मिडिल-ईस्ट संकट के बीच एस जयशंकर की ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची से चर्चा, जानें क्या हुई बातचीत

अंतर्राष्ट्रीय न्यूज

By Rohit.P
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पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच बातचीत, BRICS और समुद्री सुरक्षा पर चर्चा।

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच एक बार फिर उच्चस्तरीय बातचीत हुई है। इस बातचीत में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ ब्रिक्स से जुड़े अहम मुद्दों पर भी चर्चा की गई। यह संवाद ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ रही है।

जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि उनकी अराघची के साथ एक और विस्तृत बातचीत हुई, जिसमें दोनों देशों के रिश्तों के अलावा बहुपक्षीय मंच ब्रिक्स से जुड़े विषयों पर भी विचार-विमर्श किया गया। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों देश मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात में सहयोग और संवाद को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संवाद

यह बातचीत उस समय हुई है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान के साथ तनाव तेजी से बढ़ा है। फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को प्रभावित किया है।

ईरान ने इन हमलों के जवाब में जवाबी कार्रवाई की है, जिसके बाद समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं गहराने लगी हैं। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री मार्ग पर खतरे की आशंका बढ़ गई है। यह मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और दुनिया भर में होने वाले कच्चे तेल के कारोबार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए इस मार्ग की स्थिरता बेहद अहम है, इसलिए क्षेत्रीय हालात पर भारत की नजर लगातार बनी हुई है।

पहले भी कई बार हो चुकी है दोनों नेताओं की बातचीत

डॉ. एस. जयशंकर और अब्बास अराघची के बीच हाल के सप्ताहों में यह चौथी प्रमुख बातचीत है। इससे पहले 28 फरवरी, 5 मार्च और 10 मार्च को भी दोनों नेताओं के बीच फोन पर चर्चा हो चुकी है।

इन वार्ताओं में मुख्य रूप से क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति, समुद्री सुरक्षा और भारतीय जहाजों तथा तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया गया। भारत ने विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का खतरा भारतीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित न करे।

दूसरी ओर ईरान ने बातचीत के दौरान अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को आक्रामक कदम बताते हुए इसकी आलोचना की। ईरानी नेतृत्व ने यह भी कहा कि उनके देश को आत्मरक्षा का अधिकार है और इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से संतुलित रुख अपनाने की अपेक्षा की गई है।

BRICS मंच पर भी हुई चर्चा

दोनों विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत में ब्रिक्स मंच से जुड़े विषय भी प्रमुख रूप से शामिल रहे। ईरान हाल के वर्षों में ब्रिक्स के साथ अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और इस मंच के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ाने की उम्मीद जताता रहा है।

बातचीत के दौरान यह भी चर्चा हुई कि बहुपक्षीय मंचों के जरिए वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहयोग कैसे बढ़ाया जा सकता है।

पश्चिम एशिया संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है और समुद्री परिवहन मार्गों में बाधाएं आने की आशंका भी जताई जा रही है।

ऐसे हालात में भारत संतुलित कूटनीति अपनाते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। भारत के ईरान के साथ पारंपरिक संबंध रहे हैं, वहीं इजरायल के साथ भी भारत की रणनीतिक साझेदारी मजबूत है। इसलिए नई दिल्ली क्षेत्रीय स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को जारी रखे हुए है।

भारत–ईरान सहयोग के अहम क्षेत्र

भारत और ईरान के संबंध केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं बल्कि कई रणनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी दोनों देशों का सहयोग महत्वपूर्ण रहा है। चाबहार पोर्ट परियोजना, ऊर्जा व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे दोनों देशों के रिश्तों के प्रमुख आधार माने जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील समय में भारत और ईरान के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बने रहना क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग के लिए बेहद जरूरी है।

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13 Mar 2026 By Rohit.P

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अंतर्राष्ट्रीय न्यूज

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच एक बार फिर उच्चस्तरीय बातचीत हुई है। इस बातचीत में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ ब्रिक्स से जुड़े अहम मुद्दों पर भी चर्चा की गई। यह संवाद ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ रही है।

जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि उनकी अराघची के साथ एक और विस्तृत बातचीत हुई, जिसमें दोनों देशों के रिश्तों के अलावा बहुपक्षीय मंच ब्रिक्स से जुड़े विषयों पर भी विचार-विमर्श किया गया। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों देश मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात में सहयोग और संवाद को आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संवाद

यह बातचीत उस समय हुई है जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान के साथ तनाव तेजी से बढ़ा है। फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को प्रभावित किया है।

ईरान ने इन हमलों के जवाब में जवाबी कार्रवाई की है, जिसके बाद समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं गहराने लगी हैं। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री मार्ग पर खतरे की आशंका बढ़ गई है। यह मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और दुनिया भर में होने वाले कच्चे तेल के कारोबार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए इस मार्ग की स्थिरता बेहद अहम है, इसलिए क्षेत्रीय हालात पर भारत की नजर लगातार बनी हुई है।

पहले भी कई बार हो चुकी है दोनों नेताओं की बातचीत

डॉ. एस. जयशंकर और अब्बास अराघची के बीच हाल के सप्ताहों में यह चौथी प्रमुख बातचीत है। इससे पहले 28 फरवरी, 5 मार्च और 10 मार्च को भी दोनों नेताओं के बीच फोन पर चर्चा हो चुकी है।

इन वार्ताओं में मुख्य रूप से क्षेत्रीय संघर्ष की स्थिति, समुद्री सुरक्षा और भारतीय जहाजों तथा तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया गया। भारत ने विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का खतरा भारतीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित न करे।

दूसरी ओर ईरान ने बातचीत के दौरान अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को आक्रामक कदम बताते हुए इसकी आलोचना की। ईरानी नेतृत्व ने यह भी कहा कि उनके देश को आत्मरक्षा का अधिकार है और इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से संतुलित रुख अपनाने की अपेक्षा की गई है।

BRICS मंच पर भी हुई चर्चा

दोनों विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत में ब्रिक्स मंच से जुड़े विषय भी प्रमुख रूप से शामिल रहे। ईरान हाल के वर्षों में ब्रिक्स के साथ अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और इस मंच के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ाने की उम्मीद जताता रहा है।

बातचीत के दौरान यह भी चर्चा हुई कि बहुपक्षीय मंचों के जरिए वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहयोग कैसे बढ़ाया जा सकता है।

पश्चिम एशिया संकट का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है और समुद्री परिवहन मार्गों में बाधाएं आने की आशंका भी जताई जा रही है।

ऐसे हालात में भारत संतुलित कूटनीति अपनाते हुए सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। भारत के ईरान के साथ पारंपरिक संबंध रहे हैं, वहीं इजरायल के साथ भी भारत की रणनीतिक साझेदारी मजबूत है। इसलिए नई दिल्ली क्षेत्रीय स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को जारी रखे हुए है।

भारत–ईरान सहयोग के अहम क्षेत्र

भारत और ईरान के संबंध केवल कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं हैं बल्कि कई रणनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी दोनों देशों का सहयोग महत्वपूर्ण रहा है। चाबहार पोर्ट परियोजना, ऊर्जा व्यापार और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे दोनों देशों के रिश्तों के प्रमुख आधार माने जाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील समय में भारत और ईरान के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बने रहना क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग के लिए बेहद जरूरी है।

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