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भारत 1947 में आजाद हुआ, भोपाल ने 22 महीने बाद देखा तिरंगा
Digital Desk
भोपाल को भारत में विलय के लिए 22 महीने इंतजार क्यों करना पड़ा? जानिए नवाब, विलीनीकरण आंदोलन, बोरास गोलीकांड और 1 जून 1949 की कहानी।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय 1 जून 1949 को हुआ। इसके पीछे चला विलीनीकरण आंदोलन आज भी शहर के इतिहास का अहम अध्याय है।
भारत की आजादी की कहानी आम तौर पर 15 अगस्त 1947 पर समाप्त होती दिखाई देती है। लेकिन भोपाल के लिए वह कहानी उस दिन पूरी नहीं हुई थी। तत्कालीन भोपाल रियासत के शासक नवाब हमीदुल्ला खान ने रियासत को अलग इकाई के रूप में बनाए रखने की इच्छा जताई थी। इसके बाद लोगों ने भारत में विलय की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया।
करीब 22 महीने बाद, 30 अप्रैल 1949 को विलय समझौते पर हस्ताक्षर हुए और 1 जून 1949 को भारत सरकार ने भोपाल का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। इसी के साथ भोपाल भारतीय संघ का हिस्सा बन गया।
आजादी के बाद भी अलग रियासत
1947 में ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के साथ रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान के साथ जुड़ने का सवाल था। भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्ला खान ने 1948 में भोपाल को अलग इकाई के रूप में बनाए रखने की इच्छा जताई।
मध्य प्रदेश सरकार के भोपाल जिला प्रशासन के इतिहास पृष्ठ के अनुसार, 1947 में नवाब ने गैर-सरकारी बहुमत वाला मंत्रालय बनाया था, लेकिन 1948 में उन्होंने भोपाल को अलग रखने की इच्छा व्यक्त की।
सड़कों पर उतरा विलय आंदोलन
नवाब के रुख के खिलाफ स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ा। भारत में विलय की मांग को लेकर विलीनीकरण आंदोलन शुरू हुआ और प्रजा मंडल से जुड़े नेताओं ने इसे संगठित किया।
शंकर दयाल शर्मा और रतन कुमार गुप्ता समेत कई नेताओं ने आंदोलन में भूमिका निभाई। आंदोलन के दौरान गिरफ्तारियां भी हुईं। शर्मा को सार्वजनिक सभा से जुड़े प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में जेल भेजा गया था।
बोरास गोलीकांड बना मोड़
विलीनीकरण आंदोलन का सबसे दर्दनाक अध्याय 14 जनवरी 1949 का बोरास गोलीकांड माना जाता है।
रायसेन जिले के बोरास में नर्मदा नदी के किनारे बड़ी सभा हुई थी। आंदोलनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। इस घटना की खबर दिल्ली तक पहुंची और भोपाल के भविष्य को लेकर केंद्र का दबाव बढ़ा।
स्थानीय इतिहास में बोरास के शहीदों को आज भी भोपाल के विलीनीकरण आंदोलन के महत्वपूर्ण चेहरों के रूप में याद किया जाता है।
सरदार पटेल ने भेजे वीपी मेनन
भोपाल की स्थिति को देखते हुए तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने मामले में हस्तक्षेप किया। भारत सरकार के राज्यों के एकीकरण से जुड़े प्रमुख अधिकारी वीपी मेनन को बातचीत के लिए भोपाल भेजा गया।
आखिरकार बातचीत और बढ़ते जनदबाव के बीच नवाब हमीदुल्ला खान ने विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए।
भारत सरकार के 1950 के White Paper on Indian States में दर्ज समझौते के अनुसार, 30 अप्रैल 1949 को समझौता हुआ और प्रशासन 1 जून 1949 से भारत सरकार को सौंपा जाना तय हुआ था।
1 जून 1949 को बदला शासन
1 जून 1949 को केंद्र सरकार ने भोपाल का प्रशासन संभाल लिया। भोपाल को भारतीय संघ में Part C State के रूप में रखा गया और इसका प्रशासन Chief Commissioner के माध्यम से चलाया गया।
इस तरह 15 अगस्त 1947 के बाद भोपाल की अलग रियासती व्यवस्था का अंत हुआ।
भोपाल बना मध्य प्रदेश का हिस्सा
विलय के बाद भी भोपाल तुरंत मौजूदा मध्य प्रदेश का हिस्सा नहीं बना। वह 1949 से 1956 तक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में रहा।
1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद भोपाल मध्य प्रदेश में शामिल हुआ। बाद में यह मध्य प्रदेश की राजधानी बना और आज राज्य के प्रशासनिक तथा राजनीतिक जीवन का प्रमुख केंद्र है।
22 महीने की कहानी क्यों जरूरी?
