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ईरान पर ट्रंप का आर्थिक शिकंजा, चीन के साथ भारत-UAE पर भी बढ़ा दबाव
अंतराष्ट्रीय न्यूज
अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ के तहत करीब 60 ईरान-सम्बंधित लोगों, संस्थाओं और जहाजों पर प्रतिबंध लगाए; डिजिटल एसेट, टेक्नोलॉजी, गोल्ड, एविएशन और शिपिंग सेक्टर भी निशाने पर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी ने 24 अगस्त को ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू करते हुए ईरान की वित्तीय और कारोबारी गतिविधियों से जुड़े करीब 60 लोगों, संस्थाओं और जहाजों पर कार्रवाई की। इसके साथ ही वॉशिंगटन ने उन देशों और कंपनियों को भी चेतावनी दी है जो ईरान के साथ कारोबार जारी रखते हैं। अमेरिकी ट्रेजरी के अनुसार, नई मुहिम का फोकस ईरान की तेल आय, वित्तीय नेटवर्क, परमाणु एवं मिसाइल से जुड़े सामान की खरीद और साइबर गतिविधियों से जुड़े नेटवर्क पर है। अमेरिका ने सेकेंडरी प्रतिबंधों का दायरा डिजिटल एसेट, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग जैसे पांच क्षेत्रों तक बढ़ाने की बात कही है।
चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती
ईरान के साथ आर्थिक संबंधों के मामले में चीन सबसे ज्यादा संवेदनशील स्थिति में है। रॉयटर्स के मुताबिक, 2025 में चीन ने ईरान से औसतन करीब 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा। यह ईरान के समुद्री तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा था। बीजिंग पहले भी एकतरफा अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है। चीन के स्वतंत्र रिफाइनर ईरानी तेल के प्रमुख खरीदार रहे हैं और दोनों देशों के बीच भुगतान तथा आपूर्ति के लिए ऐसे नेटवर्क विकसित हुए हैं जिन पर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर सीमित रहा है। नई कार्रवाई के बाद यही व्यवस्था वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच बड़ा परीक्षण बन सकती है।
UAE का रास्ता पहले ही मुश्किल हुआ
ईरान के लिए संयुक्त अरब अमीरात भी लंबे समय से अहम कारोबारी केंद्र रहा है। खासतौर पर दुबई के जरिए ईरान के साथ पुनः-निर्यात और वित्तीय गतिविधियों का बड़ा नेटवर्क रहा है। रॉयटर्स के अनुसार, UAE ने हाल में ईरान के साथ वित्तीय और आर्थिक लेनदेन रोकने का फैसला किया है। ऐसे में ईरानी कारोबारियों के लिए दुबई के रास्ते मिलने वाली कारोबारी और भुगतान सुविधाओं पर पहले ही दबाव बढ़ चुका है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
भारत का ईरान के साथ कारोबार चीन की तुलना में काफी छोटा है, लेकिन कुछ खास क्षेत्रों के लिए ईरानी बाजार महत्वपूर्ण रहा है। भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2025-26 में करीब 1.63 अरब डॉलर रहा, जो 2018-19 के लगभग 17 अरब डॉलर के मुकाबले काफी कम है। मौजूदा कारोबार में मानवीय जरूरतों से जुड़े सामान का हिस्सा प्रमुख है। भारतीय कारोबारियों के लिए चावल, चाय, मसाले और अन्य कृषि उत्पाद प्रमुख निर्यात श्रेणियों में हैं। रॉयटर्स के अनुसार, 2026 की शुरुआत में भारत ने ईरान को करीब 38.3 करोड़ डॉलर का चावल और 1.4 करोड़ डॉलर की चाय निर्यात की। यदि ईरान के साथ भुगतान, शिपिंग या लॉजिस्टिक्स के रास्ते और कठिन होते हैं तो इन कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है। विशेष रूप से बासमती चावल के निर्यातकों के लिए ईरानी बाजार महत्वपूर्ण है। UAE के जरिए होने वाले व्यापार और भुगतान में किसी भी तरह की अतिरिक्त बाधा आने पर भारतीय कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग और भुगतान व्यवस्था तलाशनी पड़ सकती है।
तुर्की और इराक भी अमेरिकी दबाव के दायरे में
ईरान के दूसरे महत्वपूर्ण कारोबारी साझेदारों में तुर्की और इराक भी शामिल हैं। तुर्की के साथ ईरान का सालाना कारोबार करीब 5-6 अरब डॉलर का बताया गया है। इराक की ईरान पर ऊर्जा के मामले में भी निर्भरता है और वह ईरान से गैस खरीदता है। पाकिस्तान, ओमान, आर्मेनिया और अजरबैजान के भी ईरान के साथ अलग-अलग स्तर पर व्यापारिक संबंध हैं। अमेरिकी सेकेंडरी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ने पर इन देशों की कंपनियों को भी ईरान से जुड़े लेनदेन में अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था तक अपनी पहुंच को ध्यान में रखना होगा।
अमेरिका का अगला निशाना क्या?
वॉशिंगटन का संदेश फिलहाल केवल ईरानी संस्थाओं तक सीमित नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया है कि ईरान के साथ कारोबार करने वाले तीसरे देशों की कंपनियां और संस्थाएं भी कार्रवाई के दायरे में आ सकती हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, 24 अगस्त की कार्रवाई में बड़े चीनी वित्तीय संस्थानों को सीधे निशाना नहीं बनाया गया, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने आगे और प्रतिबंधों के संकेत दिए हैं। इसका असर आने वाले समय में ईरान के तेल कारोबार, अंतरराष्ट्रीय भुगतान, समुद्री परिवहन और उन देशों की कंपनियों पर देखा जा सकता है जो अभी भी तेहरान के साथ व्यापारिक संपर्क बनाए हुए हैं।
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