रिहैबिलिटेशन की बढ़ती जरूरत के सामने भारत की शिक्षा व्यवस्था कमजोर

लेखक: के. श्री हर्ष शशांक सीईओ, सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी

देश में बढ़ती रिहैबिलिटेशन की जरूरत—2.68 करोड़ दिव्यांगजन, 2023 में 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं और 4.6 लाख से अधिक लोग घायल

भारत में स्वास्थ्य पर चर्चा अक्सर अस्पतालों, डॉक्टरों और बिस्तरों की संख्या तक सीमित रह जाती है। लेकिन असली सवाल तब सामने आता है जब मरीज अस्पताल से घर लौटता है। सर्जरी के बाद, स्ट्रोक के बाद, दुर्घटना के बाद या किसी बीमारी के इलाज के बाद—कौन व्यक्ति को फिर से सामान्य जीवन जीने में मदद करेगा?

यही वह जगह है जहां पुनर्वास यानी रिहैबिलिटेशन की भूमिका शुरू होती है। यह केवल इलाज नहीं, बल्कि व्यक्ति को दोबारा चलने, बोलने, सीखने, काम करने और सम्मान के साथ जीवन जीने लायक बनाने की प्रक्रिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में करीब 2.4 अरब लोग ऐसे हैं जिन्हें किसी न किसी रूप में पुनर्वास की जरूरत है। भारत में भी स्थिति गंभीर है। गैर-संचारी रोग कुल मौतों के 66% से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं। जनगणना 2011 के अनुसार देश में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन हैं। वर्ष 2023 में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई और 4,62,825 लोग घायल हुए। इसके साथ बढ़ती बुजुर्ग आबादी, मानसिक स्वास्थ्य की जरूरतें, विकास से जुड़ी समस्याएं और लंबे समय तक चलने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारियां इस चुनौती को और बड़ा बनाती हैं।

इसके बावजूद, भारत अभी भी इस बड़ी और जटिल जरूरत को अलग-अलग ढंग से चल रही शिक्षा और संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से संभालने की कोशिश कर रहा है। कहीं एक विषय पढ़ाया जाता है, कहीं सीमित क्लिनिकल अनुभव मिलता है, कहीं मानसिक स्वास्थ्य पर काम होता है और कहीं दिव्यांगता सहायता दी जाती है। लेकिन ये सभी एक-दूसरे से पर्याप्त रूप से जुड़े नहीं होते।

इसका असर सीधा मरीज और छात्रों दोनों पर पड़ता है। परिवारों को अलग-अलग सेवाओं के बीच भटकना पड़ता है, जबकि छात्र ऐसे माहौल में पढ़ते हैं जहां उन्हें समग्र देखभाल की समझ नहीं मिल पाती।

असल में, रिकवरी कभी एक ही क्षेत्र का काम नहीं होती। उदाहरण के लिए, एक बच्चे को विकास में देरी हो तो उसे शुरुआती हस्तक्षेप, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, स्पीच-लैंग्वेज सपोर्ट, विशेष शिक्षा, पारिवारिक काउंसलिंग और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत होती है। एक स्ट्रोक से उबर रहा व्यक्ति फिजियोथेरेपी, स्पीच रिहैबिलिटेशन, मानसिक समर्थन, सहायक उपकरण और सामाजिक पुनर्स्थापन पर निर्भर करता है। किसी दुर्घटना से उबरने वाले व्यक्ति के लिए सर्जरी के बाद असली चुनौती स्वतंत्र जीवन जीने की होती है, जिसके लिए उसे गतिशीलता प्रशिक्षण, ऑर्थोटिक सपोर्ट और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत होती है। ये सब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के हिस्से हैं।

जब शिक्षा आपस में जुड़ी नहीं होती, तो देखभाल भी पूरी तरह जुड़ नहीं पाती। छात्रों के पास डिग्री होती है, लेकिन वास्तविक जीवन की जरूरतों को समझने का अनुभव कम होता है। नियोक्ताओं को योग्य लोग मिलते हैं, लेकिन ऐसे पेशेवर कम होते हैं जो निरंतर देखभाल को समझते हों और मरीजों को इलाज तो मिलता है, लेकिन पूरी सहायता नहीं मिल पाती।

