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सिंगल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स पर बैन की बहस तेज, ई-कचरे पर बढ़ी चिंता
Priyanka Mathur
डिस्पोजेबल वेप्स से लेकर सस्ते पावर बैंक और कनेक्टेड गैजेट तक, छोटी उम्र वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान में लिथियम बैटरी का इस्तेमाल पर्यावरण और कचरा प्रबंधन के लिए नई चुनौती बन रहा है
इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुनिया में अब सिर्फ डिवाइस की कीमत और सुविधा की बात नहीं हो रही, बल्कि यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि इस्तेमाल के कुछ समय बाद इनका होगा क्या। डिस्पोजेबल वेप्स, सिंगल-यूज पावर बैंक और कम कीमत वाले छोटे कनेक्टेड गैजेट बाजार में आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन इनका जीवन खत्म होने के बाद ये सामान्य कचरे की तरह फेंक दिए जाएं तो समस्या बढ़ सकती है। खासकर उन उत्पादों को लेकर चिंता ज्यादा है जिनके अंदर छोटी लिथियम-आयन बैटरी लगी होती है। ऐसे इलेक्ट्रॉनिक कचरे को अलग तरीके से इकट्ठा करना और सुरक्षित तरीके से रिसाइकिल करना जरूरी होता है। भारत में भी ई-वेस्ट और बैटरी कचरे को लेकर नियम पहले से मौजूद हैं। केंद्र सरकार ने ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022 और बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022 लागू किए हैं, जिनमें उत्पादकों की जिम्मेदारी और Extended Producer Responsibility यानी EPR जैसी व्यवस्था शामिल है। मार्च 2026 में सरकार ने संसद में भी बताया था कि ई-वेस्ट और बैटरी वेस्ट समेत अलग-अलग कचरा श्रेणियों के लिए EPR आधारित व्यवस्था लागू है।
इस पूरी बहस का सबसे सीधा सवाल यही है कि क्या ऐसी इलेक्ट्रॉनिक चीजों को ही बाजार से हटाने का समय आ गया है, जिनका इस्तेमाल एक बार या बहुत कम समय के लिए होता है? समर्थकों का तर्क है कि जिस उत्पाद में बैटरी, सर्किट बोर्ड, प्लास्टिक और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक हिस्से लगे हों, उसे कुछ ही दिनों या हफ्तों में कचरे में बदलना संसाधनों की बर्बादी है। लिथियम, कोबाल्ट और दूसरे जरूरी खनिजों की माइनिंग से लेकर बैटरी बनाने और फिर उसे निपटाने तक पूरी सप्लाई चेन का पर्यावरण पर असर पड़ता है। दूसरी तरफ इंडस्ट्री का तर्क हो सकता है कि हर सिंगल-यूज इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद पर सीधा प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक नहीं होगा। कुछ छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ऐसे भी हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों में जरूरी है। ऐसे में उत्पाद पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय डिजाइन, बैटरी की क्षमता, रिपेयर, रीयूज और अनिवार्य टेक-बैक जैसी व्यवस्था लागू करने का रास्ता भी चर्चा में है।
डिस्पोजेबल वेप्स इस बहस का सबसे चर्चित उदाहरण बन चुके हैं। ब्रिटेन ने 1 जून 2025 से डिस्पोजेबल वेप्स पर प्रतिबंध लागू किया था। 2026 में जारी एक सर्वे के मुताबिक वहां 11 से 17 साल के वेप इस्तेमाल करने वालों में मुख्य रूप से डिस्पोजेबल वेप इस्तेमाल करने वालों का अनुपात 2025 के 42% से घटकर 13% रह गया। वयस्कों में भी यह हिस्सा 24% से घटकर 8% बताया गया। इससे समर्थकों को यह तर्क मिलता है कि प्रतिबंध किसी खास तरह के सिंगल-यूज उत्पाद की खपत कम कर सकता है। हालांकि प्रतिबंध के बाद भी पुराने स्टॉक, अवैध बिक्री और इस्तेमाल किए जा चुके उपकरणों के निपटान की समस्या बनी रह सकती है।
