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Soft Life Trend: सुकून की तलाश या समाज से दूरी? नई पीढ़ी की ‘आराम वाली जिंदगी’ पर छिड़ी बहस
Priyanka Mathur
काम, पैसा और लगातार आगे निकलने की दौड़ से थकी युवा पीढ़ी ‘Soft Life’ चुन रही है, लेकिन सवाल है—क्या खुद को बचाने की कोशिश हमें समाज और जिम्मेदारियों से दूर कर रही है?
सुबह उठते ही ऑफिस की भागदौड़ नहीं, हर वक्त प्रमोशन की चिंता नहीं, वीकेंड पर काम के मैसेज नहीं और जिंदगी का हर फैसला ज्यादा पैसा या बड़ा पद हासिल करने के हिसाब से नहीं। सोशल मीडिया पर इसे ‘Soft Life’ कहा जा रहा है। यानी ऐसी जिंदगी जिसमें लगातार संघर्ष और उपलब्धियों की दौड़ के बजाय शांति, आराम, मानसिक सुकून, रिश्तों और निजी समय को ज्यादा अहमियत दी जाए। खासकर युवाओं के बीच यह सोच तेजी से जगह बना रही है कि जीवन का मतलब हर समय ‘हसल’ करना नहीं है। अच्छी नौकरी जरूरी हो सकती है, लेकिन उसके लिए नींद, सेहत, रिश्ते और मन की शांति खो देना जरूरी नहीं। पहली नजर में यह बदलाव एक स्वस्थ प्रतिक्रिया जैसा दिखता है। वर्षों तक ‘Hustle Culture’ ने ज्यादा काम करने, कम सोने और हमेशा व्यस्त रहने को सफलता की पहचान बनाया। अब उसी के जवाब में एक पीढ़ी कह रही है—हमें ऐसी सफलता नहीं चाहिए जिसकी कीमत पूरी जिंदगी हो। लेकिन इसी बहस का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। अगर ‘Soft Life’ का अर्थ धीरे-धीरे हर कठिन जिम्मेदारी से बचना बन जाए, तो क्या हम परिवार, मोहल्ले, समाज और नागरिक जीवन से भी पीछे हटने लगेंगे?
‘Soft Life’ कोई औपचारिक जीवन-दर्शन नहीं है। सोशल मीडिया पर इसका मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग है। किसी के लिए इसका अर्थ बेहतर work-life balance है, किसी के लिए toxic workplace छोड़ना, सीमाएं तय करना और अपने लिए समय निकालना। कुछ लोग इसे कम उपभोग, धीमी जिंदगी और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से दूरी के रूप में देखते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब आराम को जीवन की प्राथमिकता बनाने और असुविधा से पूरी तरह बचने के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। मनोविज्ञान के लिहाज से self-care को केवल इंटरनेट का फैशन मानना भी गलत होगा। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन self-care को मानसिक स्वास्थ्य और resilience यानी मुश्किल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता से जोड़ती है। लगातार तनाव में रहने वाला व्यक्ति आखिर कितने समय तक अपने परिवार, नौकरी या समाज के लिए उपलब्ध रह सकता है? आराम, नींद, रिश्ते और निजी सीमाएं कई बार पीछे हटना नहीं, बल्कि खुद को लंबे समय तक टिकाए रखने की जरूरत होती हैं।
