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रिटायरमेंट के 7 साल बाद पेंशन से वसूली नहीं: MP हाईकोर्ट
जबलपुर (म.प्र.)
रामराव भीमटे और रामायण सिंह तिवारी से जुड़े मामले में सरकार की पुनर्विचार याचिकाएं खारिज
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त पुलिस कर्मचारियों की पेंशन से पुरानी वेतन वृद्धि की राशि वसूलने के मामले में राज्य सरकार को राहत नहीं दी। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने राज्य सरकार की दो पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दीं। मामला रामराव भीमटे और रामायण सिंह तिवारी से जुड़ा है, दोनों पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर (मिनिस्टीरियल) के पद से वर्ष 2017 में रिटायर हुए थे। सरकार ने सेवानिवृत्ति के करीब सात साल बाद 26 सितंबर 2024 को उनकी पेंशन से रकम काटने का आदेश जारी किया था। सेवाकाल में दी गई तदर्थ वेतन वृद्धि को विभाग ने बाद में गलत मानते हुए अतिरिक्त भुगतान की वसूली शुरू की थी। कोर्ट ने पहले दिए गए अपने फैसलों में इस रिकवरी को रोक दिया था, जिसके खिलाफ सरकार ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की थीं।
मामले की शुरुआत उस आदेश से हुई, जो 26 सितंबर 2024 को डीआईजी भोपाल की ओर से जारी किया गया था। विभाग का कहना था कि दोनों कर्मचारियों को सेवा के दौरान ऐसी वेतनवृद्धि का लाभ मिला, जो नियमों के मुताबिक उन्हें नहीं मिलना चाहिए था। इसी आधार पर पेंशन से अतिरिक्त रकम वापस लेने की कार्रवाई की गई। दोनों कर्मचारी 2017 में रिटायर हो चुके थे और रिकवरी का आदेश उनकी सेवानिवृत्ति के सात साल से ज्यादा समय बाद आया। रामराव भीमटे के मामले में पहले की न्यायिक कार्यवाही में 10.87 लाख रुपए से ज्यादा की राशि की वसूली का उल्लेख सामने आया था। सिंगल बेंच ने 24 अक्टूबर 2024 को रिकवरी आदेश रद्द कर दिया था और बाद में डिवीजन बेंच ने भी राज्य की चुनौती को खारिज करते हुए सेवानिवृत्ति के बाद वसूली को उचित नहीं माना।
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत को भी ध्यान में रखा, जिसके तहत रिटायर कर्मचारियों से गलत तरीके से हुए अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर कई परिस्थितियों में रोक है। खासतौर पर ‘रफीक मसीह’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रिटायर्ड कर्मचारियों और कुछ अन्य श्रेणियों से ऐसी रिकवरी करना अनुचित हो सकता है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच भी ‘जगदीश प्रसाद दुबे’ मामले में वेतन पुनर्निर्धारण और अतिरिक्त भुगतान की वसूली से जुड़े सवालों पर दिशा-निर्देश दे चुकी है। इसमें रिकवरी के लिए कर्मचारी की स्थिति, भुगतान की अवधि और किसी अंडरटेकिंग की परिस्थितियों को महत्वपूर्ण माना गया था। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी इसी कानूनी स्थिति को रामराव भीमटे के मामले में लागू माना था।
राज्य सरकार की ओर से यह तर्क रखा गया था कि सेवाकाल में मिली तदर्थ वेतन वृद्धि नियमों के मुताबिक नहीं थी, इसलिए अतिरिक्त भुगतान वापस लिया जाना चाहिए। सरकार ने पुराने न्यायिक फैसलों का हवाला देकर रिकवरी को सही ठहराने की कोशिश की। हालांकि अदालत ने माना कि कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के कई साल बाद पेंशन से इस तरह की राशि काटने का आदेश कानूनी कसौटी पर कायम नहीं रह सकता। इससे पहले भी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के अलग-अलग मामलों में सेवानिवृत्त कर्मचारियों से गलत पे-फिक्सेशन के आधार पर की गई वसूली पर रोक लगाई जा चुकी है। अदालतों ने ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के ‘रफीक मसीह’ फैसले और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की फुल बेंच के निर्णय को आधार बनाया है।
इस मामले में सरकार ने 2025 में आए फैसलों पर दोबारा विचार की मांग करते हुए पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की थीं। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक सरकार पहले इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक भी ले गई थी, जहां 1 दिसंबर 2025 को हस्तक्षेप नहीं किया गया। इसके बाद हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता अतुल कुमार राय ने पक्ष रखा। याचिकाओं में सरकार की कोशिश यह थी कि पहले के आदेशों पर फिर से विचार किया जाए और पेंशन से संबंधित रिकवरी को आगे बढ़ाने का रास्ता मिले। लेकिन युगलपीठ ने पुनर्विचार की मांग स्वीकार नहीं की और दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मामले में अदालत के सामने मुख्य सवाल यह रहा कि क्या सेवा के दौरान कई साल पहले हुई वेतन संबंधी गलती का असर रिटायरमेंट के बाद पेंशन पर डाला जा सकता है। रामराव भीमटे 30 जून 2017 को सब इंस्पेक्टर (मिनिस्टीरियल) पद से सेवानिवृत्त हुए थे और 26 सितंबर 2024 को उनके खिलाफ रिकवरी का आदेश जारी हुआ था। हाईकोर्ट ने पहले ही कहा था कि रिटायरमेंट के करीब सात साल बाद इस तरह की वसूली को मंजूरी नहीं दी जा सकती। पुनर्विचार याचिकाओं में भी राज्य सरकार इसी फैसले पर दोबारा सुनवाई चाह रही थी, लेकिन युगलपीठ ने अपने पहले के रुख में बदलाव नहीं किया।
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