मिशन मौसम से बदलेगी देश की मौसम निगरानी व्यवस्था

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एआई, डॉप्लर रडार और सुपरकंप्यूटिंग से सटीक पूर्वानुमान पर जोर; किसानों से लेकर आपदा प्रबंधन तक मिलेगा फायदा

भारत में मौसम की सटीक जानकारी और खराब मौसम की पहले से चेतावनी देने के लिए केंद्र सरकार मिशन मौसम पर काम कर रही है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना का मकसद देश को ऐसी मौसम व्यवस्था देना है, जिसमें बारिश, चक्रवात, आंधी, बिजली गिरने, लू और शहरी बाढ़ जैसी घटनाओं का अनुमान पहले और ज्यादा स्थानीय स्तर पर लगाया जा सके। मिशन मौसम को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2024 में मंजूरी दी थी और 14 जनवरी 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे औपचारिक रूप से लॉन्च किया। इसके लिए 2024-25 और 2025-26 के दौरान 2,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। योजना में पुराने मौसम निगरानी ढांचे को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के साथ-साथ नए रडार, उपग्रह आधारित निगरानी, हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। इसका एक बड़ा हिस्सा मौसम से जुड़ी जानकारी को सिर्फ वैज्ञानिक संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों, प्रशासन और अलग-अलग क्षेत्रों तक समय पर पहुंचाने से जुड़ा है।

मिशन मौसम के तहत देश में मौसम की निगरानी के लिए सतह से लेकर ऊपरी वायुमंडल तक डेटा जुटाने वाली व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। डॉप्लर वेदर रडार, विंड प्रोफाइलर, सैटेलाइट उपकरण, बिजली गिरने की निगरानी, समुद्री और महासागरीय अवलोकन प्रणालियों को विस्तार देने की योजना है। ज्यादा डेटा मिलने के साथ मौसम मॉडल की क्षमता भी बढ़ाई जाएगी। इसके लिए हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम और आधुनिक अर्थ सिस्टम मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। सरकार की योजना पारंपरिक न्यूमेरिकल वेदर प्रेडिक्शन मॉडल के साथ एआई और मशीन लर्निंग तकनीक को जोड़ने की है।

इससे किसी खास इलाके में बारिश कितनी हो सकती है, तापमान में कितना बदलाव आएगा या किसी मौसम प्रणाली का असर किस क्षेत्र में ज्यादा पड़ेगा, जैसी जानकारी को और बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकेगा। एआई आधारित मॉडल मौजूदा पूर्वानुमानों के बाद मिलने वाले डेटा का विश्लेषण कर अनुमान में सुधार करने और ज्यादा स्थानीय मौसम जानकारी तैयार करने में भी मदद कर सकते हैं। मिशन के अगले चरण में 2026 से 2031 के बीच छह प्रमुख क्षेत्रों पर काम प्रस्तावित है। इनमें बेहतर मौसम अवलोकन, अर्थ सिस्टम मॉडल का विकास, मौसम संशोधन से जुड़ा शोध, वायुमंडलीय संरचना और प्रदूषण की निगरानी, नई तकनीकों पर काम और वायुमंडलीय तकनीक से जुड़े राष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं। 2026-27 के लिए मिशन मौसम का अनुमानित बजट 1,342.29 करोड़ रुपए रखा गया है, जिसमें 855.29 करोड़ रुपए राजस्व और 487 करोड़ रुपए पूंजीगत खर्च के लिए प्रस्तावित हैं।

