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जगन्नाथ रथयात्रा 2026: 87 दिनों की कड़ी मेहनत से सजते हैं महाप्रभु के तीन रथ, जानिए क्यों यात्रा के बाद लाखों में बिकता है एक पहिया
Digital Desk
बिना किसी नक्शे और आधुनिक तकनीक के पीढ़ियों पुरानी माप से तैयार होते हैं दिव्य रथ, ओडिशा सरकार बिना कीमत देती है 13 प्रजातियों की लकड़ियां
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हर साल की तरह इस साल भी 16 जुलाई 2026 को विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हो गई है। महाप्रभु जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। पुरी की सड़कों पर लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है। लेकिन इस आलौकिक यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण वे तीन दिव्य रथ हैं, जिन्हें बनाने में 220 से अधिक कारीगर पूरे 87 दिनों तक दिन-रात पसीना बहाते हैं।
इस रथयात्रा से जुड़ी कई ऐसी अद्भुत और रोचक परंपराएं हैं, जो न सिर्फ वैज्ञानिकों को हैरान करती हैं, बल्कि भक्तों को भी विस्मित कर देती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि इन रथों का निर्माण कैसे होता है, इनके नाप का रहस्य क्या है और यात्रा के बाद इन रथों के हिस्सों का क्या किया जाता है।
तीन रथ, चार मूर्तियां और 'पहांडी' व 'छेरा-पहरा' की अद्भुत परंपरा
जगन्नाथ रथयात्रा में रथ तो तीन होते हैं, लेकिन उनमें विराजमान होने वाले देवताओं की संख्या चार होती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अलावा सुदर्शन चक्र की मूर्ति को भी रथ पर ले जाया जाता है। रथयात्रा के दिन गर्भगृह से देवताओं को बाहर लाने की पारंपरिक प्रक्रिया को 'पहांडी' कहा जाता है, जिसमें मूर्तियों को आगे-पीछे झुलाते हुए लाया जाता है। सबसे पहले भगवान सुदर्शन, फिर बलभद्र, सुभद्रा और अंत में महाप्रभु जगन्नाथ रथ पर विराजते हैं।
इसके बाद पुरी के राजा यानी गजपति महाराज 'छेरा-पहरा' की रस्म निभाते हैं, जिसके तहत वे सोने की झाड़ू से रथों को साफ करते हैं और उन पर सुगंधित जल छिड़कते हैं। इसके बाद ही लाखों श्रद्धालु मोटी रस्सियों की मदद से रथों को खींचना शुरू करते हैं। सबसे आगे बलभद्र का रथ 'तालध्वज', बीच में सुभद्रा का रथ 'दर्पदलन' और अंत में जगन्नाथ जी का रथ 'नंदीघोष' चलता है।
वसंत पंचमी से लेकर अक्षय तृतीया तक: 13 तरह के पेड़ों से निर्माण
रथों के निर्माण की प्रक्रिया बेहद अनुशासित और लंबी होती है। ओडिशा का वन विभाग मंदिर को पूरी तरह से मुफ्त (बिना किसी कीमत के) लकड़ियां उपलब्ध कराता है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 13 विशेष प्रजातियों के पेड़ों की लकड़ियों से ये रथ बनते हैं, जिनमें मुख्य रूप से फासी, धौरा, आसन, मोई, सिमिली, साल, गम्भारी, कदंब और देवदारु शामिल हैं। भविष्य में पर्यावरण को नुकसान न हो और लकड़ियों की कमी न हो, इसके लिए राज्य सरकार विशेष जंगल प्रोजेक्ट भी चला रही है।
रथ निर्माण की शुरुआत वसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा से होती है। इसके बाद रामनवमी पर तीन धौरा लट्ठों की चिराई का काम शुरू होता है और अक्षय तृतीया के शुभ दिन से रथों का वास्तविक निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ता है।
बिना किसी नक्शे या ब्लूप्रिंट के बनती है पीढ़ियों पुरानी माप
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन गगनचुंबी रथों को बनाने के लिए किसी मॉडर्न इंजीनियरिंग नक्शे, कंप्यूटर डिजाइन या ब्लूप्रिंट की आवश्यकता नहीं होती। कारीगर पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक ज्ञान पद्धति का उपयोग करते हैं। नाप के लिए आज भी करीब 20 इंच की एक विशेष लकड़ी की छड़ी और रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है।