यहीं से असली सवाल उठता है—क्या ‘Soft Life’ हमें स्वस्थ बना रही है या धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब भी कर रही है? आधुनिक शहरी जिंदगी में बहुत से काम ऐसे हैं जिनका तत्काल निजी फायदा नहीं मिलता। मोहल्ले की समस्या के लिए आवाज उठाना, किसी स्थानीय समूह से जुड़ना, बच्चों या बुजुर्गों की सामुदायिक मदद करना, मतदान से आगे नागरिक मुद्दों में भाग लेना, किसी संस्था में volunteer करना या जरूरत पड़ने पर पड़ोसी के लिए समय निकालना—इन सबमें मेहनत लगती है। कई बार विवाद भी झेलना पड़ता है। अगर जीवन का मूल नियम यह बन जाए कि ‘जो मेरी शांति बिगाड़े, उससे दूरी बना लो’, तो civic life सबसे पहले कमजोर हो सकती है। क्योंकि समुदाय सुविधा से नहीं बनता। उसमें समय देना पड़ता है, दूसरे लोगों की समस्याएं सुननी पड़ती हैं और कभी-कभी ऐसी जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है जिससे व्यक्तिगत आराम कम होता है।
दुनिया पहले ही सामाजिक दूरी और अकेलेपन की बड़ी समस्या से जूझ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन से प्रभावित है। WHO ने मजबूत सामाजिक संबंधों को बेहतर स्वास्थ्य और लंबी जिंदगी से जोड़ा है। OECD ने भी सामाजिक जुड़ाव को केवल व्यक्तिगत खुशी का मामला नहीं माना, बल्कि इसे community resilience और civic engagement से जोड़कर देखा है। यानी यह मुद्दा सिर्फ इतना नहीं कि हमारे कितने दोस्त हैं। सवाल यह भी है कि क्या हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, जरूरत में मदद करते हैं और साझा समस्याओं के लिए साथ खड़े होते हैं।
इस लिहाज से ‘Civic Void’ यानी नागरिक भागीदारी का खालीपन एक वास्तविक चिंता बन सकता है। कल्पना कीजिए, एक शहर में हर व्यक्ति अपनी निजी जिंदगी बहुत अच्छे से संभाल रहा है। घर सुंदर है, काम सीमित घंटों का है, छुट्टियां तय हैं, तनाव पैदा करने वाले लोगों से दूरी है। लेकिन उसी शहर में पार्क खराब हैं, स्थानीय संस्थाएं कमजोर हैं, पड़ोसियों के बीच संपर्क नहीं है और सार्वजनिक मुद्दों पर कोई समय नहीं देना चाहता। व्यक्तिगत स्तर पर सब अपनी ‘peace’ बचा रहे हैं, लेकिन सामूहिक स्तर पर समाज कमजोर हो रहा है। ऐसी स्थिति में ‘Soft Life’ अनजाने में उस विचार को मजबूत कर सकती है जिसमें हर समस्या का जवाब निजी retreat बन जाता है—नौकरी खराब है तो छोड़ दो, पड़ोस परेशान करता है तो अलग हो जाओ, राजनीति खराब है तो उससे दूरी रखो, समाज तनाव देता है तो अपना छोटा सुरक्षित दायरा बना लो। हर बार यह विकल्प गलत नहीं है, लेकिन अगर पूरी पीढ़ी का default response withdrawal बन जाए तो सार्वजनिक जगह खाली होने लगती है।
हालांकि इसका पूरा दोष ‘Soft Life’ को देना भी आसान और अधूरा निष्कर्ष होगा। कई युवा सामाजिक जिम्मेदारियों से इसलिए दूर नहीं हुए कि वे आलसी या स्वार्थी हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास समय और ऊर्जा ही कम बची है। महंगे शहर, अस्थिर नौकरियां, लंबी यात्राएं, डिजिटल काम का लगातार पीछा करना और आर्थिक अनिश्चितता ने लोगों की दिनचर्या बदल दी है। जब कोई व्यक्ति दिन का बड़ा हिस्सा नौकरी और आने-जाने में खर्च कर देता है, तो उससे शाम को community meeting में सक्रिय रहने की उम्मीद करना आसान नहीं। ऐसे में ‘Soft Life’ कई लोगों के लिए luxury नहीं बल्कि burnout के खिलाफ प्रतिक्रिया है। यह कहना कि युवा ambition छोड़ रहे हैं, शायद पूरी तस्वीर नहीं है। वे ambition की परिभाषा बदल रहे हैं—बड़ी सैलरी के साथ समय भी चाहिए, करियर के साथ रिश्ते भी और उपलब्धियों के साथ मानसिक शांति भी।
