फीफा वर्ल्ड कप में फैंस की अनोखी परंपराओं ने जीता दिल, खेल से बढ़कर बनी इंसानी जुड़ाव की मिसाल

स्पोर्ट्स डेस्क

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डच फैंस की ऑरेंज फैनवॉक, जापानी समर्थकों की सफाई संस्कृति और नॉर्वे के वाइकिंग रो ने दुनिया को दिया एकता, अनुशासन और सहभागिता का संदेश

फुटबॉल केवल 90 मिनट का खेल नहीं है, बल्कि यह दुनिया के करोड़ों लोगों की भावनाओं, संस्कृति और पहचान से जुड़ा एक ऐसा उत्सव है जो सीमाओं और भाषाओं से कहीं आगे निकल जाता है। फीफा वर्ल्ड कप के दौरान मैदान पर खिलाड़ियों का प्रदर्शन जितना आकर्षण का केंद्र रहता है, उतनी ही चर्चा स्टेडियम के बाहर फैंस की अनोखी परंपराओं की भी होती है। इस बार भी दुनिया के अलग-अलग देशों से आए समर्थकों ने अपने व्यवहार, संस्कृति और सामूहिक उत्साह से यह साबित किया कि खेल लोगों को जोड़ने का सबसे मजबूत माध्यम है।

हाल ही में अमेरिका के बोस्टन शहर के एक व्यस्त रेलवे स्टेशन पर ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों तक सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। नॉर्वे के फुटबॉल समर्थकों का एक समूह चलते एस्केलेटर पर एक के पीछे एक बैठ गया। सभी ने एक साथ आगे-पीछे झुकते हुए हाथों से चप्पू चलाने जैसी हरकत शुरू कर दी, मानो वे किसी वाइकिंग नाव में सवार हों। कुछ ही मिनटों में यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए मनोरंजन का केंद्र बन गया। कई राहगीर रुककर वीडियो बनाने लगे, जबकि कुछ लोग खुद भी इस अनोखे प्रदर्शन का हिस्सा बन गए।

दिलचस्प बात यह रही कि व्यस्त रेलवे स्टेशन पर इस गतिविधि से किसी तरह की अव्यवस्था नहीं फैली, बल्कि वहां मौजूद लोगों के चेहरों पर मुस्कान और उत्साह दिखाई दिया। कुछ मिनटों के लिए स्टेशन का माहौल पूरी तरह बदल गया और अनजान लोग भी एक-दूसरे से जुड़ते नजर आए। सोशल मीडिया पर इस 'वाइकिंग रो' का वीडियो तेजी से वायरल हुआ और इसे खेल भावना का बेहतरीन उदाहरण बताया गया।

इसी तरह नीदरलैंड यानी डच फैंस भी अपनी खास परंपरा 'ऑरेंज फैनवॉक' को लेकर चर्चा में रहे। हजारों समर्थक अपने देश के पारंपरिक नारंगी रंग के कपड़े पहनकर सड़कों पर एक साथ निकलते हैं। ढोल-नगाड़ों, गीत-संगीत और नारों के बीच यह यात्रा किसी सांस्कृतिक उत्सव जैसी दिखाई देती है। खास बात यह है कि रास्ते में मिलने वाले स्थानीय लोग और अन्य देशों के समर्थक भी इस जुलूस का हिस्सा बन जाते हैं। इससे फुटबॉल का उत्साह केवल स्टेडियम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शहर में उत्सव का माहौल बन जाता है।

जापान के फुटबॉल समर्थक भी हर बड़े टूर्नामेंट में अपनी अनुशासनप्रियता और जिम्मेदारी के लिए पहचाने जाते हैं। मैच समाप्त होने के बाद अधिकांश दर्शक स्टेडियम छोड़ने की जल्दी में रहते हैं, लेकिन जापानी फैंस अपनी सीटों के आसपास फैला कचरा खुद उठाकर डस्टबिन में डालते हैं। कई बार वे दूसरों द्वारा छोड़ा गया कचरा भी साफ करते हैं। यही कारण है कि उनकी इस आदत की दुनिया भर में सराहना होती है। यह केवल सफाई नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों के प्रति जिम्मेदारी और सामूहिक सोच का प्रतीक माना जाता है।

