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रेलवे सिग्नल केबल चोरी: भोपाल की घटना ने सुरक्षा पर उठाए सवाल
Sandeep Patel
भोपाल रेलवे यार्ड में सिग्नल केबल चोरी से चार ट्रेनें प्रभावित हुईं। जानें कॉपर चोरी से सिग्नल कैसे बिगड़ते हैं और MP में जांच क्यों अहम है।
मध्य प्रदेश के भोपाल में रेलवे यार्ड से सिग्नल केबल चोरी होने के बाद चार यात्री ट्रेनों के परिचालन पर असर पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रेनों को करीब 30 से 60 मिनट तक देरी का सामना करना पड़ा। रेलवे अधिकारियों ने इस घटना को सिर्फ संपत्ति चोरी नहीं, बल्कि परिचालन और सुरक्षा से जुड़ी चिंता के तौर पर देखा है।
कॉपर की कीमत और कबाड़ बाजार में इसकी मांग के कारण रेलवे केबल चोरों के लिए आकर्षक निशाना बनती हैं। हालांकि, भोपाल की घटना के आधार पर अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरे मध्य प्रदेश में कोई बड़ा संगठित गिरोह सक्रिय है। इस दिशा में जांच की जरूरत जरूर बढ़ गई है।
सिग्नल केबल क्यों अहम है
रेलवे सिग्नलिंग सिस्टम ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सिग्नल, ट्रैक सर्किट और दूसरे उपकरणों के बीच विद्युत संचार के लिए अलग-अलग प्रकार की केबल का इस्तेमाल होता है।
जब ऐसी केबल काट दी जाती है या चोरी हो जाती है, तो सिग्नलिंग सिस्टम में खराबी आ सकती है। सुरक्षा व्यवस्था का डिजाइन इस तरह किया जाता है कि सिस्टम में गंभीर खराबी आने पर ट्रेन परिचालन को रोकना या नियंत्रित करना सुरक्षित विकल्प बन सके। इसी कारण केबल चोरी का तत्काल असर ट्रेनों की गति और संचालन पर पड़ सकता है।
क्या दुर्घटना का खतरा बढ़ता है
केबल चोरी का मतलब यह नहीं है कि हर घटना सीधे ट्रेन दुर्घटना में बदल जाएगी। आधुनिक रेलवे सिग्नलिंग में कई सुरक्षा उपाय होते हैं और खराबी की स्थिति में सिस्टम सुरक्षित स्थिति की ओर जाता है।
लेकिन सिग्नलिंग उपकरणों के साथ छेड़छाड़ गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है। खराबी के कारण ट्रेनों को रोकना, गति नियंत्रित करना या वैकल्पिक संचालन व्यवस्था लागू करना पड़ सकता है। सबसे बड़ा खतरा तब पैदा हो सकता है जब किसी नुकसान का समय पर पता न चले या सुरक्षा प्रक्रिया को दरकिनार किया जाए।
भोपाल की घटना में उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार फिलहाल ट्रेनों में देरी हुई; किसी दुर्घटना की सूचना नहीं है।
MP में कितनी चोरियां हुईं
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। पिछले एक वर्ष में मध्य प्रदेश में सिर्फ रेलवे कॉपर या सिग्नल केबल चोरी के मामलों का भरोसेमंद, समेकित सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी निश्चित संख्या को राज्य का आधिकारिक आंकड़ा बताना उचित नहीं होगा।
हालांकि, व्यापक रेलवे अपराध के आंकड़े मध्य प्रदेश में चोरी की समस्या का बड़ा आकार दिखाते हैं। NCRB के 2023 के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में GRP के तहत 11,551 मामले दर्ज हुए थे, जिनमें 10,561 चोरी के मामले थे। यह आंकड़ा यात्रियों और रेलवे से जुड़े सभी तरह के चोरी के मामलों को समेटता है, इसलिए इसे कॉपर केबल चोरी का आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
कबाड़ बाजार तक कैसे पहुंचता है