मौसम की जानकारी में सुधार का सीधा असर खेती पर भी पड़ सकता है। किसानों को अगर किसी इलाके में बारिश, तापमान या मौसम में बदलाव की ज्यादा सटीक जानकारी समय पर मिलती है तो फसल की बुवाई, सिंचाई और दूसरी कृषि गतिविधियों की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। इसी तरह मछुआरों के लिए समुद्र की स्थिति और खराब मौसम से जुड़ी चेतावनियां अहम होती हैं। बेहतर समुद्री पूर्वानुमान से समुद्र में जाने का फैसला लेने और जोखिम वाले मौसम से बचने में सहायता मिल सकती है। विमानन क्षेत्र में भी कोहरा, तेज हवाएं, आंधी और गरज-चमक जैसी परिस्थितियों की जानकारी महत्वपूर्ण होती है। मिशन मौसम के तहत इन क्षेत्रों के लिए मौसम संबंधी सेवाओं को ज्यादा उपयोगी और समयबद्ध बनाने पर जोर है। आपदा प्रबंधन के लिहाज से भी योजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चक्रवात या अत्यधिक बारिश जैसी घटनाओं में सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होता कि मौसम खराब होगा।

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प्रशासन को यह भी पता होना जरूरी है कि किस इलाके में कितना असर पड़ सकता है। इसी वजह से मिशन में प्रभाव आधारित पूर्वानुमान और जोखिम आधारित चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की बात कही गई है। चेतावनी को मोबाइल, डिजिटल माध्यमों और दूसरे संचार चैनलों से लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत की जा रही है। शहरी इलाकों में अचानक होने वाली भारी बारिश और जलभराव की स्थिति के लिए भी ज्यादा स्थानीय स्तर के पूर्वानुमान तैयार करने पर ध्यान दिया जा रहा है। मौसम विभाग और संबंधित संस्थानों के लिए ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता उपलब्ध होने से बड़े स्तर पर मौसम डेटा का विश्लेषण करना आसान होगा। इसके साथ रडार और उपग्रह से मिलने वाली सूचनाओं को मॉडल में शामिल कर पूर्वानुमान को लगातार अपडेट किया जा सकेगा। योजना के तहत सतही मौसम केंद्रों, ऊपरी वायुमंडलीय निगरानी, रडार, समुद्री अवलोकन और रिमोट सेंसिंग जैसी व्यवस्थाओं को एक व्यापक नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है।

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13 Aug 2026 By Priyanka

मिशन मौसम से बदलेगी देश की मौसम निगरानी व्यवस्था

भारत

भारत में मौसम की सटीक जानकारी और खराब मौसम की पहले से चेतावनी देने के लिए केंद्र सरकार मिशन मौसम पर काम कर रही है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की इस केंद्रीय क्षेत्र की योजना का मकसद देश को ऐसी मौसम व्यवस्था देना है, जिसमें बारिश, चक्रवात, आंधी, बिजली गिरने, लू और शहरी बाढ़ जैसी घटनाओं का अनुमान पहले और ज्यादा स्थानीय स्तर पर लगाया जा सके। मिशन मौसम को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2024 में मंजूरी दी थी और 14 जनवरी 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे औपचारिक रूप से लॉन्च किया। इसके लिए 2024-25 और 2025-26 के दौरान 2,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। योजना में पुराने मौसम निगरानी ढांचे को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के साथ-साथ नए रडार, उपग्रह आधारित निगरानी, हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। इसका एक बड़ा हिस्सा मौसम से जुड़ी जानकारी को सिर्फ वैज्ञानिक संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों, प्रशासन और अलग-अलग क्षेत्रों तक समय पर पहुंचाने से जुड़ा है।

मिशन मौसम के तहत देश में मौसम की निगरानी के लिए सतह से लेकर ऊपरी वायुमंडल तक डेटा जुटाने वाली व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। डॉप्लर वेदर रडार, विंड प्रोफाइलर, सैटेलाइट उपकरण, बिजली गिरने की निगरानी, समुद्री और महासागरीय अवलोकन प्रणालियों को विस्तार देने की योजना है। ज्यादा डेटा मिलने के साथ मौसम मॉडल की क्षमता भी बढ़ाई जाएगी। इसके लिए हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम और आधुनिक अर्थ सिस्टम मॉडल विकसित किए जा रहे हैं। सरकार की योजना पारंपरिक न्यूमेरिकल वेदर प्रेडिक्शन मॉडल के साथ एआई और मशीन लर्निंग तकनीक को जोड़ने की है।