भोपाल का इतिहास यह याद दिलाता है कि 15 अगस्त 1947 के बाद भी भारत का राजनीतिक एकीकरण तत्काल पूरा नहीं हुआ था। अलग-अलग रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया ने कई जगह बातचीत, राजनीतिक दबाव और जनआंदोलनों का रूप लिया।
भोपाल में भी आम लोगों के आंदोलन ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए भारत की आजादी के 79 साल बाद भी भोपाल का विलीनीकरण आंदोलन मध्य प्रदेश के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे स्वतंत्रता दिवस की कहानी से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
भारत 1947 में आजाद हुआ, भोपाल ने 22 महीने बाद देखा तिरंगा
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15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन भोपाल रियासत का भारत में औपचारिक विलय 1 जून 1949 को हुआ। इसके पीछे चला विलीनीकरण आंदोलन आज भी शहर के इतिहास का अहम अध्याय है।
भारत की आजादी की कहानी आम तौर पर 15 अगस्त 1947 पर समाप्त होती दिखाई देती है। लेकिन भोपाल के लिए वह कहानी उस दिन पूरी नहीं हुई थी। तत्कालीन भोपाल रियासत के शासक नवाब हमीदुल्ला खान ने रियासत को अलग इकाई के रूप में बनाए रखने की इच्छा जताई थी। इसके बाद लोगों ने भारत में विलय की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया।
करीब 22 महीने बाद, 30 अप्रैल 1949 को विलय समझौते पर हस्ताक्षर हुए और 1 जून 1949 को भारत सरकार ने भोपाल का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। इसी के साथ भोपाल भारतीय संघ का हिस्सा बन गया।
आजादी के बाद भी अलग रियासत
1947 में ब्रिटिश सत्ता समाप्त होने के साथ रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान के साथ जुड़ने का सवाल था। भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्ला खान ने 1948 में भोपाल को अलग इकाई के रूप में बनाए रखने की इच्छा जताई।
मध्य प्रदेश सरकार के भोपाल जिला प्रशासन के इतिहास पृष्ठ के अनुसार, 1947 में नवाब ने गैर-सरकारी बहुमत वाला मंत्रालय बनाया था, लेकिन 1948 में उन्होंने भोपाल को अलग रखने की इच्छा व्यक्त की।
सड़कों पर उतरा विलय आंदोलन
नवाब के रुख के खिलाफ स्थानीय स्तर पर असंतोष बढ़ा। भारत में विलय की मांग को लेकर विलीनीकरण आंदोलन शुरू हुआ और प्रजा मंडल से जुड़े नेताओं ने इसे संगठित किया।
शंकर दयाल शर्मा और रतन कुमार गुप्ता समेत कई नेताओं ने आंदोलन में भूमिका निभाई। आंदोलन के दौरान गिरफ्तारियां भी हुईं। शर्मा को सार्वजनिक सभा से जुड़े प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में जेल भेजा गया था।
बोरास गोलीकांड बना मोड़
विलीनीकरण आंदोलन का सबसे दर्दनाक अध्याय 14 जनवरी 1949 का बोरास गोलीकांड माना जाता है।
रायसेन जिले के बोरास में नर्मदा नदी के किनारे बड़ी सभा हुई थी। आंदोलनकारियों पर पुलिस की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। इस घटना की खबर दिल्ली तक पहुंची और भोपाल के भविष्य को लेकर केंद्र का दबाव बढ़ा।
स्थानीय इतिहास में बोरास के शहीदों को आज भी भोपाल के विलीनीकरण आंदोलन के महत्वपूर्ण चेहरों के रूप में याद किया जाता है।
सरदार पटेल ने भेजे वीपी मेनन
भोपाल की स्थिति को देखते हुए तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने मामले में हस्तक्षेप किया। भारत सरकार के राज्यों के एकीकरण से जुड़े प्रमुख अधिकारी वीपी मेनन को बातचीत के लिए भोपाल भेजा गया।
आखिरकार बातचीत और बढ़ते जनदबाव के बीच नवाब हमीदुल्ला खान ने विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए।
भारत सरकार के 1950 के White Paper on Indian States में दर्ज समझौते के अनुसार, 30 अप्रैल 1949 को समझौता हुआ और प्रशासन 1 जून 1949 से भारत सरकार को सौंपा जाना तय हुआ था।
1 जून 1949 को बदला शासन
1 जून 1949 को केंद्र सरकार ने भोपाल का प्रशासन संभाल लिया। भोपाल को भारतीय संघ में Part C State के रूप में रखा गया और इसका प्रशासन Chief Commissioner के माध्यम से चलाया गया।
इस तरह 15 अगस्त 1947 के बाद भोपाल की अलग रियासती व्यवस्था का अंत हुआ।
भोपाल बना मध्य प्रदेश का हिस्सा
विलय के बाद भी भोपाल तुरंत मौजूदा मध्य प्रदेश का हिस्सा नहीं बना। वह 1949 से 1956 तक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में रहा।
1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद भोपाल मध्य प्रदेश में शामिल हुआ। बाद में यह मध्य प्रदेश की राजधानी बना और आज राज्य के प्रशासनिक तथा राजनीतिक जीवन का प्रमुख केंद्र है।
22 महीने की कहानी क्यों जरूरी?
भोपाल का इतिहास यह याद दिलाता है कि 15 अगस्त 1947 के बाद भी भारत का राजनीतिक एकीकरण तत्काल पूरा नहीं हुआ था। अलग-अलग रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया ने कई जगह बातचीत, राजनीतिक दबाव और जनआंदोलनों का रूप लिया।
भोपाल में भी आम लोगों के आंदोलन ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए भारत की आजादी के 79 साल बाद भी भोपाल का विलीनीकरण आंदोलन मध्य प्रदेश के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे स्वतंत्रता दिवस की कहानी से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
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