मनोवैज्ञानिक और 'हाऊ चेंज रियली वर्क्स' की लेखिका जूलिया धर के अनुसार, ऐसी छोटी-छोटी सामूहिक गतिविधियां इंसानी रिश्तों को मजबूत बनाती हैं। उनका कहना है कि आज जब दुनिया अकेलेपन और सामाजिक दूरी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब खेल लोगों को एक साझा मंच देता है, जहां वे बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे से जुड़ते हैं। जब लोग किसी गतिविधि में अपनी इच्छा से शामिल होते हैं, तो उनमें अपनापन और समुदाय की भावना स्वतः विकसित होती है।

जूलिया धर यह भी कहती हैं कि किसी व्यक्ति को अपनापन सिखाया नहीं जा सकता। यह भावना तब पैदा होती है, जब लोग किसी काम को मिलकर करते हैं। चाहे वह स्टेडियम में टीम के समर्थन में एक साथ गीत गाना हो, हाथों में झंडे लेकर मार्च निकालना हो या फिर मैच के बाद सफाई करना—इन सभी गतिविधियों का मूल उद्देश्य लोगों के बीच सहभागिता बढ़ाना होता है।

सामाजिक विज्ञान में इसे 'आईकिया इफेक्ट' के नाम से भी समझाया जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, जिन चीजों के निर्माण या विकास में लोगों की भागीदारी होती है, उनसे उनका भावनात्मक जुड़ाव अधिक होता है। फुटबॉल समर्थकों की परंपराएं भी इसी सिद्धांत का उदाहरण हैं। फैंस स्वयं इन गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं और धीरे-धीरे ये परंपराएं पूरी दुनिया में उनकी पहचान बन जाती हैं।

फीफा वर्ल्ड कप हर चार साल में आता है, लेकिन इससे जुड़ी यादें और परंपराएं वर्षों तक लोगों के दिलों में बनी रहती हैं। मैदान पर खिलाड़ियों की जीत और हार अपनी जगह महत्वपूर्ण होती है, लेकिन मैदान के बाहर फैंस का अनुशासन, रचनात्मकता और सकारात्मक ऊर्जा यह संदेश देती है कि खेल केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने वाला सबसे बड़ा माध्यम भी है।

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16 Jul 2026 By Vaishnavi.J

फीफा वर्ल्ड कप में फैंस की अनोखी परंपराओं ने जीता दिल, खेल से बढ़कर बनी इंसानी जुड़ाव की मिसाल

स्पोर्ट्स डेस्क

फुटबॉल केवल 90 मिनट का खेल नहीं है, बल्कि यह दुनिया के करोड़ों लोगों की भावनाओं, संस्कृति और पहचान से जुड़ा एक ऐसा उत्सव है जो सीमाओं और भाषाओं से कहीं आगे निकल जाता है। फीफा वर्ल्ड कप के दौरान मैदान पर खिलाड़ियों का प्रदर्शन जितना आकर्षण का केंद्र रहता है, उतनी ही चर्चा स्टेडियम के बाहर फैंस की अनोखी परंपराओं की भी होती है। इस बार भी दुनिया के अलग-अलग देशों से आए समर्थकों ने अपने व्यवहार, संस्कृति और सामूहिक उत्साह से यह साबित किया कि खेल लोगों को जोड़ने का सबसे मजबूत माध्यम है।

हाल ही में अमेरिका के बोस्टन शहर के एक व्यस्त रेलवे स्टेशन पर ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों तक सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। नॉर्वे के फुटबॉल समर्थकों का एक समूह चलते एस्केलेटर पर एक के पीछे एक बैठ गया। सभी ने एक साथ आगे-पीछे झुकते हुए हाथों से चप्पू चलाने जैसी हरकत शुरू कर दी, मानो वे किसी वाइकिंग नाव में सवार हों। कुछ ही मिनटों में यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए मनोरंजन का केंद्र बन गया। कई राहगीर रुककर वीडियो बनाने लगे, जबकि कुछ लोग खुद भी इस अनोखे प्रदर्शन का हिस्सा बन गए।