लेकिन इंटरनेट ने इस विचार को एक दूसरा रूप भी दिया है। सोशल मीडिया पर ‘Soft Life’ अक्सर सुंदर घरों, शांत सुबह, महंगी यात्राओं, skincare routines, कैफे, आरामदायक कपड़ों और ‘protect your peace’ जैसे संदेशों के साथ दिखाई देती है। इससे यह भ्रम बन सकता है कि बेहतर जिंदगी का रास्ता समाज से जुड़ने के बजाय निजी comfort खरीदने में है। जबकि वास्तविक सामाजिक जुड़ाव अक्सर aesthetic नहीं होता। पड़ोसी की मदद करना इंस्टाग्राम पर सुंदर नहीं दिखता, स्थानीय समस्या पर तीन घंटे की बैठक आरामदायक नहीं होती और किसी सामुदायिक संस्था में लगातार काम करना ‘slow morning’ जैसा आकर्षक कंटेंट नहीं बनता। फिर भी यही छोटे काम किसी शहर या समाज के भीतर भरोसा पैदा करते हैं। OECD की 2025-26 की रिपोर्टिंग में भी social infrastructure—यानी वे स्थान और संस्थाएं जहां लोग मिलते-जुलते हैं—को सामाजिक जुड़ाव और belonging मजबूत करने का अहम हिस्सा बताया गया है।
इस बहस में शायद ‘Soft Life’ और civic duty को एक-दूसरे का दुश्मन मानना ही सबसे बड़ी गलती है। आराम और जिम्मेदारी साथ चल सकते हैं। कोई व्यक्ति 70 घंटे काम करने से इनकार कर सकता है और फिर भी अपने मोहल्ले में सक्रिय रह सकता है। वह corporate ambition को सीमित कर सकता है, लेकिन पर्यावरण, शिक्षा या स्थानीय मुद्दों के लिए समय दे सकता है। संभव है कि कम burnout वाला व्यक्ति समाज के लिए ज्यादा उपलब्ध हो। अगर नौकरी हमारी पूरी ऊर्जा नहीं खाती, तो वही बचा हुआ समय परिवार, दोस्तों, पड़ोस और नागरिक गतिविधियों में लगाया जा सकता है। इस अर्थ में ‘Soft Life’ civic life की विरोधी नहीं, उसकी मददगार भी बन सकती है—बशर्ते ‘peace’ का मतलब isolation न हो।
खतरा वहां है जहां self-care धीरे-धीरे self-absorption बन जाए। हर असहमति को ‘toxic’, हर जिम्मेदारी को ‘emotional labour’ और हर असुविधा को अपनी शांति पर हमला मानने की आदत समाज को छोटे-छोटे निजी द्वीपों में बांट सकती है। समुदाय तभी बनता है जब लोग कभी-कभी अपनी सुविधा से बाहर निकलते हैं। किसी बीमार पड़ोसी के लिए खाना पहुंचाना, मतदान करना, स्थानीय समस्या पर सवाल उठाना, बच्चों के लिए सार्वजनिक जगह बचाने की कोशिश करना या किसी मुश्किल समय में दोस्त के साथ बैठना—इनमें से बहुत कुछ ‘soft’ नहीं है। लेकिन यही सामाजिक जीवन की बुनियाद है। अमेरिकी Surgeon General की social connection advisory ने भी चेताया था कि कमजोर सामाजिक जुड़ाव का असर केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता; स्कूलों, कार्यस्थलों और civic organizations में भागीदारी और प्रदर्शन भी प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए नई बहस शायद ‘Soft Life बनाम Hard Life’ की नहीं, बल्कि Soft Life बनाम Disconnected Life की है। थकान को उपलब्धि समझना जरूरी नहीं। हर समय महत्वाकांक्षी दिखना भी जरूरी नहीं। लेकिन निजी शांति ऐसी दीवार भी नहीं बननी चाहिए जिसके बाहर समाज की हर समस्या किसी और की जिम्मेदारी हो जाए। आराम जरूरी है, सीमाएं जरूरी हैं और अपनी जिंदगी पर नियंत्रण भी। उसी के साथ किसी समुदाय का हिस्सा बने रहना, दूसरों के लिए थोड़ा समय निकालना और साझा जिम्मेदारियों से पूरी तरह पीछे न हटना भी उतना ही जरूरी होता जा रहा है—खासकर उस दौर में जब दुनिया अकेलेपन और सामाजिक अलगाव को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामुदायिक मजबूती से जुड़ी चुनौती मान रही है।
