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मौत के बाद मिला प्रमोशन, परिवार को मिला 2002 से पदोन्नति लाभ, हाईकोर्ट ने कहा- अधिकार मौत से खत्म नहीं होते
ग्वालियर (म.प्र.)
ग्वालियर में हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में दिवंगत कर्मचारी को 2002 से पदोन्नत मानते हुए उनके परिवार को सभी वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया।
ग्वालियर में एक अहम न्यायिक फैसले ने यह साबित कर दिया कि किसी व्यक्ति के अधिकार उसकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते। लंबे समय से लंबित एक मामले में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने दिवंगत कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके परिवार को न्याय दिलाया। यह निर्णय न केवल संबंधित परिवार के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सरकारी सेवा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
पूरा मामला क्या है
यह मामला सीनियर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर रहे डॉ. राधाकृष्ण शर्मा से जुड़ा है। वे अपने विभाग में वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति के पात्र थे, लेकिन वर्ष 2002 में हुई प्रमोशन प्रक्रिया में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उनकी जगह उनके जूनियर अधिकारियों को पदोन्नत कर दिया गया, जिससे उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।
विभाग का पक्ष और विवाद की वजह
विभाग ने पदोन्नति न देने के पीछे दो मुख्य कारण बताए थे। पहला, डॉ. शर्मा के खिलाफ लंबित आपराधिक मामला और दूसरा, उनकी गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर। हालांकि, समय के साथ वे उस आपराधिक मामले से पूरी तरह बरी हो गए। इसके बावजूद विभाग ने उनकी पदोन्नति पर पुनर्विचार नहीं किया, जो बाद में विवाद का मुख्य कारण बना।
न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई
अपना हक पाने के लिए डॉ. शर्मा ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह कानूनी संघर्ष लंबा चला और करीब 18 साल तक मामला अदालत में विचाराधीन रहा। दुर्भाग्यवश, इस दौरान डॉ. शर्मा का निधन हो गया। इसके बाद उनके पुत्र रमन शर्मा ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया और न्याय की उम्मीद बनाए रखी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही या गलती के कारण पदोन्नति से वंचित किया जाता है, तो उसे उसका पूरा लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि “नो वर्क-नो पे” का सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होता, जहां गलती कर्मचारी की नहीं बल्कि विभाग की हो।
कोर्ट ने यह भी माना कि बिना बताए गए एसीआर को पदोन्नति का आधार बनाना कानून के विरुद्ध है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
अंतिम आदेश और परिवार को राहत
अदालत ने अपने अंतिम आदेश में निर्देश दिया कि डॉ. राधाकृष्ण शर्मा को 28 अक्टूबर 2002 से पदोन्नत माना जाए। साथ ही, उसी तारीख से उनके वेतन, एरियर, वरिष्ठता और अन्य सभी लाभों की गणना कर पूरी राशि उनके परिवार को दी जाए।
इस फैसले में अदालत ने साफ किया कि पदोन्नति न मिलना डॉ. शर्मा की गलती नहीं थी, बल्कि यह विभाग की लापरवाही का परिणाम था।
फैसले का व्यापक महत्व
यह निर्णय केवल एक व्यक्ति के परिवार को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक मजबूत संदेश देता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अधिकारों का अंत नहीं होता।
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मौत के बाद मिला प्रमोशन, परिवार को मिला 2002 से पदोन्नति लाभ, हाईकोर्ट ने कहा- अधिकार मौत से खत्म नहीं होते
ग्वालियर (म.प्र.)
ग्वालियर में एक अहम न्यायिक फैसले ने यह साबित कर दिया कि किसी व्यक्ति के अधिकार उसकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होते। लंबे समय से लंबित एक मामले में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने दिवंगत कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके परिवार को न्याय दिलाया। यह निर्णय न केवल संबंधित परिवार के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि सरकारी सेवा से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
पूरा मामला क्या है
यह मामला सीनियर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर रहे डॉ. राधाकृष्ण शर्मा से जुड़ा है। वे अपने विभाग में वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति के पात्र थे, लेकिन वर्ष 2002 में हुई प्रमोशन प्रक्रिया में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उनकी जगह उनके जूनियर अधिकारियों को पदोन्नत कर दिया गया, जिससे उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ा।
विभाग का पक्ष और विवाद की वजह
विभाग ने पदोन्नति न देने के पीछे दो मुख्य कारण बताए थे। पहला, डॉ. शर्मा के खिलाफ लंबित आपराधिक मामला और दूसरा, उनकी गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर। हालांकि, समय के साथ वे उस आपराधिक मामले से पूरी तरह बरी हो गए। इसके बावजूद विभाग ने उनकी पदोन्नति पर पुनर्विचार नहीं किया, जो बाद में विवाद का मुख्य कारण बना।
न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई
अपना हक पाने के लिए डॉ. शर्मा ने वर्ष 2008 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह कानूनी संघर्ष लंबा चला और करीब 18 साल तक मामला अदालत में विचाराधीन रहा। दुर्भाग्यवश, इस दौरान डॉ. शर्मा का निधन हो गया। इसके बाद उनके पुत्र रमन शर्मा ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया और न्याय की उम्मीद बनाए रखी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही या गलती के कारण पदोन्नति से वंचित किया जाता है, तो उसे उसका पूरा लाभ मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि “नो वर्क-नो पे” का सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होता, जहां गलती कर्मचारी की नहीं बल्कि विभाग की हो।
कोर्ट ने यह भी माना कि बिना बताए गए एसीआर को पदोन्नति का आधार बनाना कानून के विरुद्ध है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
अंतिम आदेश और परिवार को राहत
अदालत ने अपने अंतिम आदेश में निर्देश दिया कि डॉ. राधाकृष्ण शर्मा को 28 अक्टूबर 2002 से पदोन्नत माना जाए। साथ ही, उसी तारीख से उनके वेतन, एरियर, वरिष्ठता और अन्य सभी लाभों की गणना कर पूरी राशि उनके परिवार को दी जाए।
इस फैसले में अदालत ने साफ किया कि पदोन्नति न मिलना डॉ. शर्मा की गलती नहीं थी, बल्कि यह विभाग की लापरवाही का परिणाम था।
फैसले का व्यापक महत्व
यह निर्णय केवल एक व्यक्ति के परिवार को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक मजबूत संदेश देता है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अधिकारों का अंत नहीं होता।
