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छत्तीसगढ़ में इंजेक्शन के बाद दो मौतें: गांवों में कौन कर रहा इलाज?
Sandeep Patel
बलरामपुर और कोंडागांव में इंजेक्शन के बाद दो मौतों ने छत्तीसगढ़ में झोलाछाप इलाज और अनधिकृत चिकित्सा पर सवाल उठाए। जानें दोनों घटनाएं और विभागीय जवाबदेही।
बलरामपुर में तीन साल के बच्चे और कोंडागांव में 32 वर्षीय महिला की इंजेक्शन के बाद मौत ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और कथित अवैध इलाज पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
छत्तीसगढ़ के दो दूरदराज इलाकों में इलाज के दौरान इंजेक्शन लगाए जाने के बाद हुई दो मौतों ने ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है। बलरामपुर में बुखार से पीड़ित तीन वर्षीय बच्चे की कथित झोलाछाप से इलाज के बाद मौत हुई, जबकि कोंडागांव में सर्दी-खांसी की शिकायत लेकर गई 32 वर्षीय महिला की इंजेक्शन लगने के बाद मौत हो गई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों मामलों में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग जांच कर रहे हैं। अभी पोस्टमार्टम या जांच से यह स्थापित नहीं हुआ है कि मौत सीधे इंजेक्शन के कारण हुई।
इन घटनाओं ने एक बड़ा सवाल सामने रखा है—दूरदराज गांवों में मरीजों का इलाज कौन कर रहा है और क्या बिना उचित अधिकार वाले लोग दवा और इंजेक्शन देने तक पहुंच रहे हैं?
बलरामपुर में बच्चे की मौत
बलरामपुर जिले के जमुआटार गांव निवासी तीन वर्षीय अभिष चेरवा को बुखार था। हालत में सुधार नहीं होने पर परिजन उसे सरनाडीह गांव में एक कथित अपात्र चिकित्सक के पास ले गए। रिपोर्टों के अनुसार वहां बच्चे को देखा गया और इंजेक्शन लगाया गया। इसके बाद उसकी हालत कथित तौर पर बिगड़ गई और घर ले जाते समय बच्चे की मौत हो गई।
परिजनों ने इलाज करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मामले में पुलिस जांच कर रही है और मौत के वास्तविक कारण का निर्धारण पोस्टमार्टम तथा अन्य जांच के बाद ही किया जा सकेगा।
इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि बच्चे की मौत इंजेक्शन से ही हुई। फिलहाल तथ्य इतना है कि कथित उपचार और इंजेक्शन के बाद बच्चे की हालत बिगड़ी और उसकी मृत्यु हो गई।
कोंडागांव में महिला की मौत
दूसरी घटना कोंडागांव जिले के विश्रामपुरी क्षेत्र की है। यहां 32 वर्षीय मिथिला नेताम, जो तीन बच्चों की मां थीं, सर्दी-खांसी की शिकायत के बाद इलाज कराने गई थीं।
परिजनों का आरोप है कि विश्रामपुरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ लैब टेक्नीशियन सहदेव वर्मा ने अपने निजी क्लीनिक में महिला को इंजेक्शन लगाया। इसके बाद महिला की तबीयत अचानक बिगड़ी और उनकी मौत हो गई।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने मीडिया को बताया कि संबंधित व्यक्ति को मरीजों का इलाज करने या इंजेक्शन लगाने का अधिकार नहीं था। मामले में पुलिस जांच जारी है। यहां भी पोस्टमार्टम और जांच के निष्कर्ष से ही मृत्यु के कारण पर अंतिम निष्कर्ष निकलेगा।
क्या लैब टेक्नीशियन इंजेक्शन लगा सकता है?
