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अमेरिका-ईरान संघर्षविराम खत्म, तेल और बॉन्ड यील्ड में उछाल
Digital Desk
अमेरिका-ईरान संघर्षविराम खत्म होने के बाद ब्रेंट तेल 91 डॉलर पार पहुंचा। बॉन्ड यील्ड बढ़ने से भारत और वैश्विक बाजारों पर महंगाई का दबाव बढ़ा।
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ने से महंगाई और वैश्विक बाजारों पर दबाव की आशंका बढ़ी है।
अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी संघर्षविराम व्यापक शांति समझौते के बिना खत्म होने के बाद मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई। इसके साथ ही प्रमुख सरकारी बॉन्ड की यील्ड भी बढ़ी, जिससे वैश्विक वित्तीय बाजारों में महंगाई, ब्याज दरों और आर्थिक विकास को लेकर चिंता बढ़ गई।
ब्रेंट क्रूड वायदा 0.3 प्रतिशत बढ़कर 91.14 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 0.5 प्रतिशत बढ़कर 85.04 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा। दोनों बेंचमार्क जुलाई के अंत के बाद अपने उच्चतम स्तर के करीब रहे।
होरमुज से बढ़ी तेल चिंता
तेल बाजार की नजर अब मुख्य रूप से होरमुज जलडमरूमध्य पर है। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयासों में प्रगति नहीं होने से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।
रॉयटर्स के अनुसार, शनिवार को केवल पांच टैंकर होरमुज से गुजरे, जबकि रविवार को एक भी टैंकर के गुजरने की जानकारी नहीं मिली। इससे पहले वाले सप्ताहांत में 31 टैंकर इस मार्ग से गुजरे थे।
यदि जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है और कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
बॉन्ड यील्ड में तेजी
भू-राजनीतिक तनाव का असर बॉन्ड बाजार पर भी दिखाई दिया। जापान की 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड मंगलवार को 2.5 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 2.945 प्रतिशत हो गई। यह सितंबर 1996 के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है।
अमेरिकी लंबी अवधि के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड भी बढ़ी। 30 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब दो दशक के उच्च स्तर के आसपास पहुंच गई।
बढ़ती यील्ड से सरकारों, कंपनियों और परिवारों के लिए कर्ज महंगा हो सकता है। इससे शेयर बाजारों के मूल्यांकन पर भी दबाव पड़ सकता है।
एशियाई शेयर बाजार संभले
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बावजूद एशियाई शेयर बाजारों में तत्काल बड़ी गिरावट नहीं दिखी। इससे संकेत मिला कि निवेशकों ने अभी व्यापक सैन्य escalation की पूरी आशंका को बाजार कीमतों में शामिल नहीं किया है।
हालांकि, महंगे तेल और ऊंची बॉन्ड यील्ड ने बाजार के लिए परिस्थितियां मुश्किल कर दी हैं। अमेरिकी शेयर बाजार सोमवार को कमजोर बंद हुए। S&P 500 में 0.52 प्रतिशत और Nasdaq Composite में 0.31 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
अमेरिका के कमजोर आर्थिक आंकड़ों ने भी निवेशकों के रुख को प्रभावित किया।
भारत पर बढ़ सकता दबाव
अमेरिका-ईरान तनाव का भारत पर सीधा आर्थिक असर पड़ सकता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है।
ब्रेंट की कीमत 91 डॉलर के पार जाने और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़ने से भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, मंगलवार को कारोबार की शुरुआत में रुपया 95.68-95.72 रुपये प्रति डॉलर के आसपास रहने की उम्मीद थी। सोमवार को रुपया 95.6025 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।
महंगा कच्चा तेल भारत का आयात बिल बढ़ा सकता है। इसका असर परिवहन लागत, मुद्रास्फीति और चालू खाते के संतुलन पर भी पड़ सकता है।
निवेशकों की नजर वार्ता पर
अब बाजारों की नजर इस बात पर है कि क्या वॉशिंगटन और तेहरान फिर से सार्थक बातचीत शुरू कर सकते हैं।
संघर्षविराम खत्म होने के बाद सैन्य गतिविधियां बढ़ने की आशंका है। होरमुज में टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने पर तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है।
केंद्रीय बैंक भी बाजार की निगाह में रहेंगे। यदि ऊर्जा कीमतों के कारण महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश कम हो सकती है।
वैश्विक बाजारों पर जोखिम
आने वाले दिनों में मध्य पूर्व की स्थिति ही बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में रहेगी। यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू होती है और होरमुज में समुद्री यातायात सामान्य होता है, तो तेल और बॉन्ड बाजारों पर दबाव कम हो सकता है।
इसके उलट, सैन्य तनाव बढ़ने पर ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए महंगा कच्चा तेल, कमजोर मुद्रा और ऊंची वैश्विक उधारी लागत बड़ी चुनौती बन सकते हैं। अमेरिका-ईरान संघर्षविराम खत्म होने के बाद ऊर्जा बाजार और वैश्विक वित्तीय धारणा पर इसका असर आने वाले दिनों में भी बना रहने की संभावना है।
