गुड़ी पड़वा पर महाकाल मंदिर के शिखर पर लहराएगा ब्रह्म ध्वज, सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी है 2000 साल पुरानी परंपरा

धर्म डेस्क

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उज्जैन में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर होगा ध्वजारोहण, शक्ति और विजय के प्रतीक इस ध्वज की ऐतिहासिक परंपरा को फिर दिया जा रहा है विस्तार

हिंदू नववर्ष की शुरुआत के साथ मनाए जाने वाले गुड़ी पड़वा पर्व पर इस वर्ष भी एक प्राचीन धार्मिक परंपरा का निर्वहन किया जाएगा। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के अवसर पर मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज फहराया जाएगा। यह परंपरा लगभग दो हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है और इसे शक्ति, साहस तथा विजय का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केसरिया रंग का यह ध्वज विशेष महत्व रखता है। इसमें दो पताकाएं होती हैं और मध्य भाग में सूर्य का अंकन किया जाता है। यह प्रतीक चारों दिशाओं में विजय, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के प्रसार का संकेत माना जाता है। हिंदू नववर्ष के पहले दिन इस ध्वज के आरोहण को शुभ और मंगलकारी माना जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन काल में यह परंपरा साम्राज्य की विजय और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। उस समय विशेष अवसरों पर इस ध्वज को धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ फहराया जाता था। इसे समाज में साहस, एकता और धार्मिक आस्था का संदेश देने वाला आयोजन माना जाता है।

इतिहास से जुड़े शोध बताते हैं कि उस कालखंड में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को जनजीवन से जोड़ने की परंपरा मजबूत थी। इसी परंपरा के अंतर्गत विभिन्न अवसरों पर विशेष प्रतीकों और चिह्नों का उपयोग किया जाता था। उस दौर में जारी किए गए कुछ सिक्कों और प्रतीकों में भी इसी प्रकार के चिह्नों का उल्लेख मिलता है, जो उस समय की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।

हाल के वर्षों में इस ऐतिहासिक परंपरा को फिर से व्यापक रूप देने के प्रयास किए गए हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल की जा रही है। इस अवसर पर शहर के कई प्रमुख धार्मिक स्थलों और भवनों पर भी प्रतीकात्मक रूप से ध्वज फहराने की तैयारी की जाती है।

मंदिर प्रशासन के अनुसार श्रद्धालु भी इस परंपरा में भाग ले सकते हैं। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत मंदिर कार्यालय में बुकिंग कराई जाती है। श्रद्धालुओं को ध्वज, पूजा सामग्री और अन्य पारंपरिक व्यवस्थाओं के साथ ध्वजारोहण की व्यवस्था करनी होती है।

गुड़ी पड़वा और हिंदू नववर्ष के अवसर पर होने वाला यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन के साक्षी बनते हैं और इसे नए वर्ष की शुभ शुरुआत का प्रतीक मानते हैं।

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