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डीएनए टेस्ट के नतीजे बताना जरूरी होना चाहिए या नहीं? लाइफ इंश्योरेंस में जेनेटिक जानकारी पर छिड़ी नई बहस
Priyanka Mathur
डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर जेनेटिक टेस्ट से सामने आए गंभीर बीमारी के जोखिम को लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के साथ साझा करने का सवाल अब गोपनीयता, निष्पक्षता और बीमा जोखिम के बीच संतुलन का मुद्दा बन गया है
डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (DTC) जेनेटिक टेस्ट के बढ़ते इस्तेमाल ने लाइफ इंश्योरेंस को लेकर एक नई बहस खड़ी कर दी है। अब लोग घर बैठे DNA टेस्ट कराकर अपने शरीर में मौजूद कुछ आनुवंशिक बदलावों और भविष्य में कुछ बीमारियों के जोखिम के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति को टेस्ट के जरिए किसी गंभीर बीमारी का संभावित खतरा पता चलता है, तो क्या उसे यह जानकारी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को देना कानूनी रूप से अनिवार्य होना चाहिए।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जेनेटिक जानकारी सामान्य मेडिकल रिपोर्ट से अलग होती है। इसमें किसी व्यक्ति के मौजूदा स्वास्थ्य के साथ-साथ भविष्य में बीमारी होने की संभावनाओं से जुड़ी जानकारी भी हो सकती है। यही वजह है कि इसके इस्तेमाल को लेकर बीमा कंपनियों और उपभोक्ता अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत महसूस की जा रही है।
हेल्थ इंश्योरेंस और लाइफ इंश्योरेंस के नियम अलग
अमेरिका में Genetic Information Nondiscrimination Act यानी GINA स्वास्थ्य बीमा और रोजगार के क्षेत्र में जेनेटिक जानकारी के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा देता है। हालांकि, यह सुरक्षा लाइफ इंश्योरेंस, डिसएबिलिटी इंश्योरेंस और लॉन्ग-टर्म केयर इंश्योरेंस पर उसी तरह लागू नहीं होती। इन क्षेत्रों में राज्य स्तर के नियम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लाइफ इंश्योरेंस कंपनियां किसी व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और अन्य जोखिमों के आधार पर पॉलिसी की शर्तें और प्रीमियम तय करती हैं। ऐसे में कंपनियों का तर्क है कि अगर ग्राहक को अपने स्वास्थ्य से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण जोखिम पता है और बीमा कंपनी को उसकी जानकारी नहीं है, तो कंपनी के पास जोखिम का पूरा आकलन करने के लिए समान जानकारी नहीं होगी।
क्या हर जेनेटिक जोखिम बीमारी में बदलता है?
यही इस बहस का सबसे अहम हिस्सा है। किसी व्यक्ति में किसी बीमारी से जुड़ा आनुवंशिक वैरिएंट मिलने का मतलब यह नहीं होता कि उसे भविष्य में वह बीमारी निश्चित रूप से होगी। कई आनुवंशिक बदलाव केवल जोखिम बढ़ाते हैं, जबकि बीमारी होने में पर्यावरण, जीवनशैली और दूसरे जैविक कारक भी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों की चिंता है कि केवल संभावित आनुवंशिक जोखिम के आधार पर किसी व्यक्ति का प्रीमियम बढ़ाना या उसे कवरेज हासिल करने में मुश्किल पैदा करना उचित नहीं होगा।
DTC टेस्ट की जानकारी कितनी भरोसेमंद?
घर पर किए जाने वाले जेनेटिक टेस्ट और डॉक्टर की सलाह पर होने वाले क्लिनिकल जेनेटिक टेस्ट को हमेशा एक जैसा नहीं माना जाता। DTC टेस्ट से मिले परिणाम को अगर कोई व्यक्ति डॉक्टर के साथ साझा करता है और इसके बाद मेडिकल-ग्रेड टेस्ट कराया जाता है, तो यह जानकारी मेडिकल रिकॉर्ड का हिस्सा बन सकती है। कुछ परिस्थितियों में ऐसी जानकारी लाइफ इंश्योरेंस के लिए प्रासंगिक हो सकती है। यही कारण है कि जेनेटिक टेस्ट कराने वाले लोगों के लिए यह समझना जरूरी हो जाता है कि टेस्ट का परिणाम आगे चलकर उनकी मेडिकल हिस्ट्री और बीमा संबंधी फैसलों को किस तरह प्रभावित कर सकता है।
अनिवार्य खुलासे के पक्ष में क्या तर्क?
लाइफ इंश्योरेंस का आधार जोखिम का आकलन है। समर्थकों का कहना है कि अगर किसी आवेदक को अपने स्वास्थ्य से जुड़ा महत्वपूर्ण जोखिम पहले से पता है और वह उसे कंपनी से छिपाता है, तो इससे बीमा व्यवस्था में असंतुलन पैदा हो सकता है। बीमा क्षेत्र में इसे adverse selection से जोड़कर देखा जाता है। यानी अधिक जोखिम वाले व्यक्ति के पास अपने बारे में ज्यादा जानकारी हो और कंपनी के पास कम जानकारी हो, तो पॉलिसी की कीमत तय करना मुश्किल हो सकता है।
विरोध में प्राइवेसी का सवाल
दूसरी ओर, जेनेटिक जानकारी बेहद निजी मानी जाती है। किसी व्यक्ति को केवल भविष्य में बीमारी होने की संभावना के आधार पर आर्थिक नुकसान उठाना पड़े, तो इससे भेदभाव की आशंका पैदा होती है। एक और चिंता यह है कि अगर लोगों को लगे कि जेनेटिक टेस्ट कराने से उनका लाइफ इंश्योरेंस महंगा हो सकता है, तो वे स्वास्थ्य संबंधी जरूरी जांच या जेनेटिक काउंसलिंग से बच सकते हैं। इससे बीमारी की शुरुआती पहचान और रोकथाम पर भी असर पड़ सकता है।
ब्रिटेन में अपनाया गया अलग मॉडल
ब्रिटेन में सरकार और Association of British Insurers के बीच Code on Genetic Testing and Insurance लागू है। इसके तहत आम तौर पर बीमा कंपनियां लोगों से predictive genetic test कराने के लिए नहीं कह सकतीं। हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों और तय सीमा से ऊपर के लाइफ कवर में अलग नियम लागू हो सकते हैं। यह मॉडल इस बात पर जोर देता है कि जेनेटिक जानकारी के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट सीमाएं और नियम होने चाहिए, ताकि बीमा कंपनियां जोखिम का आकलन कर सकें और ग्राहकों की गोपनीयता भी बनी रहे।
आगे की चुनौती क्या होगी?
जैसे-जैसे जेनेटिक टेस्ट सस्ते और आसानी से उपलब्ध होंगे, लोगों के पास अपने DNA से जुड़ी ज्यादा व्यक्तिगत जानकारी होगी। दूसरी ओर, बीमा कंपनियों के लिए भी यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि जोखिम का सही मूल्यांकन करने के लिए उन्हें कितनी जानकारी मिलनी चाहिए। इस बहस के केंद्र में तीन मुद्दे हैं—बीमा कंपनियों का उचित जोखिम आकलन, लोगों की जेनेटिक गोपनीयता और संभावित भेदभाव से सुरक्षा। अलग-अलग देशों में इन तीनों के बीच संतुलन बनाने के लिए अलग-अलग नियम अपनाए जा रहे हैं।
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