तहत ब्रिटिश स्कॉच और जिन पर लगने वाला 150 प्रतिशत आयात शुल्क चरणबद्ध तरीके से कम किया जाएगा। शुरुआत में इसे आधा किया जाएगा और अगले दस वर्षों में यह घटकर 40 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। इसके बावजूद उपभोक्ताओं को तत्काल बड़ी राहत मिलने की संभावना नहीं है।
किसी भी आयातित उत्पाद पर नई शुल्क व्यवस्था का लाभ तभी मिलेगा जब कंपनियां यह प्रमाणित करेंगी कि संबंधित उत्पाद वास्तव में यूनाइटेड किंगडम से आयात किया गया है। इसके लिए प्रत्येक कंपनी को 'डिक्लेरेशन ऑफ ओरिजिन' सहित अन्य दस्तावेज दाखिल करने होंगे। इसके बाद संशोधित लागत और मूल्य संबंधी जानकारी राज्य आबकारी विभागों को भेजी जाएगी। सभी राज्यों की मंजूरी मिलने के बाद ही नई कीमतें लागू हो सकेंगी।
उद्योग जगत का अनुमान है कि करीब 3,000 रुपये कीमत वाली आयातित ब्लेंडेड स्कॉच व्हिस्की की बोतल पर लगभग 350 से 400 रुपये तक की कमी संभव है। वहीं भारत में निर्मित ब्लेंडेड व्हिस्की, जिसे इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) कहा जाता है, उसकी कीमत में लगभग 50 से 60 रुपये प्रति बोतल की कमी आ सकती है। हालांकि यह पूरी तरह कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति पर निर्भर करेगा। यदि कंपनियां चाहें तो शुल्क में मिली राहत का कुछ हिस्सा अपनी लाभप्रदता बढ़ाने के लिए भी रख सकती हैं।
इंटरनेशनल स्पिरिट्स एंड वाइंस एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ISWAI) का कहना है कि भारत-यूके व्यापार समझौते का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब आयात शुल्क में कमी का फायदा सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचे। यदि राज्य सरकारें स्थानीय करों में वृद्धि कर देती हैं या अतिरिक्त नियामकीय शुल्क लगा देती हैं तो कीमतों में अपेक्षित राहत नहीं मिल पाएगी।
भारत में शराब पहले से ही सबसे अधिक कर लगाए जाने वाले उत्पादों में शामिल है। आयात शुल्क के अलावा राज्यों द्वारा अलग-अलग प्रकार के उत्पाद शुल्क, वैट और अन्य स्थानीय कर लगाए जाते हैं। ऐसे में केवल केंद्रीय आयात शुल्क कम होने से अंतिम खुदरा मूल्य (MRP) में सीमित कमी देखने को मिल सकती है।
उद्योग के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आयातित बोतलबंद स्कॉच व्हिस्की की एमआरपी का लगभग 60 से 61 प्रतिशत हिस्सा केवल करों का होता है। वहीं भारतीय सिंगल माल्ट पर भी करों का भार लगभग 56 प्रतिशत तक पहुंचता है। ऐसे में शुल्क में कमी के बावजूद उपभोक्ताओं को केवल 12 से 13 प्रतिशत तक की वास्तविक राहत मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है।
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