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कुंभगोदावरी स्वच्छ गोदावरी: कैसे नाशिक बन रहा है अगले 30 वर्षों की पर्यावरणीयरूपरेखा
Digital Desk
देश में जब भी नदी पुनर्जीवन की बात होती है, तो सबसे पहले 'नमामि गंगे' अभियान का नाम सामने आता है। पिछले कुछ वर्षों में इस अभियान ने केवल गंगा की सफाई का प्रयास नहीं किया, बल्कि भारत में शहरी सीवेज प्रबंधन का एक नया मॉडल भी विकसित किया - आधुनिक तकनीक, निजी भागीदारी, दीर्घकालिक जवाबदेही और प्रदर्शन आधारित संचालन का मॉडल।
अब यही मॉडल गंगा से निकलकर गोदावरी तक पहुंच रहा है।
सिंहस्थ कुंभ 2027 की तैयारियों के बीच नाशिक ने केवल नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने का निर्णय नहीं लिया है, बल्कि उसने नदी संरक्षण की वही कार्यपद्धति अपनाई है, जिसने 'नमामि गंगे' को देश की सबसे महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय परियोजनाओं में स्थान दिलाया।
विशेष बात यह है कि गोदावरी संरक्षण के लिए इस स्वरूप में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) आधारित Hybrid Annuity Model (HAM) अपनाने वाला नाशिक महाराष्ट्र का पहला शहर बन रहा है। यही इस परियोजना को सामान्य नगर निगम परियोजनाओं से अलग बनाता है।
सवाल केवल सीवेज साफ करने का नहीं था।
सवाल यह था कि क्या ऐसा मॉडल तैयार किया जा सकता है, जिसमें संयंत्र बनने के बाद भी उसकी गुणवत्ता अगले कई दशकों तक बनी रहे? क्या ऐसी व्यवस्था हो सकती है, जिसमें ठेकेदार की जिम्मेदारी निर्माण के साथ समाप्त न हो, बल्कि बेहतर प्रदर्शन के साथ लगातार जुड़ी रहे?
नाशिक ने इसका उत्तर 'नमामि गंगे' मॉडल में खोजा।
एक नजर में
• महाराष्ट्र में पहली बार गोदावरी के लिए PPP आधारित Hybrid Annuity Model (HAM)
• 'नमामि गंगे' अभियान से प्रेरित परियोजना संरचना
• चार नए अत्याधुनिक एसटीपी और एक संयंत्र का आधुनिकीकरण
• कुल उपचार क्षमता लगभग 404 एमएलडी से बढ़कर 550 एमएलडी
• 25 वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव की संविदात्मक जिम्मेदारी
• SBR, Fibre Disc Filtration और SCADA जैसी ऊर्जा-कुशल आधुनिक तकनीक
यह परियोजना केवल नई पुस्तकें या मशीनें लगाने का काम नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की सोच बदलने का प्रयास है।
परंपरागत मॉडल में अक्सर ठेकेदार की भूमिका परियोजना बनाकर उसे नगर निकाय को सौंपने तक सीमित रहती है। इसके बाद रखरखाव, गुणवत्ता और संचालन की जिम्मेदारी अलग-अलग स्तरों पर बंट जाती है। समय के साथ यही व्यवस्था कई शहरों में सीवेज संयंत्रों की कार्यक्षमता प्रभावित होने का कारण भी बनी।
Hybrid Annuity Model इस सोच को बदल देता है।
इस मॉडल में निजी भागीदार केवल संयंत्र का निर्माण नहीं करता, बल्कि अगले 25 वर्षों तक उसका संचालन, रखरखाव, तकनीकी उन्नयन और निर्धारित गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। भुगतान भी केवल निर्माण के आधार पर नहीं, बल्कि संयंत्र के वास्तविक प्रदर्शन और तय मानकों की निरंतर पूर्ति पर निर्भर करता है।
यानी परियोजना पूरी होने के बाद भी जवाबदेही समाप्त नहीं होती।
यही कारण है कि 'नमामि गंगे' अभियान में इस मॉडल को विशेष सफलता मिली और अब उसी अनुभव को गोदावरी के लिए अपनाया जा रहा है।
लेकिन किसी भी आधुनिक परियोजना की सफलता केवल उसके अनुबंध से तय नहीं होती। उसकी तकनीक भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