भारत को केवल स्वास्थ्य शिक्षा में सीटें बढ़ाने की जरूरत नहीं है, बल्कि ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो कार्यक्षमता, रिकवरी, समावेशन और टीमवर्क पर आधारित हों।
नीतिगत स्तर पर भी बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस ने स्वास्थ्य क्षेत्र को डॉक्टर-केंद्रित सोच से आगे बढ़ाकर व्यापक पेशेवर ढांचे के रूप में मान्यता दी है। यह दिखाता है कि स्वास्थ्य परिणाम केवल डॉक्टरों से नहीं, बल्कि पूरी टीम के सहयोग से तय होते हैं।

इसी संदर्भ में सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी (SMRU) जैसे मॉडल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह पारंपरिक विश्वविद्यालय की तरह अलग-अलग विभागों में बंटा हुआ नहीं है, बल्कि एक ऐसा एकीकृत ढांचा है जो रिहैबिलिटेशन साइंस, एलाइड हेल्थ, मनोविज्ञान, विशेष शिक्षा, ऑडियोलॉजी, स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजी, प्रोस्थेटिक्स और ऑर्थोटिक्स, रिहैबिलिटेशन इंजीनियरिंग, नर्सिंग, पब्लिक हेल्थ और सहायक तकनीकों को एक साथ जोड़ता है।

तेलंगाना सरकार द्वारा SMRU के लिए जारी लेटर ऑफ इंटेंट भी इसी दिशा को दर्शाता है, जिसमें ऑक्यूपेशनल थेरेपी, फिजियोथेरेपी, प्रोस्थेटिक्स और ऑर्थोटिक्स, सहायक तकनीक, ऑडियोलॉजी, स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजी, मनोविज्ञान, विशेष शिक्षा और नर्सिंग जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। यह किसी एक विषय का नहीं, बल्कि पूरे कार्यबल को तैयार करने का ढांचा है।

ऐसे मॉडल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें पढ़ाई और सेवा साथ-साथ चलती हैं। छात्र केवल किताबों से नहीं सीखते, बल्कि वास्तविक क्लिनिकल और सामुदायिक वातावरण में काम करके समझते हैं। वे देखते हैं कि शुरुआती हस्तक्षेप कैसे फर्क लाता है, मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास से कैसे जुड़ा है और कैसे तकनीक, नर्सिंग, थेरेपी और पारिवारिक सहयोग मिलकर रिकवरी को प्रभावित करते हैं।

आने वाले समय में यह जरूरत और तेज़ी से बढ़ेगी। 2050 तक भारत की बुजुर्ग आबादी में तेज वृद्धि होने वाली है और लंबी बीमारियां बढ़ेंगी। स्ट्रोक, कैंसर और अन्य गंभीर स्थितियों के बाद जीवित रहने की गुणवत्ता काफी हद तक पुनर्वास और दीर्घकालिक देखभाल पर निर्भर करेगी। वहीं मानसिक स्वास्थ्य और विकास से जुड़ी समस्याएं भी तेजी से सामने आ रही हैं।

इन सभी चुनौतियों का सामना उस शिक्षा व्यवस्था से नहीं किया जा सकता जो अलग-अलग हिस्सों में काम करती हो।अब समय है कि भारत स्वास्थ्य क्षेत्र में नए तरह के संस्थान बनाए—जहां पुनर्वास, एलाइड हेल्थ, तकनीक, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और पब्लिक हेल्थ एक साथ काम करें।

असल बात यह है कि भारत अलग-अलग ढंग से चल रही शिक्षा व्यवस्था के सहारे देखभाल संकट का समाधान नहीं कर सकता। देश को ऐसे एकीकृत तंत्र की जरूरत है जो लोगों को सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि बेहतर जीवन जीने की क्षमता भी दे सके।

