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‘Micro-Job’ Economy का बढ़ता चलन: आजादी या नौकरी के फायदे खत्म करने का मॉडल?
Priyanka Mathur
एक प्रोफेशनल कई कंपनियों के लिए काम कर रहा; कंपनियों को विशेषज्ञता का फायदा, लेकिन कर्मचारियों के सामने job security और benefits का सवाल
‘एक कंपनी, एक नौकरी और एक सैलरी’ का मॉडल अब बदल रहा है। Fractional Work और Portfolio Career में प्रोफेशनल एक साथ कई कंपनियों के लिए तय समय या प्रोजेक्ट के आधार पर काम कर रहे हैं। मसलन, किसी स्टार्टअप को पूरे समय CFO की जरूरत नहीं है तो वह अनुभवी CFO को कुछ घंटों या दिनों के लिए नियुक्त कर सकता है। वही विशेषज्ञ दूसरी कंपनियों के साथ भी काम कर सकता है।
कंपनियों को क्या फायदा?
कंपनियों को जरूरत के मुताबिक अनुभवी विशेषज्ञ मिल जाते हैं और पूरे समय कर्मचारी रखने की लागत कम हो सकती है। रिमोट वर्क और AI ने इस मॉडल को अपनाना और आसान किया है।
प्रोफेशनल्स के लिए फायदा
इस मॉडल में काम के घंटे और क्लाइंट चुनने की ज्यादा आजादी मिल सकती है। साथ ही एक व्यक्ति की कमाई कई कंपनियों से हो सकती है, जिससे किसी एक नियोक्ता पर निर्भरता घटती है।
लेकिन नौकरी की सुरक्षा?
फुल-टाइम कर्मचारियों को वेतन के साथ छुट्टी, बीमा और रिटायरमेंट जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। वहीं स्वतंत्र प्रोफेशनल को इनका इंतजाम खुद करना पड़ता है। इसलिए ज्यादा कमाई हमेशा ज्यादा सुरक्षा का मतलब नहीं है।
क्या कंपनियां फायदा उठा रही हैं?
हर फ्रैक्शनल नौकरी को कर्मचारियों के फायदे खत्म करने की रणनीति नहीं कहा जा सकता। कई कंपनियों को सच में किसी विशेषज्ञ की पूर्णकालिक जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर कर्मचारी से पूर्णकालिक काम लिया जाए और केवल कॉन्ट्रैक्ट के नाम पर सुविधाएं हटा दी जाएं, तो यह अलग मामला है। यहां कर्मचारी की कानूनी स्थिति और अधिकार महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
भारत में भी बढ़ रहा चलन
भारत में स्वतंत्र और प्रोजेक्ट आधारित काम तेजी से बढ़ा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, देश की गिग वर्कफोर्स FY2021 के 77 लाख से बढ़कर FY2025 में करीब 1.20 करोड़ हो गई। हालांकि इसमें डिलीवरी और प्लेटफॉर्म वर्कर्स भी शामिल हैं, इसलिए इसे पूरी तरह व्हाइट-कॉलर फ्रैक्शनल वर्क के बराबर नहीं माना जा सकता।
AI बदल रहा काम का तरीका
AI की मदद से प्रोफेशनल कम समय में ज्यादा काम कर सकते हैं और कई क्लाइंट संभाल सकते हैं। दूसरी ओर, कंपनियां भी कम कर्मचारियों के साथ ज्यादा काम कराने की कोशिश कर सकती हैं। इसलिए ‘माइक्रो-जॉब’ मॉडल में असली सवाल यह है कि काम चुनने और उसकी शर्तें तय करने की ताकत कर्मचारी के पास है या कंपनी के पास।
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