नाशिक में विकसित हो रहे नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पारंपरिक प्रणालियों से आगे बढ़कर Sequencing Batch Reactor (SBR) तकनीक पर आधारित होंगे। यह तकनीक कम ऊर्जा खपत में अधिक प्रभावी उपचार क्षमता प्रदान करती है और बदलते प्रवाह के अनुसार संचालन को स्वतः संतुलित करने में सक्षम मानी जाती है। इसके साथ Fibre Disc Filtration प्रणाली उपचारित जल की गुणवत्ता को और बेहतर बनाती है, जिससे प्रदूषण नियंत्रण के अधिक कठोर मानकों का पालन संभव हो सके।
पूरी प्रणाली को SCADA आधारित डिजिटल नियंत्रण से जोड़ा जा रहा है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक मोटर, प्रत्येक पंप, प्रत्येक वाल्व और पूरी उपचार प्रक्रिया की चौबीसों घंटे रियल-टाइम निगरानी होगी। इससे ऊर्जा की खपत का अनुकूलन, उपकरणों की समय पर देखभाल और संचालन की दक्षता तीनों सुनिश्चित होंगे।
दुनिया भर में आधुनिक सीवेज संयंत्रों का मूल्यांकन केवल उनकी क्षमता से नहीं, बल्कि उनकी ऊर्जा दक्षता, परिचालन विश्वसनीयता और दीर्घकालिक स्थिरता से किया जाता है। नाशिक की नई परियोजनाएं इन्हीं मानकों को ध्यान में रखकर विकसित की जा रही हैं।
प्रमुख परियोजनाएं एक नजर में
| परियोजना | वर्तमान क्षमता | नई क्षमता |
| तपोवन एसटीपी | 130 एमएलडी | 180 एमएलडी |
| आगरटाकली एसटीपी | 70 एमएलडी | 97 एमएलडी नया संयंत्र + 70 एमएलडी का आधुनिकीकरण (कुल 167 एमएलडी) |
| पंचक एसटीपी | 60 एमएलडी | 75 एमएलडी |
| चेहेड़ी एसटीपी | 42 एमएलडी | 64 एमएलडी |
| शहर की कुल उपचार क्षमता | लगभग 404 एमएलडी | लगभग 550 एमएलडी |
आज शहर में प्रतिदिन लगभग 413 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि उपचार क्षमता लगभग 404 एमएलडी है। नई परियोजनाओं के पूरा होने पर यह क्षमता बढ़कर लगभग 550 एमएलडी हो जाएगी। तपोवन, आगरटाकली, पंचक और चेहेड़ी में विकसित हो रहे नए संयंत्र केवल बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा नहीं करेंगे, बल्कि आने वाले कई दशकों की शहरी वृद्धि को भी ध्यान में रखेंगे।
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य एक ही है - गोदावरी तक पहुंचने से पहले शहर के अधिकतम सीवेज का वैज्ञानिक उपचार सुनिश्चित करना। जितना अधिक उपचारित जल, उतना कम प्रदूषण, उतनी ही स्वच्छ नदी और उतना ही बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य।
सिंहस्थ 2027 निश्चित रूप से इस परिवर्तन का प्रेरक अवसर बना है, लेकिन इसकी दृष्टि उससे कहीं आगे तक जाती है। जब करोड़ों श्रद्धालु गोदावरी के घाटों पर आएंगे, तब उन्हें शायद यह आधुनिक व्यवस्था दिखाई न दे। लेकिन आने वाले वर्षों में यदि गोदावरी अधिक स्वच्छ, शहर अधिक पर्यावरण-सुरक्षित और सीवेज प्रबंधन अधिक जवाबदेह दिखाई देता है, तो उसके पीछे यही मॉडल होगा।
नाशिक का यह प्रयास केवल एक नगर परियोजना नहीं है। यह इस बात का उदाहरण है कि राष्ट्रीय स्तर पर सफल सिद्ध हुए नदी संरक्षण मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनाकर किस तरह आस्था, पर्यावरण और आधुनिक शहरी नियोजन को एक साथ जोड़ा जा सकता है। यही है नाशिक की नई विकास दृष्टि - जहां कुंभ भी है, विकास भी; जहां आस्था अवसर बनती है और विकास उसकी स्थायी विरासत।
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