यह सवाल कोंडागांव मामले के बाद सबसे महत्वपूर्ण है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के Medical Laboratory Science Model Curriculum में मेडिकल लैब प्रोफेशनल्स की मुख्य भूमिका रक्त, मूत्र और अन्य जैविक नमूनों के संग्रह, प्रसंस्करण और प्रयोगशाला जांच से जुड़ी बताई गई है।
दूसरी ओर, किसी मरीज को दवा देना, उसका उपचार तय करना या इंजेक्शन लगाना केवल इसलिए किसी व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता क्योंकि वह स्वास्थ्य विभाग में लैब टेक्नीशियन के पद पर काम करता है। इंजेक्शन का प्रशासन प्रशिक्षित और अधिकृत स्वास्थ्यकर्मी, उचित चिकित्सकीय आदेश तथा संस्थागत प्रोटोकॉल के तहत होना चाहिए।
केंद्रीय Clinical Establishments के मानकों में भी दवा देने से पहले मरीज, दवा, खुराक, मार्ग और समय की पुष्टि तथा सुरक्षित इंजेक्शन प्रथाओं का पालन करने की बात कही गई है।
इसलिए कोंडागांव मामले में जांच का एक अहम बिंदु यह होना चाहिए कि क्या इंजेक्शन लगाने वाले व्यक्ति के पास उस उपचार को करने की वैधानिक और पेशेवर अनुमति थी।
CG में अवैध क्लीनिक कितने?
यहां सबसे जरूरी सावधानी आंकड़ों को लेकर है। उपलब्ध सार्वजनिक और ताजा स्रोतों से पूरे छत्तीसगढ़ में इस समय संचालित अवैध क्लीनिकों की विश्वसनीय राज्यव्यापी संख्या स्थापित नहीं होती। इसलिए बिना आधिकारिक जिला-वार रिकॉर्ड के कोई संख्या बताना भ्रामक होगा।
लेकिन कार्रवाई के रिकॉर्ड बताते हैं कि समस्या अलग-अलग जिलों में सामने आती रही है।
जून 2025 में कोरिया जिले में दो गैर-पंजीकृत क्लीनिक सील किए गए थे। एक क्लीनिक में बिना वैध डिग्री के चिकित्सकीय गतिविधियां और इंजेक्शन जैसी सामग्री मिली थी।
अक्टूबर 2025 में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में स्वास्थ्य विभाग ने दो निजी क्लीनिक, एक पैथोलॉजी लैब और एक मेडिकल स्टोर सील किया था। विभाग ने बिना पंजीयन चिकित्सा व्यवसाय करने वालों के खिलाफ एफआईआर की चेतावनी भी दी थी।
इसी अवधि में बलरामपुर-रामानुजगंज में भी बिना पंजीयन और मेडिकल डिग्री के चल रहे कथित फर्जी डॉक्टरों तथा अवैध क्लीनिकों पर कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई थी।
इससे समस्या के अस्तित्व की पुष्टि होती है, लेकिन इन अलग-अलग कार्रवाइयों को जोड़कर पूरे राज्य में अवैध क्लीनिकों की कुल संख्या बताना उचित नहीं होगा।
पिछले साल कितने गलत इलाज?
‘गलत इलाज’ या ‘मेडिकल नेग्लिजेंस’ के पूरे राज्य के पिछले एक वर्ष के मामलों की कोई एकीकृत, ताजा और सार्वजनिक सरकारी संख्या उपलब्ध नहीं मिली।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर इलाज के बाद हुई मृत्यु को चिकित्सा लापरवाही नहीं माना जा सकता। किसी मामले में लापरवाही स्थापित करने के लिए मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार का तरीका, विशेषज्ञ राय, पोस्टमार्टम, जांच और परिस्थितियों को देखना पड़ता है।
फिर भी पिछले वर्ष कथित झोलाछाप इलाज को लेकर कार्रवाई के कई उदाहरण सामने आए हैं। अक्टूबर 2025 में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में एक बच्ची की मौत के बाद अवैध क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब सील किए जाने की रिपोर्ट आई थी।
यानी समस्या को केवल दो ताजा घटनाओं तक सीमित करना भी सही तस्वीर नहीं देगा।
शिकायत किससे करें?
