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बिलासपुर में सर्पदंश मुआवजा घोटाला, 17 करोड़ का फर्जीवाड़ा उजागर
बिलासपुर,(छ.ग.)
जशपुर से चार गुना ज्यादा मौतें दिखाकर सरकारी राशि हड़पी, 14 FIR दर्ज, जांच तेज
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सर्पदंश मौतों के नाम पर करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपए के मुआवजा घोटाले का बड़ा मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि जिले में वास्तविक आंकड़ों से कई गुना ज्यादा मौतें दिखाकर सरकारी राशि का गलत तरीके से वितरण किया गया। मामला तब और गंभीर हो गया जब विधानसभा में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने ध्यानाकर्षण के जरिए इस पूरे फर्जीवाड़े को उठाया। बताया जा रहा है कि बिलासपुर में 431 मौतें सर्पदंश से दिखाकर मुआवजा पास कराया गया, जबकि तुलना में जशपुर जिले में मात्र 96 मौतें दर्ज थीं। इस अंतर ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं और अब जांच एजेंसियां लगातार दस्तावेजों की पड़ताल कर रही हैं। यह पूरा घोटाला कई स्तरों पर मिलीभगत से अंजाम दिया गया। शुरुआती जांच में सामने आया है कि राजस्व विभाग, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन के कुछ कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध है। आरोप है कि कुछ मामलों में सामान्य मौत को भी सर्पदंश बताकर फर्जी पंचनामा और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बाद मुआवजे की राशि जारी कर दी गई। पुलिस जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि वकीलों और बिचौलियों की एक संगठित टीम इस पूरे नेटवर्क को संचालित कर रही थी। कई मामलों में मृतकों के परिजनों की सहमति के बिना ही दस्तावेजों में हेरफेर कर सरकारी राशि निकाली गई। अब तक इस मामले में 14 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। तोरवा, सरकंडा, सिविल लाइन, कोनी और कोतवाली थानों में अलग-अलग प्रकरण दर्ज किए गए हैं। जांच में यह भी पता चला है कि तहसील कार्यालय में कार्यरत कुछ कर्मचारी और बाहरी लोग मिलकर फर्जी दावे तैयार करते थे। एक मामले में तो महिला डॉक्टर और अन्य सह-आरोपियों पर सामान्य मौत को सर्पदंश बताकर चार लाख रुपए की राशि हड़पने का आरोप भी सामने आया है। प्रशासन का कहना है कि यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता का नहीं बल्कि एक संगठित सिंडिकेट के रूप में काम कर रहे नेटवर्क का हिस्सा प्रतीत होता है। विधानसभा में मामला उठने के बाद राजस्व मंत्री ने उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद अब कार्रवाई तेज कर दी गई है। वहीं स्थानीय लोगों के बीच इस पूरे मामले को लेकर नाराजगी और हैरानी दोनों देखी जा रही है। कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी राशि आखिर बिना गंभीर जांच के कैसे जारी हो गई। विधायक सुशांत शुक्ला ने भी इस कार्रवाई पर असंतोष जताते हुए कहा है कि जांच को और गहराई से किया जाना चाहिए ताकि सभी दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो सके। पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम दस्तावेजों, बैंक ट्रांजेक्शन और मेडिकल रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही है
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बिलासपुर में सर्पदंश मुआवजा घोटाला, 17 करोड़ का फर्जीवाड़ा उजागर
बिलासपुर,(छ.ग.)
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सर्पदंश मौतों के नाम पर करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपए के मुआवजा घोटाले का बड़ा मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि जिले में वास्तविक आंकड़ों से कई गुना ज्यादा मौतें दिखाकर सरकारी राशि का गलत तरीके से वितरण किया गया। मामला तब और गंभीर हो गया जब विधानसभा में बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने ध्यानाकर्षण के जरिए इस पूरे फर्जीवाड़े को उठाया। बताया जा रहा है कि बिलासपुर में 431 मौतें सर्पदंश से दिखाकर मुआवजा पास कराया गया, जबकि तुलना में जशपुर जिले में मात्र 96 मौतें दर्ज थीं। इस अंतर ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं और अब जांच एजेंसियां लगातार दस्तावेजों की पड़ताल कर रही हैं। यह पूरा घोटाला कई स्तरों पर मिलीभगत से अंजाम दिया गया। शुरुआती जांच में सामने आया है कि राजस्व विभाग, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासन के कुछ कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध है। आरोप है कि कुछ मामलों में सामान्य मौत को भी सर्पदंश बताकर फर्जी पंचनामा और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तैयार की गई। इसके बाद मुआवजे की राशि जारी कर दी गई। पुलिस जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि वकीलों और बिचौलियों की एक संगठित टीम इस पूरे नेटवर्क को संचालित कर रही थी। कई मामलों में मृतकों के परिजनों की सहमति के बिना ही दस्तावेजों में हेरफेर कर सरकारी राशि निकाली गई। अब तक इस मामले में 14 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। तोरवा, सरकंडा, सिविल लाइन, कोनी और कोतवाली थानों में अलग-अलग प्रकरण दर्ज किए गए हैं। जांच में यह भी पता चला है कि तहसील कार्यालय में कार्यरत कुछ कर्मचारी और बाहरी लोग मिलकर फर्जी दावे तैयार करते थे। एक मामले में तो महिला डॉक्टर और अन्य सह-आरोपियों पर सामान्य मौत को सर्पदंश बताकर चार लाख रुपए की राशि हड़पने का आरोप भी सामने आया है। प्रशासन का कहना है कि यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता का नहीं बल्कि एक संगठित सिंडिकेट के रूप में काम कर रहे नेटवर्क का हिस्सा प्रतीत होता है। विधानसभा में मामला उठने के बाद राजस्व मंत्री ने उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद अब कार्रवाई तेज कर दी गई है। वहीं स्थानीय लोगों के बीच इस पूरे मामले को लेकर नाराजगी और हैरानी दोनों देखी जा रही है। कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी राशि आखिर बिना गंभीर जांच के कैसे जारी हो गई। विधायक सुशांत शुक्ला ने भी इस कार्रवाई पर असंतोष जताते हुए कहा है कि जांच को और गहराई से किया जाना चाहिए ताकि सभी दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो सके। पुलिस और प्रशासन की संयुक्त टीम दस्तावेजों, बैंक ट्रांजेक्शन और मेडिकल रिकॉर्ड की बारीकी से जांच कर रही है
