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जेसी मिल जमीन विवाद में हाईकोर्ट सख्त: यूको बैंक को याचिका वापस लेने की अनुमति नहीं
ग्वालियर (म.प्र.)
ग्वालियर हाईकोर्ट ने कहा– मामला केवल बैंक का नहीं, कई पक्षों और हितधारकों के अधिकार जुड़े
ग्वालियर हाईकोर्ट ने जेसी मिल की भूमि को शासकीय भूमि के रूप में दर्ज किए जाने से जुड़े विवाद में यूको बैंक को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने बैंक की हस्तक्षेप याचिका को वापस लेने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट का कहना है कि यह विवाद केवल बैंक और सरकार के बीच सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य हितधारकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब मामला व्यापक सार्वजनिक महत्व और बहु-पक्षीय अधिकारों से जुड़ा हो, तब याचिका को इस तरह वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि बैंक 28 जनवरी 2026 के आदेश में उठाए गए अहम सवालों से बचने के लिए याचिका वापस लेना चाहता है।
भूमि की स्थिति पर नहीं दे पाए स्पष्ट जवाब
सुनवाई के दौरान यूको बैंक की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया जा सका कि जेसी मिल की किन-किन जमीनों को शासकीय भूमि के रूप में दर्ज किया गया है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया कि राजस्व रिकॉर्ड में की गई नामांतरण प्रविष्टियां स्वामित्व का प्रमाण हैं या केवल प्रशासनिक उद्देश्य से की गई प्रविष्टियां।
इस पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए दोहराया कि नामांतरण किसी भी स्थिति में स्वामित्व का दस्तावेज नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इस तथ्य को कई फैसलों में पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं, इसके बावजूद कस्टोडियन विभाग के नाम दर्ज प्रविष्टियों के आधार पर मालिकाना हक जताने का प्रयास किया गया।
सुरक्षित ऋणदाता होने की दलील
यूको बैंक ने अदालत में तर्क दिया कि वह जेसी मिल का सुरक्षित ऋणदाता है और यदि संबंधित भूमि को शासकीय घोषित कर दिया गया, तो बैंक के लिए बकाया ऋण की वसूली लगभग असंभव हो जाएगी।
बैंक ने यह भी कहा कि यदि उसकी हस्तक्षेप याचिका पर सुनवाई होती है, तो मामला पुनः समिति के पास भेजा जा सकता है और आगे की प्रक्रिया समिति की सिफारिशों के आधार पर आधिकारिक परिसमापक द्वारा की जाएगी।
श्रमिकों के अधिकारों पर भी बहस
सुनवाई के दौरान केसी वर्मा ने अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठाया कि इस पूरे विवाद में श्रमिकों का अधिकार सर्वोपरि होना चाहिए, न कि बैंकों और ऋणदाताओं का। हालांकि, अदालत ने फिलहाल इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और संबंधित पक्ष को अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया।
आधिकारिक परिसमापक की भूमिका पर सवाल
हाईकोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि आधिकारिक परिसमापक ने 19 अगस्त 2024 को पत्र केवल यूको बैंक को ही क्यों भेजा। यदि नायब तहसीलदार की कार्रवाई पर आपत्ति थी, तो परिसमापक को या तो अदालत में आवेदन करना चाहिए था या सीधे राजस्व अधिकारियों के समक्ष आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी।
आगे की कार्रवाई
अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को निर्देश दिए हैं कि वे 10 दिनों के भीतर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करें। यूको बैंक को कवरिंग लेटर और ई-मेल के जरिए हुए पत्राचार से जुड़े दस्तावेज भी पेश करने होंगे। मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को निर्धारित की गई है।
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