आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: रोजगार का दुश्मन या अवसर?

Ankita Suman

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ऑटोमेशन से खत्म होती पारंपरिक नौकरियां

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज केवल तकनीकी शब्द नहीं रहा, बल्कि यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी, उद्योग और रोजगार की संरचना को तेजी से बदलने वाली ताकत बन चुका है। मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन और जनरेटिव AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या AI इंसानों की नौकरियां छीन रहा है, या यह नए अवसरों के द्वार खोल रहा है?

AI को लेकर डर निराधार नहीं है। बैंकिंग, बीमा, कस्टमर सपोर्ट, डेटा एंट्री और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में ऑटोमेशन ने पहले ही कई पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित किया है। चैटबॉट्स ने कॉल सेंटर्स की जरूरत कम की, एल्गोरिदम ने अकाउंटिंग और एनालिटिक्स के कुछ काम संभाल लिए, और रोबोटिक्स ने फैक्ट्रियों में मानव श्रम का हिस्सा घटाया। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठनों की रिपोर्टें भी संकेत देती हैं कि आने वाले वर्षों में करोड़ों नौकरियां अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं रहेंगी।

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इतिहास गवाह है कि हर तकनीकी क्रांति—चाहे वह भाप इंजन हो, बिजली या कंप्यूटर—शुरुआत में रोजगार के लिए खतरे की तरह दिखी, लेकिन अंततः उसने नए प्रकार की नौकरियां पैदा कीं। AI भी इससे अलग नहीं है। डेटा साइंटिस्ट, AI ट्रेनर, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट, प्रॉम्प्ट इंजीनियर, एथिक्स ऑफिसर और ऑटोमेशन मैनेजर जैसे कई नए प्रोफेशन पिछले कुछ वर्षों में उभरे हैं, जिनका पहले अस्तित्व ही नहीं था।

असल चुनौती नौकरियों के खत्म होने की नहीं, बल्कि स्किल गैप की है। AI कम कौशल वाले, दोहराव वाले कामों को सबसे पहले प्रभावित करता है, जबकि रचनात्मकता, विश्लेषण, निर्णय क्षमता और मानवीय संवेदना वाले कामों में इंसान की भूमिका अब भी केंद्रीय है। यानी समस्या यह नहीं कि काम खत्म हो रहे हैं, बल्कि यह है कि मौजूदा वर्कफोर्स नई तकनीक के अनुरूप खुद को कितनी तेजी से ढाल पा रही है।

भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए AI एक बड़ा अवसर भी हो सकता है। अगर शिक्षा व्यवस्था, स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और सरकारी नीतियां समय के साथ बदलीं, तो AI भारत को वैश्विक टैलेंट हब बना सकता है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इकोसिस्टम और आईटी सेक्टर पहले ही यह दिखा चुके हैं कि तकनीक को अपनाकर रोजगार कैसे पैदा किए जा सकते हैं। लेकिन यदि री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग पर निवेश नहीं हुआ, तो यही तकनीक असमानता और बेरोजगारी को बढ़ा भी सकती है।

इस बहस का निष्कर्ष स्पष्ट है—AI अपने आप में न तो दुश्मन है और न ही वरदान। यह एक उपकरण है, जिसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि समाज, सरकार और उद्योग इसे कैसे अपनाते हैं। डर के बजाय तैयारी की जरूरत है। नीति निर्माताओं को सामाजिक सुरक्षा और प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा, कंपनियों को जिम्मेदार ऑटोमेशन अपनाना होगा और कर्मचारियों को आजीवन सीखने की मानसिकता विकसित करनी होगी।

अंततः सवाल यह नहीं है कि AI हमारी नौकरियां लेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम AI के साथ काम करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। जो समाज इस बदलाव को समझकर आगे बढ़ेगा, उसके लिए AI रोजगार का दुश्मन नहीं, बल्कि भविष्य का सबसे बड़ा अवसर साबित हो सकता है।

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