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MPPSC मेंस परीक्षा से रोक हटी, अभ्यर्थियों को बड़ी राहत
मध्यप्रदेश
हाईकोर्ट ने दी परीक्षा कराने की अनुमति, लेकिन रिजर्वेशन और मेरिट विवाद पर अंतिम फैसला अभी बाकी
मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (Madhya Pradesh Public Service Commission) की राज्य सेवा मुख्य परीक्षा-2025 को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद आखिरकार फिलहाल एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार को इस परीक्षा पर लगी अंतरिम रोक को हटा दिया है, जिसके बाद अब परीक्षा आयोजित करने का रास्ता साफ हो गया है। करीब डेढ़ साल से अटकी इस प्रक्रिया से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से आगे की चयन प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे। यह फैसला हाईकोर्ट की युगलपीठ, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की बेंच ने सुनाया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल मुख्य परीक्षा को लेकर अंतरिम राहत है और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े मूल कानूनी एवं संवैधानिक मुद्दों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को तय की गई है, जिसमें इन विवादों पर विस्तृत विचार किया जाएगा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग की गई थी कि परीक्षा पर लगी रोक हटाई जाए ताकि अभ्यर्थियों का भविष्य अनिश्चितता में न रहे। दलील दी गई कि भर्ती प्रक्रिया पहले ही काफी लंबी हो चुकी है और इसे और रोके रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर अदालत ने परीक्षा आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी, लेकिन सभी कानूनी प्रश्नों को सुरक्षित रखा है।
इस पूरे विवाद की जड़ में प्रारंभिक परीक्षा 2025 से जुड़े कई अहम मुद्दे हैं। सबसे बड़ा सवाल वर्गवार कटऑफ सार्वजनिक न किए जाने को लेकर उठाया गया। अभ्यर्थियों का आरोप है कि मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने विस्तृत कटऑफ जारी नहीं किया, जिससे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत कटऑफ को खोलकर याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए थे। दूसरा बड़ा विवाद ओपन मेरिट सीटों को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ओबीसी, एससी, एसटी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के वे अभ्यर्थी, जिन्होंने सामान्य वर्ग के बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें अनारक्षित सीटों पर समायोजित किया जाना चाहिए। लेकिन आयोग की नीति को लेकर यह मुद्दा लगातार विवाद का कारण बना हुआ है। इसी तरह आयु सीमा में छूट पाने वाले अभ्यर्थियों के माइग्रेशन यानी सामान्य वर्ग में समायोजन के नियमों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने इन्हीं सभी बिंदुओं को गंभीर मानते हुए पहले मुख्य परीक्षा पर रोक लगा दी थी। अब रोक हटने के बाद परीक्षा प्रक्रिया फिर से शुरू हो सकेगी, लेकिन अंतिम निर्णय पर सबकी नजर बनी हुई है। इस मामले में यह भी कहा गया कि चयन प्रक्रिया लगातार लंबी होती जा रही है, जिससे अभ्यर्थियों की तैयारी और करियर दोनों प्रभावित हो रहे हैं। पहले जहां चयन एक साल में पूरा हो जाता था, वहीं अब यह प्रक्रिया डेढ़ से दो साल तक खिंच रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सेवा परीक्षाओं के पिछले संस्करण भी कानूनी विवादों में फंसे रहे हैं। 2019 और 2023 की परीक्षाओं के मामले भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे, जहां लंबी सुनवाई के बाद चयन प्रक्रिया आगे बढ़ पाई थी। इस बार भी वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां एक तरफ परीक्षा प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आरक्षण, मेरिट और माइग्रेशन जैसे मुद्दों पर अंतिम न्यायिक निर्णय का इंतजार जारी रहेगा।
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MPPSC मेंस परीक्षा से रोक हटी, अभ्यर्थियों को बड़ी राहत
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मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (Madhya Pradesh Public Service Commission) की राज्य सेवा मुख्य परीक्षा-2025 को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद आखिरकार फिलहाल एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार को इस परीक्षा पर लगी अंतरिम रोक को हटा दिया है, जिसके बाद अब परीक्षा आयोजित करने का रास्ता साफ हो गया है। करीब डेढ़ साल से अटकी इस प्रक्रिया से जुड़े हजारों अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से आगे की चयन प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे। यह फैसला हाईकोर्ट की युगलपीठ, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की बेंच ने सुनाया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल मुख्य परीक्षा को लेकर अंतरिम राहत है और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े मूल कानूनी एवं संवैधानिक मुद्दों पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई 2026 को तय की गई है, जिसमें इन विवादों पर विस्तृत विचार किया जाएगा। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग की गई थी कि परीक्षा पर लगी रोक हटाई जाए ताकि अभ्यर्थियों का भविष्य अनिश्चितता में न रहे। दलील दी गई कि भर्ती प्रक्रिया पहले ही काफी लंबी हो चुकी है और इसे और रोके रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर अदालत ने परीक्षा आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी, लेकिन सभी कानूनी प्रश्नों को सुरक्षित रखा है।
इस पूरे विवाद की जड़ में प्रारंभिक परीक्षा 2025 से जुड़े कई अहम मुद्दे हैं। सबसे बड़ा सवाल वर्गवार कटऑफ सार्वजनिक न किए जाने को लेकर उठाया गया। अभ्यर्थियों का आरोप है कि मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ने विस्तृत कटऑफ जारी नहीं किया, जिससे चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत कटऑफ को खोलकर याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए थे। दूसरा बड़ा विवाद ओपन मेरिट सीटों को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ओबीसी, एससी, एसटी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के वे अभ्यर्थी, जिन्होंने सामान्य वर्ग के बराबर या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उन्हें अनारक्षित सीटों पर समायोजित किया जाना चाहिए। लेकिन आयोग की नीति को लेकर यह मुद्दा लगातार विवाद का कारण बना हुआ है। इसी तरह आयु सीमा में छूट पाने वाले अभ्यर्थियों के माइग्रेशन यानी सामान्य वर्ग में समायोजन के नियमों की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने इन्हीं सभी बिंदुओं को गंभीर मानते हुए पहले मुख्य परीक्षा पर रोक लगा दी थी। अब रोक हटने के बाद परीक्षा प्रक्रिया फिर से शुरू हो सकेगी, लेकिन अंतिम निर्णय पर सबकी नजर बनी हुई है। इस मामले में यह भी कहा गया कि चयन प्रक्रिया लगातार लंबी होती जा रही है, जिससे अभ्यर्थियों की तैयारी और करियर दोनों प्रभावित हो रहे हैं। पहले जहां चयन एक साल में पूरा हो जाता था, वहीं अब यह प्रक्रिया डेढ़ से दो साल तक खिंच रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सेवा परीक्षाओं के पिछले संस्करण भी कानूनी विवादों में फंसे रहे हैं। 2019 और 2023 की परीक्षाओं के मामले भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे, जहां लंबी सुनवाई के बाद चयन प्रक्रिया आगे बढ़ पाई थी। इस बार भी वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां एक तरफ परीक्षा प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, वहीं दूसरी तरफ आरक्षण, मेरिट और माइग्रेशन जैसे मुद्दों पर अंतिम न्यायिक निर्णय का इंतजार जारी रहेगा।