अमेरिका-ईरान संघर्षविराम खत्म, तेल और बॉन्ड यील्ड में उछाल
Digital Desk
अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ने से महंगाई और वैश्विक बाजारों पर दबाव की आशंका बढ़ी है।
अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी संघर्षविराम व्यापक शांति समझौते के बिना खत्म होने के बाद मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई। इसके साथ ही प्रमुख सरकारी बॉन्ड की यील्ड भी बढ़ी, जिससे वैश्विक वित्तीय बाजारों में महंगाई, ब्याज दरों और आर्थिक विकास को लेकर चिंता बढ़ गई।
ब्रेंट क्रूड वायदा 0.3 प्रतिशत बढ़कर 91.14 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 0.5 प्रतिशत बढ़कर 85.04 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा। दोनों बेंचमार्क जुलाई के अंत के बाद अपने उच्चतम स्तर के करीब रहे।
होरमुज से बढ़ी तेल चिंता
तेल बाजार की नजर अब मुख्य रूप से होरमुज जलडमरूमध्य पर है। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयासों में प्रगति नहीं होने से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।
रॉयटर्स के अनुसार, शनिवार को केवल पांच टैंकर होरमुज से गुजरे, जबकि रविवार को एक भी टैंकर के गुजरने की जानकारी नहीं मिली। इससे पहले वाले सप्ताहांत में 31 टैंकर इस मार्ग से गुजरे थे।
यदि जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है और कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
बॉन्ड यील्ड में तेजी
भू-राजनीतिक तनाव का असर बॉन्ड बाजार पर भी दिखाई दिया। जापान की 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड मंगलवार को 2.5 बेसिस प्वाइंट बढ़कर 2.945 प्रतिशत हो गई। यह सितंबर 1996 के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है।
अमेरिकी लंबी अवधि के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड भी बढ़ी। 30 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब दो दशक के उच्च स्तर के आसपास पहुंच गई।
बढ़ती यील्ड से सरकारों, कंपनियों और परिवारों के लिए कर्ज महंगा हो सकता है। इससे शेयर बाजारों के मूल्यांकन पर भी दबाव पड़ सकता है।
एशियाई शेयर बाजार संभले
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बावजूद एशियाई शेयर बाजारों में तत्काल बड़ी गिरावट नहीं दिखी। इससे संकेत मिला कि निवेशकों ने अभी व्यापक सैन्य escalation की पूरी आशंका को बाजार कीमतों में शामिल नहीं किया है।
हालांकि, महंगे तेल और ऊंची बॉन्ड यील्ड ने बाजार के लिए परिस्थितियां मुश्किल कर दी हैं। अमेरिकी शेयर बाजार सोमवार को कमजोर बंद हुए। S&P 500 में 0.52 प्रतिशत और Nasdaq Composite में 0.31 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
अमेरिका के कमजोर आर्थिक आंकड़ों ने भी निवेशकों के रुख को प्रभावित किया।
भारत पर बढ़ सकता दबाव
अमेरिका-ईरान तनाव का भारत पर सीधा आर्थिक असर पड़ सकता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है।
ब्रेंट की कीमत 91 डॉलर के पार जाने और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़ने से भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, मंगलवार को कारोबार की शुरुआत में रुपया 95.68-95.72 रुपये प्रति डॉलर के आसपास रहने की उम्मीद थी। सोमवार को रुपया 95.6025 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।
महंगा कच्चा तेल भारत का आयात बिल बढ़ा सकता है। इसका असर परिवहन लागत, मुद्रास्फीति और चालू खाते के संतुलन पर भी पड़ सकता है।
निवेशकों की नजर वार्ता पर
अब बाजारों की नजर इस बात पर है कि क्या वॉशिंगटन और तेहरान फिर से सार्थक बातचीत शुरू कर सकते हैं।
संघर्षविराम खत्म होने के बाद सैन्य गतिविधियां बढ़ने की आशंका है। होरमुज में टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने पर तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है।
केंद्रीय बैंक भी बाजार की निगाह में रहेंगे। यदि ऊर्जा कीमतों के कारण महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश कम हो सकती है।
वैश्विक बाजारों पर जोखिम
आने वाले दिनों में मध्य पूर्व की स्थिति ही बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में रहेगी। यदि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू होती है और होरमुज में समुद्री यातायात सामान्य होता है, तो तेल और बॉन्ड बाजारों पर दबाव कम हो सकता है।
इसके उलट, सैन्य तनाव बढ़ने पर ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए महंगा कच्चा तेल, कमजोर मुद्रा और ऊंची वैश्विक उधारी लागत बड़ी चुनौती बन सकते हैं। अमेरिका-ईरान संघर्षविराम खत्म होने के बाद ऊर्जा बाजार और वैश्विक वित्तीय धारणा पर इसका असर आने वाले दिनों में भी बना रहने की संभावना है।
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