119 साल पुराना आर्य समाज मंदिर बना प्रेम विवाह का केंद्र, अब तक 34 हजार शादियां

रायपुर (छ.ग.)

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रायपुर के बैजनाथ पारा स्थित मंदिर में हर साल 1000 से अधिक जोड़े बंधते हैं विवाह सूत्र में

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित Arya Samaj Mandir Baijnath Para बीते एक सदी से अधिक समय से प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के लिए भरोसे का ठिकाना बना हुआ है। वर्ष 1907 में स्थापित इस मंदिर में अब तक 34 हजार से अधिक शादियां संपन्न हो चुकी हैं। मंदिर प्रबंधन के अनुसार यहां प्रतिवर्ष करीब 1000 से 1100 विवाह होते हैं, जबकि वैलेंटाइन डे के आसपास यह संख्या और बढ़ जाती है।

मंदिर के पदाधिकारियों का कहना है कि इसकी स्थापना उस दौर में हुई थी, जब स्वतंत्रता सेनानी Lala Lajpat Rai रायपुर आए थे। उस समय यह इलाका सेंट्रल प्रोविंसेस एंड बरार का हिस्सा था। करीब 119 वर्ष पुराने इस मंदिर ने अंग्रेजी शासन से लेकर आधुनिक दौर तक सामाजिक बदलावों को करीब से देखा है।

यह मंदिर विशेष रूप से अंतरजातीय और प्रेम विवाहों के लिए जाना जाता है। यहां वैदिक रीति से विवाह संपन्न कराए जाते हैं। मंदिर प्रशासन के अनुसार कई जोड़े परिवार के विरोध के बावजूद यहां पहुंचते हैं। ऐसे मामलों में सुरक्षा और कानूनी औपचारिकताओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय प्रशासन की मौजूदगी में भी विवाह संपन्न कराए गए हैं।

मंदिर में विवाह की प्रक्रिया पूरी तरह वैदिक मंत्रोच्चार और निर्धारित विधि-विधान के साथ होती है। साथ ही वर की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और वधू की 18 वर्ष सुनिश्चित की जाती है। पहचान पत्र और आवश्यक दस्तावेजों की जांच के बाद ही शादी की अनुमति दी जाती है।

आर्य समाज की स्थापना 1875 में Swami Dayanand Saraswati ने की थी। संस्था का उद्देश्य जात-पात और सामाजिक भेदभाव को समाप्त करना तथा वैदिक सिद्धांतों के आधार पर समाज सुधार को बढ़ावा देना था। रायपुर का यह मंदिर उसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक समरसता और समानता का संदेश देता है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह मंदिर अब केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन चुका है। यहां रोजाना विवाह के लिए जोड़े पहुंचते हैं। कुछ मामलों में परिवार बाद में सहमति भी दे देते हैं, जबकि कुछ जोड़े विवाह के बाद विधिक सुरक्षा के लिए कोर्ट का रुख करते हैं।

राजधानी रायपुर के बैजनाथ पारा में स्थित यह ऐतिहासिक स्थल आज भी प्रेम और वैदिक परंपरा के संगम के रूप में पहचाना जाता है। बदलते समय में जहां समाज में विवाह को लेकर नई सोच विकसित हो रही है, वहीं यह मंदिर प्रेम विवाह को वैध और सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

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