अंतरिक्ष में बढ़ती हथियारों की होड़: क्या Space को बनाया जा सकता है Demilitarized Zone?

Priyanka Mathur

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सैटेलाइट अब संचार, नेविगेशन और सैन्य निगरानी की रीढ़ हैं; एंटी-सैटेलाइट हथियारों, जैमिंग और कक्षीय गतिविधियों के बढ़ते खतरे के बीच अंतरिक्ष को हथियारों से मुक्त रखने की वैश्विक बहस तेज हो रही है

अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज, संचार और मौसम की जानकारी तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक सेनाएं दिशा-निर्धारण, निगरानी, संचार और सैन्य लक्ष्यों की पहचान के लिए उपग्रहों पर काफी निर्भर हैं। ऐसे में किसी देश की अंतरिक्ष व्यवस्था को बाधित करने की क्षमता उसकी जमीन, समुद्र और हवा में सैन्य क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है। उपग्रहों को साइबर हमले, संकेत बाधित करने वाली तकनीक और दूसरे सैन्य साधनों से निशाना बनाए जाने का खतरा भी बढ़ रहा है। इसी बदलते माहौल के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या अंतरिक्ष को पूरी तरह सैन्य प्रतिस्पर्धा से दूर कर युद्ध-मुक्त क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए या फिर अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताओं का विकास राष्ट्रीय सुरक्षा का जरूरी हिस्सा बन चुका है।

अंतरिक्ष अभी पूरी तरह सैन्य-मुक्त नहीं

1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के अन्य हथियारों को कक्षा में तैनात करने पर रोक लगाती है। चंद्रमा और दूसरे खगोलीय पिंडों पर सैन्य अड्डे बनाने और हथियारों के परीक्षण पर भी प्रतिबंध है। हालांकि, पृथ्वी की कक्षा में हर तरह की सैन्य गतिविधि और पारंपरिक हथियारों पर इस संधि के तहत पूरी तरह रोक नहीं है। इसी कारण सैन्य उपग्रह और निगरानी प्रणालियां आज भी कई देशों की रक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। चुनौती यह तय करने की है कि किस बिंदु पर कोई रक्षा प्रणाली आक्रामक हथियार में बदल जाती है।

खतरा सिर्फ अंतरिक्ष में तैनात हथियारों से नहीं

अंतरिक्ष में बढ़ती हथियारों की प्रतिस्पर्धा केवल कक्षा में हथियार भेजने तक सीमित नहीं है। जमीन से संचालित उपग्रह-विरोधी प्रणालियां, लेजर, इलेक्ट्रॉनिक संकेत बाधित करने वाली तकनीक और साइबर हमले भी अंतरिक्ष प्रणालियों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। उपग्रह के पास किसी दूसरे अंतरिक्ष यान का पहुंचना भी अपने आप में हमला नहीं माना जा सकता। इसका इस्तेमाल निरीक्षण या तकनीकी परीक्षण के लिए हो सकता है। लेकिन यदि किसी यान में दूसरे उपग्रह के संचालन को प्रभावित करने की क्षमता हो, तो ऐसी गतिविधि सुरक्षा के लिए चिंता पैदा कर सकती है। इसी वजह से अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं और उनकी गतिविधियों पर नजर रखना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

अमेरिका, चीन और रूस के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा

अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। चीन और रूस भी अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं को लगातार विकसित कर रहे हैं। इन देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने अंतरिक्ष को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दिया है। इसका असर केवल सेनाओं तक सीमित नहीं है। दिशा-निर्धारण प्रणाली, उपग्रह संचार, मौसम पूर्वानुमान, विमानन, समुद्री परिवहन और आपदा प्रबंधन जैसी नागरिक सेवाएं भी उपग्रहों पर निर्भर हैं। इसलिए किसी महत्वपूर्ण उपग्रह पर हमला होने की स्थिति में सैन्य सेवाओं के साथ आम लोगों से जुड़ी कई व्यवस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

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भारत की अंतरिक्ष सुरक्षा पर भी बढ़ी नजर

भारत अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ का विरोध करता रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंतरिक्ष की सुरक्षा के लिए मजबूत नियमों की जरूरत पर जोर देता है। भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की पहली तैनाती रोकने से जुड़े प्रयासों का भी समर्थन किया है। इसके साथ ही भारत अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा और निगरानी क्षमता बढ़ा रहा है। अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों और अन्य वस्तुओं की स्थिति पर लगातार नजर रखना किसी संभावित टकराव या खतरे की पहचान के लिए जरूरी माना जाता है।

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क्या अंतरिक्ष को युद्ध-मुक्त क्षेत्र बनाया जा सकता है?

अंतरिक्ष को पूरी तरह सैन्य गतिविधियों से मुक्त करने से हथियारों की दौड़ और गलतफहमी को कम किया जा सकता है। लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा। एक ही उपग्रह का इस्तेमाल मौसम, संचार और इंटरनेट जैसी नागरिक सेवाओं के साथ सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है। ऐसे में नागरिक और सैन्य उपयोग के बीच स्पष्ट सीमा तय करना मुश्किल है। इसके अलावा, यदि किसी देश को अपने उपग्रह की सुरक्षा के लिए ऐसे अंतरिक्ष यान रखने की अनुमति है जो कक्षा बदल सकते हैं, तो दूसरे देश के उपग्रह के करीब पहुंचने पर उनकी गतिविधि को किस श्रेणी में रखा जाए, यह भी बड़ा सवाल है।

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हथियारों पर रोक के साथ जिम्मेदार व्यवहार जरूरी

इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बहस केवल अंतरिक्ष में हथियारों पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों और देशों के सामने ऐसे नियम बनाने की चुनौती है जिनसे खतरनाक उपग्रह-विरोधी परीक्षण, मलबा पैदा करने वाले हमले, जोखिम भरी कक्षीय गतिविधियां और नागरिक अंतरिक्ष सेवाओं को बाधित करने वाले साइबर या इलेक्ट्रॉनिक हमले रोके जा सकें। अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ अब जरूरत ऐसे नियमों की महसूस की जा रही है जो देशों की सुरक्षा जरूरतों और अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के बीच संतुलन कायम कर सकें।

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