कारीगर सबसे पहले विशालकाय पहिए तैयार करते हैं और फिर नीचे से ऊपर की ओर रथ का ढांचा खड़ा करते हैं। यह हुनर नई पीढ़ी के कारीगर पुराने उस्तादों के साथ 'रथखला' (रथ निर्माण स्थल) में काम करके सीखते हैं। हालांकि, परंपरा के साथ-साथ सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। रथ तैयार होने के बाद सरकारी इंजीनियर इनके पहियों, धुरी और जोड़ों की गहन तकनीकी जांच करते हैं और फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही इन्हें खींचने की अनुमति दी जाती है।
यात्रा के बाद लाखों रुपये में बिकता है रथ का एक पहिया
गुंडिचा मंदिर में सात दिन रहने के बाद, 24 जुलाई को 'बहुड़ा यात्रा' (उल्टा रथयात्रा) के जरिए भगवान मुख्य मंदिर लौटेंगे। 27 जुलाई को मंदिर प्रवेश के कुछ दिन बाद मंदिर प्रशासन इन रथों को खोलने की तारीख तय करता है। पारंपरिक भोई सेवकों द्वारा करीब 20 दिनों की मेहनत से इन रथों को खोला जाता है।
रथों में इस्तेमाल किए गए सारथी, घोड़े और पार्श्व देवी-देवताओं की लकड़ी की मूर्तियों को हर साल नया नहीं बनाया जाता, बल्कि उन्हें सुरक्षित उतारकर रख लिया जाता है। रथों की लोहे की कीलें मंदिर कार्यालय में जमा होती हैं। इसके बाद रथ के पहियों और नक्काशीदार हिस्सों को आम जनता और भक्तों के लिए बेचा जाता है। पिछले वर्ष (2025) के आंकड़ों के अनुसार, जगन्नाथ जी के रथ के एक पहिए की न्यूनतम कीमत 3 लाख रुपये, बलभद्र के पहिए की 2 लाख रुपये और सुभद्रा के रथ के पहिए की कीमत 1.5 लाख रुपये रखी गई थी। भक्त इन पहियों को सौभाग्य और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में अपने घरों में स्थापित करने के लिए खरीदते हैं।
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आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हर साल की तरह इस साल भी 16 जुलाई 2026 को विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा श्रद्धा और उल्लास के साथ शुरू हो गई है। महाप्रभु जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने-अपने भव्य रथों पर सवार होकर मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान कर चुके हैं। पुरी की सड़कों पर लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है। लेकिन इस आलौकिक यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण वे तीन दिव्य रथ हैं, जिन्हें बनाने में 220 से अधिक कारीगर पूरे 87 दिनों तक दिन-रात पसीना बहाते हैं।
इस रथयात्रा से जुड़ी कई ऐसी अद्भुत और रोचक परंपराएं हैं, जो न सिर्फ वैज्ञानिकों को हैरान करती हैं, बल्कि भक्तों को भी विस्मित कर देती हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि इन रथों का निर्माण कैसे होता है, इनके नाप का रहस्य क्या है और यात्रा के बाद इन रथों के हिस्सों का क्या किया जाता है।
तीन रथ, चार मूर्तियां और 'पहांडी' व 'छेरा-पहरा' की अद्भुत परंपरा
जगन्नाथ रथयात्रा में रथ तो तीन होते हैं, लेकिन उनमें विराजमान होने वाले देवताओं की संख्या चार होती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अलावा सुदर्शन चक्र की मूर्ति को भी रथ पर ले जाया जाता है। रथयात्रा के दिन गर्भगृह से देवताओं को बाहर लाने की पारंपरिक प्रक्रिया को 'पहांडी' कहा जाता है, जिसमें मूर्तियों को आगे-पीछे झुलाते हुए लाया जाता है। सबसे पहले भगवान सुदर्शन, फिर बलभद्र, सुभद्रा और अंत में महाप्रभु जगन्नाथ रथ पर विराजते हैं।