वेप्स में इस्तेमाल होने वाली छोटी बैटरियां एक और चिंता पैदा करती हैं। कचरा प्रबंधन में लिथियम-आयन बैटरियों को लेकर सुरक्षा का मुद्दा भी है। अगर ऐसी बैटरी को सामान्य कचरे में डाल दिया जाए और वह कचरा दबाव, टूटने या छंटाई की प्रक्रिया से गुजरे तो आग लगने का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उत्पाद बाजार से हटा दिए जाएं। सवाल यह भी है कि पहले से बिक चुके लाखों-करोड़ों उपकरणों को सुरक्षित तरीके से वापस कैसे लाया जाए। यही वजह है कि कुछ विशेषज्ञ और कचरा प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े लोग डिपॉजिट-रिफंड, टेक-बैक सेंटर और अलग कलेक्शन सिस्टम जैसे विकल्पों पर जोर देते हैं।
भारत के मामले में सीधे व्यापक प्रतिबंध के बजाय मौजूदा ई-वेस्ट और बैटरी वेस्ट नियमों को सख्ती से लागू करना एक विकल्प हो सकता है। उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके उपकरणों का इस्तेमाल खत्म होने के बाद उन्हें वापस लेने और रिसाइकिल करने की व्यवस्था हो। EPR का मूल विचार भी यही है कि उत्पादक अपने उत्पाद के पूरे जीवनचक्र की जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। सरकार ने ई-वेस्ट और बैटरी वेस्ट के लिए ऐसे प्रावधान पहले ही बनाए हैं। चुनौती अब इनके जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन की है।
यूरोप में भी बैटरी को लेकर नियम लगातार कड़े किए जा रहे हैं। EU के बैटरी नियमों में अलग कलेक्शन की जानकारी देने वाले चिन्ह और बैटरी की क्षमता से संबंधित लेबलिंग जैसी आवश्यकताएं शामिल हैं। आगे चलकर कुछ श्रेणियों की बैटरियों के लिए डिजिटल बैटरी पासपोर्ट जैसी व्यवस्था भी लागू हो रही है, जिसमें बैटरी की तकनीकी जानकारी, प्रदर्शन, टिकाऊपन और रिसाइक्लिंग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे उपभोक्ता और रिसाइक्लिंग सिस्टम दोनों के लिए बैटरी की पहचान आसान हो सकती है।
हालांकि हर लिथियम-आयन बैटरी वाले उत्पाद को एक ही श्रेणी में रखकर बैन करना भी सवाल खड़े करता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन और मेडिकल उपकरण जैसे कई उत्पादों में भी रिचार्जेबल बैटरियां होती हैं और उनका उपयोग एक बार करके फेंकने के लिए नहीं होता। इसलिए असली मुद्दा बैटरी का होना नहीं, बल्कि उत्पाद का डिजाइन और उसका जीवनकाल है। यदि कोई डिवाइस आसानी से खोला, रिपेयर या बैटरी बदली नहीं जा सकती और कुछ ही समय बाद पूरा उपकरण कचरे में चला जाता है, तो उस मॉडल की पर्यावरणीय लागत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे उत्पादों के लिए सरकारें न्यूनतम टिकाऊपन, रिपेयरेबिलिटी, बदली जा सकने वाली बैटरी और अनिवार्य रीसाइक्लिंग जैसे मानक तय कर सकती हैं।
सिंगल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स पर बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की संख्या लगातार बढ़ रही है और हर छोटा गैजेट अलग तरह का कचरा पैदा करता है। कनेक्टेड खिलौने, ट्रैकिंग डिवाइस, छोटे सेंसर, सस्ते हेडफोन, पावर बैंक और दूसरे बैटरी आधारित उत्पाद इस्तेमाल में भले छोटे हों, लेकिन बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने पर इनका कुल कचरा काफी बढ़ सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि किसी एक उत्पाद को बैन किया जाए या नहीं। चर्चा अब इस बात पर भी है कि इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां उत्पाद को कितने साल चलने के हिसाब से बनाती हैं, ग्राहक उसे कितनी आसानी से रिपेयर करा सकता है और खराब होने के बाद कंपनी उसे वापस लेकर सही तरीके से रिसाइकिल करती है या नहीं। इसी जगह पर्यावरणीय स्थिरता, उपभोक्ता सुविधा और कारोबार के बीच संतुलन बनाने की चुनौती सामने आती है।