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05 Apr 2026 By दैनिक जागरण

रिहैबिलिटेशन की बढ़ती जरूरत के सामने भारत की शिक्षा व्यवस्था कमजोर

लेखक: के. श्री हर्ष शशांक सीईओ, सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी

भारत में स्वास्थ्य पर चर्चा अक्सर अस्पतालों, डॉक्टरों और बिस्तरों की संख्या तक सीमित रह जाती है। लेकिन असली सवाल तब सामने आता है जब मरीज अस्पताल से घर लौटता है। सर्जरी के बाद, स्ट्रोक के बाद, दुर्घटना के बाद या किसी बीमारी के इलाज के बाद—कौन व्यक्ति को फिर से सामान्य जीवन जीने में मदद करेगा?

यही वह जगह है जहां पुनर्वास यानी रिहैबिलिटेशन की भूमिका शुरू होती है। यह केवल इलाज नहीं, बल्कि व्यक्ति को दोबारा चलने, बोलने, सीखने, काम करने और सम्मान के साथ जीवन जीने लायक बनाने की प्रक्रिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में करीब 2.4 अरब लोग ऐसे हैं जिन्हें किसी न किसी रूप में पुनर्वास की जरूरत है। भारत में भी स्थिति गंभीर है। गैर-संचारी रोग कुल मौतों के 66% से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं। जनगणना 2011 के अनुसार देश में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन हैं। वर्ष 2023 में 4,80,583 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 1,72,890 लोगों की मौत हुई और 4,62,825 लोग घायल हुए। इसके साथ बढ़ती बुजुर्ग आबादी, मानसिक स्वास्थ्य की जरूरतें, विकास से जुड़ी समस्याएं और लंबे समय तक चलने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारियां इस चुनौती को और बड़ा बनाती हैं।

इसके बावजूद, भारत अभी भी इस बड़ी और जटिल जरूरत को अलग-अलग ढंग से चल रही शिक्षा और संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से संभालने की कोशिश कर रहा है। कहीं एक विषय पढ़ाया जाता है, कहीं सीमित क्लिनिकल अनुभव मिलता है, कहीं मानसिक स्वास्थ्य पर काम होता है और कहीं दिव्यांगता सहायता दी जाती है। लेकिन ये सभी एक-दूसरे से पर्याप्त रूप से जुड़े नहीं होते।

इसका असर सीधा मरीज और छात्रों दोनों पर पड़ता है। परिवारों को अलग-अलग सेवाओं के बीच भटकना पड़ता है, जबकि छात्र ऐसे माहौल में पढ़ते हैं जहां उन्हें समग्र देखभाल की समझ नहीं मिल पाती।

असल में, रिकवरी कभी एक ही क्षेत्र का काम नहीं होती। उदाहरण के लिए, एक बच्चे को विकास में देरी हो तो उसे शुरुआती हस्तक्षेप, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, स्पीच-लैंग्वेज सपोर्ट, विशेष शिक्षा, पारिवारिक काउंसलिंग और लंबे समय तक निगरानी की जरूरत होती है। एक स्ट्रोक से उबर रहा व्यक्ति फिजियोथेरेपी, स्पीच रिहैबिलिटेशन, मानसिक समर्थन, सहायक उपकरण और सामाजिक पुनर्स्थापन पर निर्भर करता है। किसी दुर्घटना से उबरने वाले व्यक्ति के लिए सर्जरी के बाद असली चुनौती स्वतंत्र जीवन जीने की होती है, जिसके लिए उसे गतिशीलता प्रशिक्षण, ऑर्थोटिक सपोर्ट और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत होती है। ये सब अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के हिस्से हैं।

जब शिक्षा आपस में जुड़ी नहीं होती, तो देखभाल भी पूरी तरह जुड़ नहीं पाती। छात्रों के पास डिग्री होती है, लेकिन वास्तविक जीवन की जरूरतों को समझने का अनुभव कम होता है। नियोक्ताओं को योग्य लोग मिलते हैं, लेकिन ऐसे पेशेवर कम होते हैं जो निरंतर देखभाल को समझते हों और मरीजों को इलाज तो मिलता है, लेकिन पूरी सहायता नहीं मिल पाती।

