शुक्रवार विशेष: लक्ष्मी पूजन और शुक्र उपायों से समृद्धि की कामना, आस्था के साथ अपनाए जा रहे पारंपरिक विधि-विधान

धर्म डेस्क

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व्रत, दान और मंत्रजाप को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह; धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सुख-समृद्धि और वैवाहिक सौभाग्य की प्रार्थना

शुक्रवार को देवी लक्ष्मी और शुक्र ग्रह से जुड़े पारंपरिक उपाय देशभर में आस्था के साथ अपनाए जा रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन लक्ष्मी पूजन, दान और मंत्रजाप करने से धन, पारिवारिक सुख और वैवाहिक जीवन में संतुलन की कामना की जाती है। सुबह स्नान के बाद श्रद्धालु सफेद वस्त्र धारण कर देवी लक्ष्मी को खीर या सफेद मिष्ठान का भोग अर्पित करते हैं और “ॐ शुं शुक्राय नमः” मंत्र का जप करते हैं।

धार्मिक परंपराओं में शुक्रवार को स्वच्छता और सौंदर्य का विशेष महत्व माना गया है। कई श्रद्धालु घर की विशेष सफाई करते हैं और शाम के समय मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाते हैं। मान्यता है कि स्वच्छ वातावरण और दीप प्रज्वलन सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। इसी क्रम में तिजोरी या धन रखने के स्थान पर सुगंधित इत्र अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है, जिसे आर्थिक स्थिरता से जोड़ा जाता है।

दान और सेवा को भी शुक्रवार के अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। श्रद्धालु दूध, दही, चावल या चीनी जैसी सफेद वस्तुएं जरूरतमंदों को दान करते हैं। कुछ स्थानों पर कन्याओं को खीर या मिष्ठान खिलाने की परंपरा निभाई जाती है। विवाहित महिलाएं सुहाग सामग्री का दान कर पारिवारिक सुख और सौभाग्य की प्रार्थना करती हैं। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि इन कर्मों का मूल उद्देश्य संयम, सेवा और सामाजिक सहयोग की भावना को मजबूत करना है।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार को शुक्र ग्रह से संबंधित उपाय करने की सलाह दी जाती है। श्रद्धालु 108 बार मंत्रजाप करते हैं और जीवों—जैसे गाय, पक्षियों और मछलियों—के लिए भोजन व जल की व्यवस्था करते हैं। इसे करुणा और दानशीलता के प्रतीकात्मक अभ्यास के रूप में भी देखा जाता है।

धर्माचार्यों का मानना है कि ये परंपराएं आध्यात्मिक अनुशासन और मानसिक संतुलन पर आधारित हैं। वे बताते हैं कि पूजा-विधि के साथ संयमित आचरण और सकारात्मक दृष्टिकोण को भी समान महत्व दिया जाता है। सामाजिक स्तर पर ये अनुष्ठान सामुदायिक सहभागिता और दान संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार धार्मिक आस्थाओं से जुड़े ये उपाय व्यक्तिगत विश्वास और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। सार्वजनिक जीवन में इनका प्रभाव आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में देखा जाता है, जो अनुशासन, स्वच्छता और दान की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है।

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