Soft Life Trend: सुकून की तलाश या समाज से दूरी? नई पीढ़ी की ‘आराम वाली जिंदगी’ पर छिड़ी बहस
Priyanka Mathur
सुबह उठते ही ऑफिस की भागदौड़ नहीं, हर वक्त प्रमोशन की चिंता नहीं, वीकेंड पर काम के मैसेज नहीं और जिंदगी का हर फैसला ज्यादा पैसा या बड़ा पद हासिल करने के हिसाब से नहीं। सोशल मीडिया पर इसे ‘Soft Life’ कहा जा रहा है। यानी ऐसी जिंदगी जिसमें लगातार संघर्ष और उपलब्धियों की दौड़ के बजाय शांति, आराम, मानसिक सुकून, रिश्तों और निजी समय को ज्यादा अहमियत दी जाए। खासकर युवाओं के बीच यह सोच तेजी से जगह बना रही है कि जीवन का मतलब हर समय ‘हसल’ करना नहीं है। अच्छी नौकरी जरूरी हो सकती है, लेकिन उसके लिए नींद, सेहत, रिश्ते और मन की शांति खो देना जरूरी नहीं। पहली नजर में यह बदलाव एक स्वस्थ प्रतिक्रिया जैसा दिखता है। वर्षों तक ‘Hustle Culture’ ने ज्यादा काम करने, कम सोने और हमेशा व्यस्त रहने को सफलता की पहचान बनाया। अब उसी के जवाब में एक पीढ़ी कह रही है—हमें ऐसी सफलता नहीं चाहिए जिसकी कीमत पूरी जिंदगी हो। लेकिन इसी बहस का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। अगर ‘Soft Life’ का अर्थ धीरे-धीरे हर कठिन जिम्मेदारी से बचना बन जाए, तो क्या हम परिवार, मोहल्ले, समाज और नागरिक जीवन से भी पीछे हटने लगेंगे?
‘Soft Life’ कोई औपचारिक जीवन-दर्शन नहीं है। सोशल मीडिया पर इसका मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग है। किसी के लिए इसका अर्थ बेहतर work-life balance है, किसी के लिए toxic workplace छोड़ना, सीमाएं तय करना और अपने लिए समय निकालना। कुछ लोग इसे कम उपभोग, धीमी जिंदगी और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से दूरी के रूप में देखते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब आराम को जीवन की प्राथमिकता बनाने और असुविधा से पूरी तरह बचने के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। मनोविज्ञान के लिहाज से self-care को केवल इंटरनेट का फैशन मानना भी गलत होगा। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन self-care को मानसिक स्वास्थ्य और resilience यानी मुश्किल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता से जोड़ती है। लगातार तनाव में रहने वाला व्यक्ति आखिर कितने समय तक अपने परिवार, नौकरी या समाज के लिए उपलब्ध रह सकता है? आराम, नींद, रिश्ते और निजी सीमाएं कई बार पीछे हटना नहीं, बल्कि खुद को लंबे समय तक टिकाए रखने की जरूरत होती हैं।
यहीं से असली सवाल उठता है—क्या ‘Soft Life’ हमें स्वस्थ बना रही है या धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब भी कर रही है? आधुनिक शहरी जिंदगी में बहुत से काम ऐसे हैं जिनका तत्काल निजी फायदा नहीं मिलता। मोहल्ले की समस्या के लिए आवाज उठाना, किसी स्थानीय समूह से जुड़ना, बच्चों या बुजुर्गों की सामुदायिक मदद करना, मतदान से आगे नागरिक मुद्दों में भाग लेना, किसी संस्था में volunteer करना या जरूरत पड़ने पर पड़ोसी के लिए समय निकालना—इन सबमें मेहनत लगती है। कई बार विवाद भी झेलना पड़ता है। अगर जीवन का मूल नियम यह बन जाए कि ‘जो मेरी शांति बिगाड़े, उससे दूरी बना लो’, तो civic life सबसे पहले कमजोर हो सकती है। क्योंकि समुदाय सुविधा से नहीं बनता। उसमें समय देना पड़ता है, दूसरे लोगों की समस्याएं सुननी पड़ती हैं और कभी-कभी ऐसी जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है जिससे व्यक्तिगत आराम कम होता है।