दिलचस्प बात यह रही कि व्यस्त रेलवे स्टेशन पर इस गतिविधि से किसी तरह की अव्यवस्था नहीं फैली, बल्कि वहां मौजूद लोगों के चेहरों पर मुस्कान और उत्साह दिखाई दिया। कुछ मिनटों के लिए स्टेशन का माहौल पूरी तरह बदल गया और अनजान लोग भी एक-दूसरे से जुड़ते नजर आए। सोशल मीडिया पर इस 'वाइकिंग रो' का वीडियो तेजी से वायरल हुआ और इसे खेल भावना का बेहतरीन उदाहरण बताया गया।

इसी तरह नीदरलैंड यानी डच फैंस भी अपनी खास परंपरा 'ऑरेंज फैनवॉक' को लेकर चर्चा में रहे। हजारों समर्थक अपने देश के पारंपरिक नारंगी रंग के कपड़े पहनकर सड़कों पर एक साथ निकलते हैं। ढोल-नगाड़ों, गीत-संगीत और नारों के बीच यह यात्रा किसी सांस्कृतिक उत्सव जैसी दिखाई देती है। खास बात यह है कि रास्ते में मिलने वाले स्थानीय लोग और अन्य देशों के समर्थक भी इस जुलूस का हिस्सा बन जाते हैं। इससे फुटबॉल का उत्साह केवल स्टेडियम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे शहर में उत्सव का माहौल बन जाता है।

जापान के फुटबॉल समर्थक भी हर बड़े टूर्नामेंट में अपनी अनुशासनप्रियता और जिम्मेदारी के लिए पहचाने जाते हैं। मैच समाप्त होने के बाद अधिकांश दर्शक स्टेडियम छोड़ने की जल्दी में रहते हैं, लेकिन जापानी फैंस अपनी सीटों के आसपास फैला कचरा खुद उठाकर डस्टबिन में डालते हैं। कई बार वे दूसरों द्वारा छोड़ा गया कचरा भी साफ करते हैं। यही कारण है कि उनकी इस आदत की दुनिया भर में सराहना होती है। यह केवल सफाई नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों के प्रति जिम्मेदारी और सामूहिक सोच का प्रतीक माना जाता है।

मनोवैज्ञानिक और 'हाऊ चेंज रियली वर्क्स' की लेखिका जूलिया धर के अनुसार, ऐसी छोटी-छोटी सामूहिक गतिविधियां इंसानी रिश्तों को मजबूत बनाती हैं। उनका कहना है कि आज जब दुनिया अकेलेपन और सामाजिक दूरी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब खेल लोगों को एक साझा मंच देता है, जहां वे बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे से जुड़ते हैं। जब लोग किसी गतिविधि में अपनी इच्छा से शामिल होते हैं, तो उनमें अपनापन और समुदाय की भावना स्वतः विकसित होती है।

जूलिया धर यह भी कहती हैं कि किसी व्यक्ति को अपनापन सिखाया नहीं जा सकता। यह भावना तब पैदा होती है, जब लोग किसी काम को मिलकर करते हैं। चाहे वह स्टेडियम में टीम के समर्थन में एक साथ गीत गाना हो, हाथों में झंडे लेकर मार्च निकालना हो या फिर मैच के बाद सफाई करना—इन सभी गतिविधियों का मूल उद्देश्य लोगों के बीच सहभागिता बढ़ाना होता है।

सामाजिक विज्ञान में इसे 'आईकिया इफेक्ट' के नाम से भी समझाया जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, जिन चीजों के निर्माण या विकास में लोगों की भागीदारी होती है, उनसे उनका भावनात्मक जुड़ाव अधिक होता है। फुटबॉल समर्थकों की परंपराएं भी इसी सिद्धांत का उदाहरण हैं। फैंस स्वयं इन गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं और धीरे-धीरे ये परंपराएं पूरी दुनिया में उनकी पहचान बन जाती हैं।

फीफा वर्ल्ड कप हर चार साल में आता है, लेकिन इससे जुड़ी यादें और परंपराएं वर्षों तक लोगों के दिलों में बनी रहती हैं। मैदान पर खिलाड़ियों की जीत और हार अपनी जगह महत्वपूर्ण होती है, लेकिन मैदान के बाहर फैंस का अनुशासन, रचनात्मकता और सकारात्मक ऊर्जा यह संदेश देती है कि खेल केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने वाला सबसे बड़ा माध्यम भी है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/sports/unique-traditions-of-fans-won-hearts-in-fifa-world-cup/article-58921

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