सिंगल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स पर बैन की बहस तेज, ई-कचरे पर बढ़ी चिंता
Priyanka Mathur
इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुनिया में अब सिर्फ डिवाइस की कीमत और सुविधा की बात नहीं हो रही, बल्कि यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि इस्तेमाल के कुछ समय बाद इनका होगा क्या। डिस्पोजेबल वेप्स, सिंगल-यूज पावर बैंक और कम कीमत वाले छोटे कनेक्टेड गैजेट बाजार में आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन इनका जीवन खत्म होने के बाद ये सामान्य कचरे की तरह फेंक दिए जाएं तो समस्या बढ़ सकती है। खासकर उन उत्पादों को लेकर चिंता ज्यादा है जिनके अंदर छोटी लिथियम-आयन बैटरी लगी होती है। ऐसे इलेक्ट्रॉनिक कचरे को अलग तरीके से इकट्ठा करना और सुरक्षित तरीके से रिसाइकिल करना जरूरी होता है। भारत में भी ई-वेस्ट और बैटरी कचरे को लेकर नियम पहले से मौजूद हैं। केंद्र सरकार ने ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022 और बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022 लागू किए हैं, जिनमें उत्पादकों की जिम्मेदारी और Extended Producer Responsibility यानी EPR जैसी व्यवस्था शामिल है। मार्च 2026 में सरकार ने संसद में भी बताया था कि ई-वेस्ट और बैटरी वेस्ट समेत अलग-अलग कचरा श्रेणियों के लिए EPR आधारित व्यवस्था लागू है।
इस पूरी बहस का सबसे सीधा सवाल यही है कि क्या ऐसी इलेक्ट्रॉनिक चीजों को ही बाजार से हटाने का समय आ गया है, जिनका इस्तेमाल एक बार या बहुत कम समय के लिए होता है? समर्थकों का तर्क है कि जिस उत्पाद में बैटरी, सर्किट बोर्ड, प्लास्टिक और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक हिस्से लगे हों, उसे कुछ ही दिनों या हफ्तों में कचरे में बदलना संसाधनों की बर्बादी है। लिथियम, कोबाल्ट और दूसरे जरूरी खनिजों की माइनिंग से लेकर बैटरी बनाने और फिर उसे निपटाने तक पूरी सप्लाई चेन का पर्यावरण पर असर पड़ता है। दूसरी तरफ इंडस्ट्री का तर्क हो सकता है कि हर सिंगल-यूज इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद पर सीधा प्रतिबंध लगाना व्यावहारिक नहीं होगा। कुछ छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ऐसे भी हो सकते हैं जिनका इस्तेमाल विशेष परिस्थितियों में जरूरी है। ऐसे में उत्पाद पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय डिजाइन, बैटरी की क्षमता, रिपेयर, रीयूज और अनिवार्य टेक-बैक जैसी व्यवस्था लागू करने का रास्ता भी चर्चा में है।
डिस्पोजेबल वेप्स इस बहस का सबसे चर्चित उदाहरण बन चुके हैं। ब्रिटेन ने 1 जून 2025 से डिस्पोजेबल वेप्स पर प्रतिबंध लागू किया था। 2026 में जारी एक सर्वे के मुताबिक वहां 11 से 17 साल के वेप इस्तेमाल करने वालों में मुख्य रूप से डिस्पोजेबल वेप इस्तेमाल करने वालों का अनुपात 2025 के 42% से घटकर 13% रह गया। वयस्कों में भी यह हिस्सा 24% से घटकर 8% बताया गया। इससे समर्थकों को यह तर्क मिलता है कि प्रतिबंध किसी खास तरह के सिंगल-यूज उत्पाद की खपत कम कर सकता है। हालांकि प्रतिबंध के बाद भी पुराने स्टॉक, अवैध बिक्री और इस्तेमाल किए जा चुके उपकरणों के निपटान की समस्या बनी रह सकती है।