इससे किसी खास इलाके में बारिश कितनी हो सकती है, तापमान में कितना बदलाव आएगा या किसी मौसम प्रणाली का असर किस क्षेत्र में ज्यादा पड़ेगा, जैसी जानकारी को और बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकेगा। एआई आधारित मॉडल मौजूदा पूर्वानुमानों के बाद मिलने वाले डेटा का विश्लेषण कर अनुमान में सुधार करने और ज्यादा स्थानीय मौसम जानकारी तैयार करने में भी मदद कर सकते हैं। मिशन के अगले चरण में 2026 से 2031 के बीच छह प्रमुख क्षेत्रों पर काम प्रस्तावित है। इनमें बेहतर मौसम अवलोकन, अर्थ सिस्टम मॉडल का विकास, मौसम संशोधन से जुड़ा शोध, वायुमंडलीय संरचना और प्रदूषण की निगरानी, नई तकनीकों पर काम और वायुमंडलीय तकनीक से जुड़े राष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं। 2026-27 के लिए मिशन मौसम का अनुमानित बजट 1,342.29 करोड़ रुपए रखा गया है, जिसमें 855.29 करोड़ रुपए राजस्व और 487 करोड़ रुपए पूंजीगत खर्च के लिए प्रस्तावित हैं।

मौसम की जानकारी में सुधार का सीधा असर खेती पर भी पड़ सकता है। किसानों को अगर किसी इलाके में बारिश, तापमान या मौसम में बदलाव की ज्यादा सटीक जानकारी समय पर मिलती है तो फसल की बुवाई, सिंचाई और दूसरी कृषि गतिविधियों की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। इसी तरह मछुआरों के लिए समुद्र की स्थिति और खराब मौसम से जुड़ी चेतावनियां अहम होती हैं। बेहतर समुद्री पूर्वानुमान से समुद्र में जाने का फैसला लेने और जोखिम वाले मौसम से बचने में सहायता मिल सकती है। विमानन क्षेत्र में भी कोहरा, तेज हवाएं, आंधी और गरज-चमक जैसी परिस्थितियों की जानकारी महत्वपूर्ण होती है। मिशन मौसम के तहत इन क्षेत्रों के लिए मौसम संबंधी सेवाओं को ज्यादा उपयोगी और समयबद्ध बनाने पर जोर है। आपदा प्रबंधन के लिहाज से भी योजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चक्रवात या अत्यधिक बारिश जैसी घटनाओं में सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होता कि मौसम खराब होगा।

प्रशासन को यह भी पता होना जरूरी है कि किस इलाके में कितना असर पड़ सकता है। इसी वजह से मिशन में प्रभाव आधारित पूर्वानुमान और जोखिम आधारित चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की बात कही गई है। चेतावनी को मोबाइल, डिजिटल माध्यमों और दूसरे संचार चैनलों से लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत की जा रही है। शहरी इलाकों में अचानक होने वाली भारी बारिश और जलभराव की स्थिति के लिए भी ज्यादा स्थानीय स्तर के पूर्वानुमान तैयार करने पर ध्यान दिया जा रहा है। मौसम विभाग और संबंधित संस्थानों के लिए ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता उपलब्ध होने से बड़े स्तर पर मौसम डेटा का विश्लेषण करना आसान होगा। इसके साथ रडार और उपग्रह से मिलने वाली सूचनाओं को मॉडल में शामिल कर पूर्वानुमान को लगातार अपडेट किया जा सकेगा। योजना के तहत सतही मौसम केंद्रों, ऊपरी वायुमंडलीय निगरानी, रडार, समुद्री अवलोकन और रिमोट सेंसिंग जैसी व्यवस्थाओं को एक व्यापक नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है।

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