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चीन गतिरोध पर नरवणे का बयान: सेना को मिला पूरा समर्थन
नेशनल न्यूज
पूर्व आर्मी चीफ ने विवाद पर दी सफाई, चीन गतिरोध में सरकार के समर्थन की पुष्टि चीन गतिरोध पर नरवणे के बयान ने एक बार फिर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। उन्होंने साफ कहा कि सेना को पूरी छूट और सहयोग मिला था।
पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे के ताज़ा बयान ने 2020 के भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर चल रही बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस समय सरकार ने सेना को अकेला नहीं छोड़ा था, बल्कि हर स्तर पर समर्थन दिया गया था। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्ष की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे कि संकट के दौरान सरकार की भूमिका क्या रही।
नरवणे ने मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया निर्देश—“जो उचित समझो, वो करो”—दरअसल सेना पर भरोसे का प्रतीक था। उन्होंने इसे किसी भी तरह की अनिश्चितता या जिम्मेदारी से बचने के रूप में देखने से इनकार किया।
विवाद की जड़
इस मुद्दे की शुरुआत तब हुई जब राहुल गांधी ने संसद में नरवणे की कथित किताब ‘Four Stars of Destiny’ का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने सेना को स्पष्ट निर्देश नहीं दिए। उन्होंने दावा किया कि इससे यह संकेत मिलता है कि सेना को संकट में अकेला छोड़ दिया गया था।
हालांकि, प्रकाशकों और आधिकारिक स्रोतों के अनुसार यह किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है और इसके अंश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसी वजह से इस पर राजनीतिक और तथ्यात्मक विवाद खड़ा हो गया।
सीमा पर स्थिति
2020 में लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन के बीच गंभीर सैन्य तनाव पैदा हो गया था। उस दौरान चीनी सैनिक और टैंक भारतीय सीमा के काफी करीब आ गए थे, जिससे स्थिति बेहद संवेदनशील हो गई थी।
सूत्रों के मुताबिक, सेना ने हालात को देखते हुए सरकार से स्पष्ट निर्देश मांगे थे। इसके बाद शीर्ष स्तर पर बातचीत हुई और सेना को स्थिति के अनुसार निर्णय लेने की पूरी छूट दी गई। नरवणे के अनुसार, यही निर्णय आगे की रणनीति तय करने में अहम रहा और स्थिति को नियंत्रण में रखा गया।
नरवणे ने अपने बयान में यह भी कहा कि सरकार और सेना के बीच तालमेल मजबूत था। उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े सैन्य फैसले से पहले राजनीतिक नेतृत्व को पूरी जानकारी दी जाती है, लेकिन जमीनी स्थिति के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार सेना के पास होता है।
अधिकारियों के अनुसार, यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, जहां सैन्य नेतृत्व को ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी जाती है। रक्षा मामलों के जानकारों का भी मानना है कि संकट के समय त्वरित निर्णय लेने के लिए यह जरूरी होता है।
इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। एक ओर सरकार समर्थक इसे सेना पर विश्वास का उदाहरण बता रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे जिम्मेदारी से दूरी के रूप में देख रहा है।
फिलहाल, चीन गतिरोध पर नरवणे का बयान यह संकेत देता है कि सरकार और सेना के बीच समन्वय बना रहा, लेकिन इस पर राजनीतिक व्याख्याएं अलग-अलग बनी हुई हैं।
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चीन गतिरोध पर नरवणे का बयान: सेना को मिला पूरा समर्थन
नेशनल न्यूज
पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे के ताज़ा बयान ने 2020 के भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर चल रही बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उस समय सरकार ने सेना को अकेला नहीं छोड़ा था, बल्कि हर स्तर पर समर्थन दिया गया था। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब विपक्ष की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे कि संकट के दौरान सरकार की भूमिका क्या रही।
नरवणे ने मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिया गया निर्देश—“जो उचित समझो, वो करो”—दरअसल सेना पर भरोसे का प्रतीक था। उन्होंने इसे किसी भी तरह की अनिश्चितता या जिम्मेदारी से बचने के रूप में देखने से इनकार किया।
विवाद की जड़
इस मुद्दे की शुरुआत तब हुई जब राहुल गांधी ने संसद में नरवणे की कथित किताब ‘Four Stars of Destiny’ का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने सेना को स्पष्ट निर्देश नहीं दिए। उन्होंने दावा किया कि इससे यह संकेत मिलता है कि सेना को संकट में अकेला छोड़ दिया गया था।
हालांकि, प्रकाशकों और आधिकारिक स्रोतों के अनुसार यह किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है और इसके अंश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसी वजह से इस पर राजनीतिक और तथ्यात्मक विवाद खड़ा हो गया।
सीमा पर स्थिति
2020 में लद्दाख क्षेत्र में भारत और चीन के बीच गंभीर सैन्य तनाव पैदा हो गया था। उस दौरान चीनी सैनिक और टैंक भारतीय सीमा के काफी करीब आ गए थे, जिससे स्थिति बेहद संवेदनशील हो गई थी।
सूत्रों के मुताबिक, सेना ने हालात को देखते हुए सरकार से स्पष्ट निर्देश मांगे थे। इसके बाद शीर्ष स्तर पर बातचीत हुई और सेना को स्थिति के अनुसार निर्णय लेने की पूरी छूट दी गई। नरवणे के अनुसार, यही निर्णय आगे की रणनीति तय करने में अहम रहा और स्थिति को नियंत्रण में रखा गया।
नरवणे ने अपने बयान में यह भी कहा कि सरकार और सेना के बीच तालमेल मजबूत था। उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े सैन्य फैसले से पहले राजनीतिक नेतृत्व को पूरी जानकारी दी जाती है, लेकिन जमीनी स्थिति के अनुसार निर्णय लेने का अधिकार सेना के पास होता है।
अधिकारियों के अनुसार, यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, जहां सैन्य नेतृत्व को ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी जाती है। रक्षा मामलों के जानकारों का भी मानना है कि संकट के समय त्वरित निर्णय लेने के लिए यह जरूरी होता है।
इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। एक ओर सरकार समर्थक इसे सेना पर विश्वास का उदाहरण बता रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे जिम्मेदारी से दूरी के रूप में देख रहा है।
फिलहाल, चीन गतिरोध पर नरवणे का बयान यह संकेत देता है कि सरकार और सेना के बीच समन्वय बना रहा, लेकिन इस पर राजनीतिक व्याख्याएं अलग-अलग बनी हुई हैं।
