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इंदौर में शोर पर हाईकोर्ट सख्त, जवाब नहीं तो कलेक्टर होंगे तलब
इंदौर (म.प्र.)
ध्वनि प्रदूषण पर कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड मांगा, 2025-26 में लगे जुर्माने और सजा की जानकारी भी कोर्ट में रखनी होगी
इंदौर में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने राज्य सरकार और प्रशासन को साफ संकेत दिया है कि अब केवल नियमों का हवाला देने से काम नहीं चलेगा। कोर्ट ने सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक आखिरी मौका दिया है। अगर तय समय के भीतर जवाब पेश नहीं किया गया तो इंदौर के कलेक्टर को खुद अदालत में पहुंचकर यह बताना पड़ेगा कि शहर में शोर को नियंत्रित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगे प्रशासन की क्या तैयारी है। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को रखी गई है।
यह आदेश जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की डबल बेंच ने अमिताभ उपाध्याय एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान दिया। सुनवाई के दौरान शासन की ओर से जवाब तैयार करने के लिए और समय मांगा गया था। अदालत ने यह मांग स्वीकार तो की, लेकिन साथ ही साफ कर दिया कि अब दोबारा समय नहीं दिया जाएगा। तय अवधि में जवाब नहीं आया तो जिला दंडाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के सामने मौजूद रहना होगा। उन्हें याचिका में उठाए गए सवालों पर प्रशासन की कार्रवाई का ब्योरा देना होगा।
मामले में ध्वनि प्रदूषण और शोर नियंत्रण से जुड़े नियमों के पालन का मुद्दा उठाया गया है। शहर में तेज आवाज में लाउडस्पीकर, अन्य ध्वनि उपकरणों और तय मानकों से ज्यादा शोर को लेकर समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। कोर्ट अब यह देखना चाहता है कि नियमों के उल्लंघन के मामलों में प्रशासन ने वास्तव में कितनी कार्रवाई की। यानी कागज पर नियम मौजूद हैं या उनका पालन भी कराया जा रहा है, इस पर अब रिकॉर्ड के साथ जवाब देना होगा। प्रशासन को यह भी बताना होगा कि भविष्य में ऐसी शिकायतों को रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनाई जा रही है।
हाईकोर्ट ने इंदौर जिला कोर्ट से भी वर्ष 2025-26 में मध्य प्रदेश कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985 के तहत हुई कार्रवाई का विवरण मांगा है। इस रिपोर्ट में शोर से जुड़े मामलों में की गई कानूनी कार्रवाई की जानकारी शामिल होगी। अदालत यह देखेगी कि कितने मामलों में कार्रवाई आगे बढ़ी, कितने मामलों में जुर्माना लगाया गया और किन मामलों में सजा सुनाई गई। इससे ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण कानून के जमीनी स्तर पर इस्तेमाल की तस्वीर कोर्ट के सामने आएगी।
कोर्ट के निर्देश के बाद अब प्रशासन को अपनी कार्रवाई का हिसाब तैयार करना होगा। इसमें सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए नियम लागू हैं। अधिकारियों को यह बताना पड़ेगा कि नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कितनी शिकायतों पर कार्रवाई हुई, कितने मामलों में केस दर्ज किए गए और कार्रवाई के बाद स्थिति में क्या बदलाव आया। शहर में शोर के स्तर को नियंत्रित करने के लिए निगरानी व्यवस्था कैसी है, इस पर भी सरकार से जानकारी मांगी जा सकती है।
याचिका में उठाए गए मुद्दों के बीच प्रशासन की आगे की रणनीति भी महत्वपूर्ण होगी। कोर्ट के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि आने वाले समय में ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए किन स्तरों पर निगरानी बढ़ाई जाएगी। संवेदनशील इलाकों में शोर की शिकायतों पर किस तरह प्रतिक्रिया दी जाएगी और नियमों का उल्लंघन सामने आने पर कौन-सी कार्रवाई होगी, इसका रोडमैप भी जवाब में शामिल किया जा सकता है। खास तौर पर लगातार शिकायत वाले क्षेत्रों में प्रशासन की व्यवस्था पर नजर रहेगी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से एडवोकेट अभिनव धनोड़कर ने पक्ष रखा। राज्य सरकार की ओर से शासकीय एडवोकेट प्रद्युम्न किबे और अन्य प्रतिवादी की ओर से एडवोकेट ऋषभ सिंह चौहान अदालत में मौजूद रहे। शासन की तरफ से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया था, जिसे कोर्ट ने अंतिम अवसर के तौर पर स्वीकार किया। अब अगली तारीख तक सरकार को अपना पक्ष रिकॉर्ड के साथ रखना होगा।
27 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में सरकार का जवाब अहम रहेगा। यदि जवाब निर्धारित समय में दाखिल नहीं होता है तो कोर्ट के निर्देश के मुताबिक इंदौर कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ सकता है। वहीं जिला कोर्ट से मांगी गई 2025-26 की कार्रवाई रिपोर्ट में जुर्माने और सजा से संबंधित आंकड़े भी अदालत के सामने रखे जाने हैं। मामला अब प्रशासनिक दावों से आगे बढ़कर ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ हुई वास्तविक कार्रवाई के रिकॉर्ड तक पहुंच गया है।
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