दुनिया पहले ही सामाजिक दूरी और अकेलेपन की बड़ी समस्या से जूझ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन से प्रभावित है। WHO ने मजबूत सामाजिक संबंधों को बेहतर स्वास्थ्य और लंबी जिंदगी से जोड़ा है। OECD ने भी सामाजिक जुड़ाव को केवल व्यक्तिगत खुशी का मामला नहीं माना, बल्कि इसे community resilience और civic engagement से जोड़कर देखा है। यानी यह मुद्दा सिर्फ इतना नहीं कि हमारे कितने दोस्त हैं। सवाल यह भी है कि क्या हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां लोग एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, जरूरत में मदद करते हैं और साझा समस्याओं के लिए साथ खड़े होते हैं।
इस लिहाज से ‘Civic Void’ यानी नागरिक भागीदारी का खालीपन एक वास्तविक चिंता बन सकता है। कल्पना कीजिए, एक शहर में हर व्यक्ति अपनी निजी जिंदगी बहुत अच्छे से संभाल रहा है। घर सुंदर है, काम सीमित घंटों का है, छुट्टियां तय हैं, तनाव पैदा करने वाले लोगों से दूरी है। लेकिन उसी शहर में पार्क खराब हैं, स्थानीय संस्थाएं कमजोर हैं, पड़ोसियों के बीच संपर्क नहीं है और सार्वजनिक मुद्दों पर कोई समय नहीं देना चाहता। व्यक्तिगत स्तर पर सब अपनी ‘peace’ बचा रहे हैं, लेकिन सामूहिक स्तर पर समाज कमजोर हो रहा है। ऐसी स्थिति में ‘Soft Life’ अनजाने में उस विचार को मजबूत कर सकती है जिसमें हर समस्या का जवाब निजी retreat बन जाता है—नौकरी खराब है तो छोड़ दो, पड़ोस परेशान करता है तो अलग हो जाओ, राजनीति खराब है तो उससे दूरी रखो, समाज तनाव देता है तो अपना छोटा सुरक्षित दायरा बना लो। हर बार यह विकल्प गलत नहीं है, लेकिन अगर पूरी पीढ़ी का default response withdrawal बन जाए तो सार्वजनिक जगह खाली होने लगती है।
हालांकि इसका पूरा दोष ‘Soft Life’ को देना भी आसान और अधूरा निष्कर्ष होगा। कई युवा सामाजिक जिम्मेदारियों से इसलिए दूर नहीं हुए कि वे आलसी या स्वार्थी हैं, बल्कि इसलिए कि उनके पास समय और ऊर्जा ही कम बची है। महंगे शहर, अस्थिर नौकरियां, लंबी यात्राएं, डिजिटल काम का लगातार पीछा करना और आर्थिक अनिश्चितता ने लोगों की दिनचर्या बदल दी है। जब कोई व्यक्ति दिन का बड़ा हिस्सा नौकरी और आने-जाने में खर्च कर देता है, तो उससे शाम को community meeting में सक्रिय रहने की उम्मीद करना आसान नहीं। ऐसे में ‘Soft Life’ कई लोगों के लिए luxury नहीं बल्कि burnout के खिलाफ प्रतिक्रिया है। यह कहना कि युवा ambition छोड़ रहे हैं, शायद पूरी तस्वीर नहीं है। वे ambition की परिभाषा बदल रहे हैं—बड़ी सैलरी के साथ समय भी चाहिए, करियर के साथ रिश्ते भी और उपलब्धियों के साथ मानसिक शांति भी।