वेप्स में इस्तेमाल होने वाली छोटी बैटरियां एक और चिंता पैदा करती हैं। कचरा प्रबंधन में लिथियम-आयन बैटरियों को लेकर सुरक्षा का मुद्दा भी है। अगर ऐसी बैटरी को सामान्य कचरे में डाल दिया जाए और वह कचरा दबाव, टूटने या छंटाई की प्रक्रिया से गुजरे तो आग लगने का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उत्पाद बाजार से हटा दिए जाएं। सवाल यह भी है कि पहले से बिक चुके लाखों-करोड़ों उपकरणों को सुरक्षित तरीके से वापस कैसे लाया जाए। यही वजह है कि कुछ विशेषज्ञ और कचरा प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े लोग डिपॉजिट-रिफंड, टेक-बैक सेंटर और अलग कलेक्शन सिस्टम जैसे विकल्पों पर जोर देते हैं।
भारत के मामले में सीधे व्यापक प्रतिबंध के बजाय मौजूदा ई-वेस्ट और बैटरी वेस्ट नियमों को सख्ती से लागू करना एक विकल्प हो सकता है। उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके उपकरणों का इस्तेमाल खत्म होने के बाद उन्हें वापस लेने और रिसाइकिल करने की व्यवस्था हो। EPR का मूल विचार भी यही है कि उत्पादक अपने उत्पाद के पूरे जीवनचक्र की जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। सरकार ने ई-वेस्ट और बैटरी वेस्ट के लिए ऐसे प्रावधान पहले ही बनाए हैं। चुनौती अब इनके जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन की है।
यूरोप में भी बैटरी को लेकर नियम लगातार कड़े किए जा रहे हैं। EU के बैटरी नियमों में अलग कलेक्शन की जानकारी देने वाले चिन्ह और बैटरी की क्षमता से संबंधित लेबलिंग जैसी आवश्यकताएं शामिल हैं। आगे चलकर कुछ श्रेणियों की बैटरियों के लिए डिजिटल बैटरी पासपोर्ट जैसी व्यवस्था भी लागू हो रही है, जिसमें बैटरी की तकनीकी जानकारी, प्रदर्शन, टिकाऊपन और रिसाइक्लिंग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे उपभोक्ता और रिसाइक्लिंग सिस्टम दोनों के लिए बैटरी की पहचान आसान हो सकती है।
हालांकि हर लिथियम-आयन बैटरी वाले उत्पाद को एक ही श्रेणी में रखकर बैन करना भी सवाल खड़े करता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन और मेडिकल उपकरण जैसे कई उत्पादों में भी रिचार्जेबल बैटरियां होती हैं और उनका उपयोग एक बार करके फेंकने के लिए नहीं होता। इसलिए असली मुद्दा बैटरी का होना नहीं, बल्कि उत्पाद का डिजाइन और उसका जीवनकाल है। यदि कोई डिवाइस आसानी से खोला, रिपेयर या बैटरी बदली नहीं जा सकती और कुछ ही समय बाद पूरा उपकरण कचरे में चला जाता है, तो उस मॉडल की पर्यावरणीय लागत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसे उत्पादों के लिए सरकारें न्यूनतम टिकाऊपन, रिपेयरेबिलिटी, बदली जा सकने वाली बैटरी और अनिवार्य रीसाइक्लिंग जैसे मानक तय कर सकती हैं।
सिंगल-यूज इलेक्ट्रॉनिक्स पर बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की संख्या लगातार बढ़ रही है और हर छोटा गैजेट अलग तरह का कचरा पैदा करता है। कनेक्टेड खिलौने, ट्रैकिंग डिवाइस, छोटे सेंसर, सस्ते हेडफोन, पावर बैंक और दूसरे बैटरी आधारित उत्पाद इस्तेमाल में भले छोटे हों, लेकिन बड़ी संख्या में इस्तेमाल होने पर इनका कुल कचरा काफी बढ़ सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि किसी एक उत्पाद को बैन किया जाए या नहीं। चर्चा अब इस बात पर भी है कि इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां उत्पाद को कितने साल चलने के हिसाब से बनाती हैं, ग्राहक उसे कितनी आसानी से रिपेयर करा सकता है और खराब होने के बाद कंपनी उसे वापस लेकर सही तरीके से रिसाइकिल करती है या नहीं। इसी जगह पर्यावरणीय स्थिरता, उपभोक्ता सुविधा और कारोबार के बीच संतुलन बनाने की चुनौती सामने आती है।
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