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महत्वपूर्ण खनिजों पर राष्ट्रवाद: लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ के निर्यात पर रोक से देश मजबूत होंगे या हरित बदलाव की रफ्तार घटेगी?
Priyanka Mathur
लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ पर निर्यात प्रतिबंध क्यों बढ़ रहे हैं? जानिए इसका भारत, आपूर्ति श्रृंखला और हरित ऊर्जा पर क्या असर पड़ सकता है।
लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ तत्वों को लेकर दुनिया में आर्थिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। खनिज संपन्न देश अब कच्चा माल निर्यात करने के बजाय अपने यहां प्रसंस्करण, शोधन और विनिर्माण को बढ़ावा देना चाहते हैं। इसे महत्वपूर्ण खनिज राष्ट्रवाद कहा जा रहा है। इसका मकसद खनिजों से मिलने वाले आर्थिक लाभ को देश के भीतर रखना, रोजगार बढ़ाना और घरेलू उद्योग को मजबूत करना है। हालांकि, बड़े पैमाने पर निर्यात प्रतिबंध लगाने से वैश्विक आपूर्ति घट सकती है और इलेक्ट्रिक वाहन तथा स्वच्छ ऊर्जा उद्योगों के लिए लागत बढ़ सकती है।
कांगो में कोबाल्ट पर नियंत्रण
अफ्रीका का लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो कोबाल्ट का प्रमुख उत्पादक है। देश ने तांबा और कोबाल्ट सांद्रण के निर्यात पर नियंत्रण बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। उद्देश्य घरेलू प्रसंस्करण बढ़ाना और कच्चे खनिज के निर्यात पर निर्भरता कम करना है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त प्रसंस्करण संयंत्र, निवेश, बिजली और तकनीकी क्षमता भी जरूरी है। केवल निर्यात रोकने से देश में उच्च मूल्य वाले उत्पादों का निर्माण अपने आप शुरू नहीं हो जाता।
जिम्बाब्वे का लिथियम मॉडल
जिम्बाब्वे ने लिथियम अयस्क के निर्यात पर नियंत्रण बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर शोधन और प्रसंस्करण को प्रोत्साहित किया है। देश में लिथियम प्रसंस्करण क्षमता विकसित की जा रही है, ताकि खनिज से ज्यादा आर्थिक लाभ घरेलू अर्थव्यवस्था को मिले। यह मॉडल दूसरे खनिज उत्पादक देशों के लिए भी उदाहरण बन रहा है, लेकिन इसकी सफलता स्थानीय औद्योगिक क्षमता पर निर्भर करेगी।
चीन की पकड़ से बढ़ी चिंता
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति में चीन की भूमिका काफी मजबूत है। उसकी ताकत सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रसंस्करण और औद्योगिक सामग्री तैयार करने तक फैली हुई है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के अनुसार रेयर अर्थ तत्वों के वैश्विक उत्पादन में शीर्ष तीन देशों की हिस्सेदारी करीब 90 प्रतिशत है। आपूर्ति का यह केंद्रीकरण किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरी वैश्विक श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है। इसी वजह से अमेरिका, यूरोप और भारत वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू प्रसंस्करण क्षमता पर जोर दे रहे हैं।
हरित ऊर्जा पर क्या असर?
लिथियम और कोबाल्ट बैटरी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि रेयर अर्थ तत्व इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टर्बाइन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा तकनीक में इस्तेमाल होते हैं। इसलिए निर्यात में अचानक कमी से निर्माताओं को महंगे या नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश करनी पड़ सकती है। दूसरी ओर, खनिज उत्पादक देशों का तर्क है कि उन्हें सिर्फ कच्चा माल बेचने के बजाय प्रसंस्करण और विनिर्माण से रोजगार, निवेश और तकनीकी क्षमता का लाभ मिलना चाहिए।
भारत के लिए क्यों अहम?
भारत के लिए यह मुद्दा इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा से सीधे जुड़ा है। सरकार ने राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के जरिए खोज, खनन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण को मजबूत करने की योजना बनाई है। मिशन के तहत 2030-31 तक 1,200 घरेलू खोज परियोजनाएं पूरी करने और कम से कम 15 महत्वपूर्ण खनिजों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए ₹16,300 करोड़ के सरकारी खर्च और सार्वजनिक क्षेत्र से करीब ₹18,000 करोड़ निवेश की योजना है। भारत के लिए घरेलू संसाधनों को विकसित करने के साथ विदेशों में भी भरोसेमंद आपूर्ति स्रोत बनाना जरूरी होगा।
निर्यात रोकना ही एकमात्र रास्ता नहीं
खनिज उत्पादक देश पूर्ण प्रतिबंध के बजाय निर्यात शुल्क, घरेलू प्रसंस्करण की अनिवार्यता और चरणबद्ध नियंत्रण जैसे विकल्प अपना सकते हैं। इससे स्थानीय मूल्यवर्धन बढ़ाया जा सकता है और वैश्विक आपूर्ति पूरी तरह बाधित होने से भी बच सकती है। आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण खनिजों की नीति व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक रणनीति का अहम हिस्सा रहेगी। खनन के साथ प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ाना इस पूरी रणनीति की महत्वपूर्ण कड़ी होगी।
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