लेकिन इंटरनेट ने इस विचार को एक दूसरा रूप भी दिया है। सोशल मीडिया पर ‘Soft Life’ अक्सर सुंदर घरों, शांत सुबह, महंगी यात्राओं, skincare routines, कैफे, आरामदायक कपड़ों और ‘protect your peace’ जैसे संदेशों के साथ दिखाई देती है। इससे यह भ्रम बन सकता है कि बेहतर जिंदगी का रास्ता समाज से जुड़ने के बजाय निजी comfort खरीदने में है। जबकि वास्तविक सामाजिक जुड़ाव अक्सर aesthetic नहीं होता। पड़ोसी की मदद करना इंस्टाग्राम पर सुंदर नहीं दिखता, स्थानीय समस्या पर तीन घंटे की बैठक आरामदायक नहीं होती और किसी सामुदायिक संस्था में लगातार काम करना ‘slow morning’ जैसा आकर्षक कंटेंट नहीं बनता। फिर भी यही छोटे काम किसी शहर या समाज के भीतर भरोसा पैदा करते हैं। OECD की 2025-26 की रिपोर्टिंग में भी social infrastructure—यानी वे स्थान और संस्थाएं जहां लोग मिलते-जुलते हैं—को सामाजिक जुड़ाव और belonging मजबूत करने का अहम हिस्सा बताया गया है।
इस बहस में शायद ‘Soft Life’ और civic duty को एक-दूसरे का दुश्मन मानना ही सबसे बड़ी गलती है। आराम और जिम्मेदारी साथ चल सकते हैं। कोई व्यक्ति 70 घंटे काम करने से इनकार कर सकता है और फिर भी अपने मोहल्ले में सक्रिय रह सकता है। वह corporate ambition को सीमित कर सकता है, लेकिन पर्यावरण, शिक्षा या स्थानीय मुद्दों के लिए समय दे सकता है। संभव है कि कम burnout वाला व्यक्ति समाज के लिए ज्यादा उपलब्ध हो। अगर नौकरी हमारी पूरी ऊर्जा नहीं खाती, तो वही बचा हुआ समय परिवार, दोस्तों, पड़ोस और नागरिक गतिविधियों में लगाया जा सकता है। इस अर्थ में ‘Soft Life’ civic life की विरोधी नहीं, उसकी मददगार भी बन सकती है—बशर्ते ‘peace’ का मतलब isolation न हो।
खतरा वहां है जहां self-care धीरे-धीरे self-absorption बन जाए। हर असहमति को ‘toxic’, हर जिम्मेदारी को ‘emotional labour’ और हर असुविधा को अपनी शांति पर हमला मानने की आदत समाज को छोटे-छोटे निजी द्वीपों में बांट सकती है। समुदाय तभी बनता है जब लोग कभी-कभी अपनी सुविधा से बाहर निकलते हैं। किसी बीमार पड़ोसी के लिए खाना पहुंचाना, मतदान करना, स्थानीय समस्या पर सवाल उठाना, बच्चों के लिए सार्वजनिक जगह बचाने की कोशिश करना या किसी मुश्किल समय में दोस्त के साथ बैठना—इनमें से बहुत कुछ ‘soft’ नहीं है। लेकिन यही सामाजिक जीवन की बुनियाद है। अमेरिकी Surgeon General की social connection advisory ने भी चेताया था कि कमजोर सामाजिक जुड़ाव का असर केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता; स्कूलों, कार्यस्थलों और civic organizations में भागीदारी और प्रदर्शन भी प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए नई बहस शायद ‘Soft Life बनाम Hard Life’ की नहीं, बल्कि Soft Life बनाम Disconnected Life की है। थकान को उपलब्धि समझना जरूरी नहीं। हर समय महत्वाकांक्षी दिखना भी जरूरी नहीं। लेकिन निजी शांति ऐसी दीवार भी नहीं बननी चाहिए जिसके बाहर समाज की हर समस्या किसी और की जिम्मेदारी हो जाए। आराम जरूरी है, सीमाएं जरूरी हैं और अपनी जिंदगी पर नियंत्रण भी। उसी के साथ किसी समुदाय का हिस्सा बने रहना, दूसरों के लिए थोड़ा समय निकालना और साझा जिम्मेदारियों से पूरी तरह पीछे न हटना भी उतना ही जरूरी होता जा रहा है—खासकर उस दौर में जब दुनिया अकेलेपन और सामाजिक अलगाव को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामुदायिक मजबूती से जुड़ी चुनौती मान रही है।
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