यदि किसी गांव में बिना पंजीकरण इलाज, कथित झोलाछाप डॉक्टर, अवैध क्लीनिक या अनधिकृत व्यक्ति द्वारा उपचार की शिकायत है, तो प्राथमिक स्तर पर जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) और संबंधित ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) को शिकायत दी जा सकती है।
Clinical Establishments व्यवस्था में जिला स्तर की निगरानी और पंजीकरण की भूमिका महत्वपूर्ण है। केंद्र की व्यवस्था में District Registration Authority जैसी संस्थागत व्यवस्था का प्रावधान है।
यदि तत्काल खतरा हो या इलाज के दौरान गंभीर घटना हुई हो, तो पुलिस को भी सूचना देना जरूरी है। शिकायत के साथ क्लीनिक का पता, संचालक का नाम, उपलब्ध पर्ची/दवा, बिल, मेडिकल रिकॉर्ड, फोटो या वीडियो और घटना की तारीख जैसी जानकारी सुरक्षित रखना जांच में मदद कर सकता है।
असली जवाबदेही का सवाल
इन दोनों मौतों का अंतिम कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। इसलिए अभी किसी इंजेक्शन को सीधे मौत का कारण बताना जल्दबाजी होगी।
लेकिन दोनों घटनाओं ने इससे बड़ा सवाल जरूर उठाया है:
क्या ग्रामीण छत्तीसगढ़ में मरीजों को समय पर पंजीकृत और योग्य चिकित्सा सुविधा मिल रही है, और क्या स्वास्थ्य विभाग को यह पता है कि गांवों में कौन इलाज कर रहा है?
सरकार के पास एक ओर सरकारी स्वास्थ्य केंद्र, मोबाइल मेडिकल यूनिट और टेली-कंसल्टेशन जैसी व्यवस्थाएं हैं। केंद्र सरकार के अनुसार छत्तीसगढ़ में सितंबर 2025 तक 30 Mobile Medical Units तैनात थीं और जनवरी 2026 तक राज्य में 44.05 लाख टेली-कंसल्टेशन दर्ज किए गए थे।
फिर भी अगर सामान्य बुखार या सर्दी-खांसी के मरीज कथित रूप से अनधिकृत लोगों के पास इलाज कराने पहुंच रहे हैं, तो केवल कार्रवाई के बाद क्लीनिक सील करना पर्याप्त नहीं होगा। नियमित निरीक्षण, पंजीकृत चिकित्सकों की उपलब्धता, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की पहुंच और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई—इन सभी की जवाबदेही तय करनी होगी।
दोनों घटनाओं का सार
| मामला | उपलब्ध जानकारी | जांच की स्थिति |
|---|---|---|
| बलरामपुर | 3 वर्षीय अभिष चेरवा; बुखार; कथित अपात्र व्यक्ति ने इंजेक्शन लगाया | पुलिस/मेडिकल जांच; अंतिम कारण लंबित |
| कोंडागांव | 32 वर्षीय मिथिला नेताम; सर्दी-खांसी; कथित लैब टेक्नीशियन ने इंजेक्शन लगाया | पुलिस जांच; अंतिम कारण लंबित |
| मुख्य सवाल | क्या अनधिकृत व्यक्ति उपचार/इंजेक्शन दे रहे थे? | जांच के बाद स्पष्ट होगा |
| राज्यव्यापी अवैध क्लीनिक | विश्वसनीय ताजा कुल संख्या उपलब्ध नहीं | जिला-वार डेटा जरूरी |
| शिकायत | CMHO/BMO, संबंधित जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण और जरूरत पर पुलिस | दस्तावेज सहित शिकायत उपयोगी |
निष्कर्ष: बलरामपुर और कोंडागांव की घटनाएं अभी जांच के स्तर पर हैं। दोनों में इंजेक्शन के बाद मौत हुई, लेकिन इंजेक्शन को मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण अभी स्थापित नहीं किया गया है। असली जवाबदेही यह पता लगाने में है कि मरीजों का इलाज किसने किया, उसके पास क्या वैधानिक अधिकार था, क्लीनिक पंजीकृत था या नहीं और स्वास्थ्य विभाग को ऐसी गतिविधियों की जानकारी क्यों नहीं मिली।
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