कॉपर चोरी का आर्थिक आकर्षण इसकी कबाड़ कीमत में है। चोरी की गई केबल को अलग-अलग तरीकों से धातु में बदलकर कबाड़ बाजार में बेचने की कोशिश की जा सकती है।
अन्य राज्यों में रेलवे कॉपर केबल चोरी के मामलों में चोरों के साथ कथित खरीदार या रिसीवर भी पकड़े गए हैं। 2025 में कोयंबटूर के एक मामले में RPF ने केबल चोरी के आरोपियों के साथ चोरी की केबल खरीदने वाले व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया था।
मध्य प्रदेश में भी जांच का अहम हिस्सा यह पता लगाना होगा कि चोरी की गई केबल कहां पहुंची और उसे खरीदने वाला कोई रिसीवर था या नहीं।
क्या बड़ा गिरोह सक्रिय है
भोपाल की घटना ने इस आशंका को जरूर मजबूत किया है कि रेलवे संपत्ति को निशाना बनाने वाले अपराधियों का नेटवर्क हो सकता है। लेकिन अभी गिरोह के सक्रिय होने की पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस और रेलवे सुरक्षा एजेंसियों को CCTV फुटेज, चोरी की गई केबल की मात्रा, घटनास्थल तक पहुंच, इस्तेमाल किए गए औजार और संभावित कबाड़ खरीदारों की कड़ियां जांचनी होंगी।
यदि अलग-अलग जिलों में समान तरीके से चोरी के मामले सामने आते हैं और उनके बीच आरोपी या खरीदारों की कड़ी मिलती है, तभी संगठित नेटवर्क की तस्वीर स्पष्ट होगी।
रेलवे संपत्ति की सुरक्षा किसकी
रेलवे संपत्ति की सुरक्षा में Railway Protection Force (RPF) की महत्वपूर्ण भूमिका है। RPF रेलवे संपत्ति की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जिम्मेदार केंद्रीय बल है।
वहीं, Government Railway Police (GRP) राज्य पुलिस का हिस्सा है और रेलवे परिसर तथा ट्रेनों में कानून-व्यवस्था और अपराध की जांच से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाती है। इसलिए किसी रेलवे चोरी की जांच में दोनों एजेंसियों की भूमिका अलग-अलग हो सकती है।
रेलवे प्रशासन की अपनी इंजीनियरिंग और सिग्नलिंग टीमें भी बुनियादी ढांचे की निगरानी, खराबी की पहचान और मरम्मत में भूमिका निभाती हैं।
चोरी से ज्यादा बड़ा नुकसान
कॉपर केबल की कीमत चोरी करने वालों के लिए भले ही मुख्य आकर्षण हो, लेकिन रेलवे के लिए नुकसान कहीं बड़ा हो सकता है। एक केबल काटने से ट्रेन संचालन प्रभावित हो सकता है, यात्रियों को देरी का सामना करना पड़ सकता है और रेलवे को मरम्मत तथा सुरक्षा जांच पर अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ सकते हैं।
भोपाल की घटना में चार ट्रेनों की देरी इसी व्यापक प्रभाव का उदाहरण है।
जांच से खुलेगा नेटवर्क
भोपाल रेलवे यार्ड की चोरी ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या मध्य प्रदेश में रेलवे के कॉपर और सिग्नल केबल को निशाना बनाने वाला कोई व्यापक नेटवर्क काम कर रहा है। लेकिन अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे स्थापित तथ्य कहना जल्दबाजी होगी।
अब जांच का फोकस सिर्फ चोरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। चोरी की गई केबल की बरामदगी, संभावित कबाड़ खरीदारों की पहचान और पिछले मामलों से कड़ियां जोड़ना महत्वपूर्ण होगा। भोपाल कॉपर केबल चोरी ने यह भी दिखाया है कि रेलवे की छोटी दिखने वाली संपत्ति चोरी किस तरह यात्री सेवाओं और सुरक्षित ट्रेन संचालन को प्रभावित कर सकती है।
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