इसके बाद पुरी के राजा यानी गजपति महाराज 'छेरा-पहरा' की रस्म निभाते हैं, जिसके तहत वे सोने की झाड़ू से रथों को साफ करते हैं और उन पर सुगंधित जल छिड़कते हैं। इसके बाद ही लाखों श्रद्धालु मोटी रस्सियों की मदद से रथों को खींचना शुरू करते हैं। सबसे आगे बलभद्र का रथ 'तालध्वज', बीच में सुभद्रा का रथ 'दर्पदलन' और अंत में जगन्नाथ जी का रथ 'नंदीघोष' चलता है।
वसंत पंचमी से लेकर अक्षय तृतीया तक: 13 तरह के पेड़ों से निर्माण
रथों के निर्माण की प्रक्रिया बेहद अनुशासित और लंबी होती है। ओडिशा का वन विभाग मंदिर को पूरी तरह से मुफ्त (बिना किसी कीमत के) लकड़ियां उपलब्ध कराता है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 13 विशेष प्रजातियों के पेड़ों की लकड़ियों से ये रथ बनते हैं, जिनमें मुख्य रूप से फासी, धौरा, आसन, मोई, सिमिली, साल, गम्भारी, कदंब और देवदारु शामिल हैं। भविष्य में पर्यावरण को नुकसान न हो और लकड़ियों की कमी न हो, इसके लिए राज्य सरकार विशेष जंगल प्रोजेक्ट भी चला रही है।
रथ निर्माण की शुरुआत वसंत पंचमी पर लकड़ियों की पूजा से होती है। इसके बाद रामनवमी पर तीन धौरा लट्ठों की चिराई का काम शुरू होता है और अक्षय तृतीया के शुभ दिन से रथों का वास्तविक निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ता है।
बिना किसी नक्शे या ब्लूप्रिंट के बनती है पीढ़ियों पुरानी माप
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन गगनचुंबी रथों को बनाने के लिए किसी मॉडर्न इंजीनियरिंग नक्शे, कंप्यूटर डिजाइन या ब्लूप्रिंट की आवश्यकता नहीं होती। कारीगर पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक ज्ञान पद्धति का उपयोग करते हैं। नाप के लिए आज भी करीब 20 इंच की एक विशेष लकड़ी की छड़ी और रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है।
कारीगर सबसे पहले विशालकाय पहिए तैयार करते हैं और फिर नीचे से ऊपर की ओर रथ का ढांचा खड़ा करते हैं। यह हुनर नई पीढ़ी के कारीगर पुराने उस्तादों के साथ 'रथखला' (रथ निर्माण स्थल) में काम करके सीखते हैं। हालांकि, परंपरा के साथ-साथ सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। रथ तैयार होने के बाद सरकारी इंजीनियर इनके पहियों, धुरी और जोड़ों की गहन तकनीकी जांच करते हैं और फिटनेस प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही इन्हें खींचने की अनुमति दी जाती है।
यात्रा के बाद लाखों रुपये में बिकता है रथ का एक पहिया
गुंडिचा मंदिर में सात दिन रहने के बाद, 24 जुलाई को 'बहुड़ा यात्रा' (उल्टा रथयात्रा) के जरिए भगवान मुख्य मंदिर लौटेंगे। 27 जुलाई को मंदिर प्रवेश के कुछ दिन बाद मंदिर प्रशासन इन रथों को खोलने की तारीख तय करता है। पारंपरिक भोई सेवकों द्वारा करीब 20 दिनों की मेहनत से इन रथों को खोला जाता है।
रथों में इस्तेमाल किए गए सारथी, घोड़े और पार्श्व देवी-देवताओं की लकड़ी की मूर्तियों को हर साल नया नहीं बनाया जाता, बल्कि उन्हें सुरक्षित उतारकर रख लिया जाता है। रथों की लोहे की कीलें मंदिर कार्यालय में जमा होती हैं। इसके बाद रथ के पहियों और नक्काशीदार हिस्सों को आम जनता और भक्तों के लिए बेचा जाता है। पिछले वर्ष (2025) के आंकड़ों के अनुसार, जगन्नाथ जी के रथ के एक पहिए की न्यूनतम कीमत 3 लाख रुपये, बलभद्र के पहिए की 2 लाख रुपये और सुभद्रा के रथ के पहिए की कीमत 1.5 लाख रुपये रखी गई थी। भक्त इन पहियों को सौभाग्य और श्रद्धा के प्रतीक के रूप में अपने घरों में स्थापित करने के लिए खरीदते हैं।
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