भारत को केवल स्वास्थ्य शिक्षा में सीटें बढ़ाने की जरूरत नहीं है, बल्कि ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो कार्यक्षमता, रिकवरी, समावेशन और टीमवर्क पर आधारित हों।
नीतिगत स्तर पर भी बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। नेशनल कमीशन फॉर एलाइड एंड हेल्थकेयर प्रोफेशंस ने स्वास्थ्य क्षेत्र को डॉक्टर-केंद्रित सोच से आगे बढ़ाकर व्यापक पेशेवर ढांचे के रूप में मान्यता दी है। यह दिखाता है कि स्वास्थ्य परिणाम केवल डॉक्टरों से नहीं, बल्कि पूरी टीम के सहयोग से तय होते हैं।

इसी संदर्भ में सेंट मैरीज़ रिहैबिलिटेशन यूनिवर्सिटी (SMRU) जैसे मॉडल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह पारंपरिक विश्वविद्यालय की तरह अलग-अलग विभागों में बंटा हुआ नहीं है, बल्कि एक ऐसा एकीकृत ढांचा है जो रिहैबिलिटेशन साइंस, एलाइड हेल्थ, मनोविज्ञान, विशेष शिक्षा, ऑडियोलॉजी, स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजी, प्रोस्थेटिक्स और ऑर्थोटिक्स, रिहैबिलिटेशन इंजीनियरिंग, नर्सिंग, पब्लिक हेल्थ और सहायक तकनीकों को एक साथ जोड़ता है।

तेलंगाना सरकार द्वारा SMRU के लिए जारी लेटर ऑफ इंटेंट भी इसी दिशा को दर्शाता है, जिसमें ऑक्यूपेशनल थेरेपी, फिजियोथेरेपी, प्रोस्थेटिक्स और ऑर्थोटिक्स, सहायक तकनीक, ऑडियोलॉजी, स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजी, मनोविज्ञान, विशेष शिक्षा और नर्सिंग जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है। यह किसी एक विषय का नहीं, बल्कि पूरे कार्यबल को तैयार करने का ढांचा है।

ऐसे मॉडल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें पढ़ाई और सेवा साथ-साथ चलती हैं। छात्र केवल किताबों से नहीं सीखते, बल्कि वास्तविक क्लिनिकल और सामुदायिक वातावरण में काम करके समझते हैं। वे देखते हैं कि शुरुआती हस्तक्षेप कैसे फर्क लाता है, मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास से कैसे जुड़ा है और कैसे तकनीक, नर्सिंग, थेरेपी और पारिवारिक सहयोग मिलकर रिकवरी को प्रभावित करते हैं।

आने वाले समय में यह जरूरत और तेज़ी से बढ़ेगी। 2050 तक भारत की बुजुर्ग आबादी में तेज वृद्धि होने वाली है और लंबी बीमारियां बढ़ेंगी। स्ट्रोक, कैंसर और अन्य गंभीर स्थितियों के बाद जीवित रहने की गुणवत्ता काफी हद तक पुनर्वास और दीर्घकालिक देखभाल पर निर्भर करेगी। वहीं मानसिक स्वास्थ्य और विकास से जुड़ी समस्याएं भी तेजी से सामने आ रही हैं।

इन सभी चुनौतियों का सामना उस शिक्षा व्यवस्था से नहीं किया जा सकता जो अलग-अलग हिस्सों में काम करती हो।अब समय है कि भारत स्वास्थ्य क्षेत्र में नए तरह के संस्थान बनाए—जहां पुनर्वास, एलाइड हेल्थ, तकनीक, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा और पब्लिक हेल्थ एक साथ काम करें।

असल बात यह है कि भारत अलग-अलग ढंग से चल रही शिक्षा व्यवस्था के सहारे देखभाल संकट का समाधान नहीं कर सकता। देश को ऐसे एकीकृत तंत्र की जरूरत है जो लोगों को सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि बेहतर जीवन जीने की क्षमता भी दे सके।

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