ऐसे तो महिलाएं नहीं कर पाएंगी नौकरी, मेन्स्ट्रुअल लीव पर कानून बनाने से SC ने किया इनकार

नेशनल न्यूज

By Rohit.P
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सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं और छात्राओं के लिए पूरे देश में अनिवार्य Menstrual Leave पॉलिसी बनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।

महिलाओं और छात्राओं के लिए मेन्स्ट्रुअल लीव को लेकर देशभर में एक समान नीति बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसे कानून के रूप में अनिवार्य बनाना उचित नहीं होगा। अदालत का मानना है कि इस तरह का कानून भविष्य में महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखते हुए किसी संस्था या कंपनी द्वारा स्वैच्छिक रूप से ऐसी छुट्टी देना सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसे कानूनी बाध्यता बनाना अलग स्थिति पैदा कर सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

शुक्रवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले पर विस्तार से टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि Menstrual Leave को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाता है तो इससे कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति सोच प्रभावित हो सकती है।

बेंच ने कहा कि ऐसे प्रावधान से अनजाने में यह धारणा मजबूत हो सकती है कि महिलाएं काम के दौरान कम सक्षम या कम उपलब्ध रहती हैं। इससे Gender Stereotypes को बढ़ावा मिलने का खतरा है, जो महिलाओं की पेशेवर प्रगति के लिए सही संकेत नहीं होगा।

रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है असर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कंपनियों के लिए Menstrual Leave देना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया, तो कुछ नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचा सकते हैं। इससे महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं।

अदालत ने कहा कि कानून बनाने से पहले इसके संभावित सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को समझना जरूरी है। इसलिए इस तरह की नीति को लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और अध्ययन की आवश्यकता है।

सरकार और संबंधित प्राधिकरण कर सकते हैं विचार

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि सरकार या अन्य सक्षम प्राधिकरण इस मुद्दे पर विचार कर सकते हैं। यदि कोई प्रतिनिधित्व दिया जाता है तो उस पर सभी हितधारकों से परामर्श लेकर नीति बनाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

अदालत ने संकेत दिया कि इस विषय पर फैसला नीतिगत स्तर पर होना चाहिए, जहां सरकार, विशेषज्ञ और समाज के विभिन्न वर्गों की राय शामिल हो।

याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए तर्क

इस मामले में याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने सुनवाई के दौरान बताया कि देश के कुछ हिस्सों में पहले से ही Menstrual Leave को लेकर पहल की जा चुकी है।

उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कुछ शैक्षणिक संस्थानों में छात्राओं को पीरियड्स के दौरान राहत देने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा कई निजी कंपनियां भी अपने स्तर पर महिला कर्मचारियों को ऐसी छुट्टी दे रही हैं।

स्वैच्छिक व्यवस्था को अदालत ने बताया सकारात्मक

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि कोई संस्था या कंपनी स्वेच्छा से महिलाओं को Menstrual Leave देती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। इससे महिलाओं के स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखने की सकारात्मक पहल दिखाई देती है।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इसे कानून के तहत अनिवार्य करना एक अलग मुद्दा है और इससे कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आ सकता है।

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13 Mar 2026 By Rohit.P

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महिलाओं और छात्राओं के लिए मेन्स्ट्रुअल लीव को लेकर देशभर में एक समान नीति बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसे कानून के रूप में अनिवार्य बनाना उचित नहीं होगा। अदालत का मानना है कि इस तरह का कानून भविष्य में महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं के स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखते हुए किसी संस्था या कंपनी द्वारा स्वैच्छिक रूप से ऐसी छुट्टी देना सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसे कानूनी बाध्यता बनाना अलग स्थिति पैदा कर सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी

शुक्रवार को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले पर विस्तार से टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि Menstrual Leave को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाता है तो इससे कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति सोच प्रभावित हो सकती है।

बेंच ने कहा कि ऐसे प्रावधान से अनजाने में यह धारणा मजबूत हो सकती है कि महिलाएं काम के दौरान कम सक्षम या कम उपलब्ध रहती हैं। इससे Gender Stereotypes को बढ़ावा मिलने का खतरा है, जो महिलाओं की पेशेवर प्रगति के लिए सही संकेत नहीं होगा।

रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है असर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कंपनियों के लिए Menstrual Leave देना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया, तो कुछ नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचा सकते हैं। इससे महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं।

अदालत ने कहा कि कानून बनाने से पहले इसके संभावित सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को समझना जरूरी है। इसलिए इस तरह की नीति को लागू करने से पहले व्यापक चर्चा और अध्ययन की आवश्यकता है।

सरकार और संबंधित प्राधिकरण कर सकते हैं विचार

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि सरकार या अन्य सक्षम प्राधिकरण इस मुद्दे पर विचार कर सकते हैं। यदि कोई प्रतिनिधित्व दिया जाता है तो उस पर सभी हितधारकों से परामर्श लेकर नीति बनाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।

अदालत ने संकेत दिया कि इस विषय पर फैसला नीतिगत स्तर पर होना चाहिए, जहां सरकार, विशेषज्ञ और समाज के विभिन्न वर्गों की राय शामिल हो।

याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए तर्क

इस मामले में याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने सुनवाई के दौरान बताया कि देश के कुछ हिस्सों में पहले से ही Menstrual Leave को लेकर पहल की जा चुकी है।

उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कुछ शैक्षणिक संस्थानों में छात्राओं को पीरियड्स के दौरान राहत देने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा कई निजी कंपनियां भी अपने स्तर पर महिला कर्मचारियों को ऐसी छुट्टी दे रही हैं।

स्वैच्छिक व्यवस्था को अदालत ने बताया सकारात्मक

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि कोई संस्था या कंपनी स्वेच्छा से महिलाओं को Menstrual Leave देती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। इससे महिलाओं के स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखने की सकारात्मक पहल दिखाई देती है।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इसे कानून के तहत अनिवार्य करना एक अलग मुद्दा है और इससे कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आ सकता है।

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