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IAS बनने का सपना अधूरा रहा, अन्नू कपूर बोले- हालात थिएटर तक ले आए, ‘अंताक्षरी’ से बदली जिंदगी
बालीवुड न्यूज़
1992 में काम नहीं था, ड्राइवर की तनख्वाह तक देने के पैसे नहीं बचे; अन्नू कपूर ने सुनाई संघर्ष से टीवी स्टार बनने तक की कहानी
दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर की पहचान आज अभिनेता, गायक और टीवी होस्ट के तौर पर है, लेकिन अभिनय कभी उनके जीवन का पहला सपना नहीं था। वह पढ़ाई पूरी करके IAS अधिकारी बनना चाहते थे। घर की आर्थिक स्थिति ने उनकी योजना बदल दी और पढ़ाई बीच में छूटने के बाद उन्हें पिता के थिएटर से जुड़ना पड़ा। यहीं से वह रास्ता शुरू हुआ जिसने बाद में उन्हें फिल्म, टीवी और रंगमंच की दुनिया में अलग पहचान दिलाई।
अपनी फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ को लेकर चर्चा में चल रहे अन्नू कपूर ने अपने जीवन के ऐसे कई दौर याद किए हैं, जब हालात उनके हिसाब से बिल्कुल नहीं चले। उन्होंने अपने अधूरे सपने, आर्थिक तंगी, थिएटर में आने की वजह, अंधविश्वास और ‘अंताक्षरी’ से मिली पहचान तक कई बातें साझा कीं। उनकी नई फिल्म भी कर्म और किस्मत के बीच इसी पुराने सवाल को व्यंग्य के जरिए सामने रखती है।
अन्नू कपूर का मानना है कि इंसान जो कर्म करता है, वह भी कहीं न कहीं उसकी नियति का हिस्सा होता है। उनके मुताबिक जीवन में कई बार व्यक्ति किसी एक दिशा में जाना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां उसे बिल्कुल दूसरी जगह पहुंचा देती हैं। उनके अपने जीवन में भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने जिस पेशे के बारे में नहीं सोचा था, आखिरकार उसी ने उनकी पूरी पहचान तय कर दी।
बचपन और युवावस्था में अन्नू पढ़ाई को लेकर गंभीर थे। उनका अकादमिक रिकॉर्ड भी अच्छा था और वह सिविल सेवा में जाने का सपना देखते थे। उनकी इच्छा IAS अधिकारी बनने की थी, लेकिन परिवार के पास आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने के पर्याप्त साधन नहीं थे। न कोई ऐसा सहारा था जो उनकी शिक्षा की जिम्मेदारी उठा सके और न परिस्थितियां इंतजार करने वाली थीं।
पढ़ाई रुकने के बाद उनके सामने भविष्य का बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ऐसे समय में वह अपने पिता के थिएटर से जुड़ गए। अन्नू कपूर इसे किसी पहले से बनाई गई करियर योजना की तरह नहीं देखते। उनके मुताबिक परिस्थितियां ऐसी थीं कि परिवार के काम से जुड़ना पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे रोजगार का दूसरा रास्ता न मिलने पर कोई युवक अपने पिता के कारोबार में हाथ बंटाने लगता है।
आज लोग उनके अभिनेता बनने को अच्छी किस्मत मानते हैं, लेकिन अन्नू इस कहानी को दूसरे नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि जिस मुकाम तक वह पहुंचे, वह उनकी नियति हो सकती है, मगर सच यह भी है कि जिस पेशे में वह जाना चाहते थे, वहां नहीं पहुंच पाए। समय के साथ उन्होंने इस वास्तविकता को स्वीकार करना सीखा।
अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने बचपन के एक दोस्त का किस्सा भी साझा किया। उनका एक दोस्त पढ़ाई में काफी तेज था और उसकी रुचि शिक्षा में थी, लेकिन परिवार का बड़ा व्यापार होने के कारण उसे कारोबार संभालना पड़ा। उसका मन किसी दूसरी दिशा में था, जबकि जिंदगी ने उसे पारिवारिक व्यवसाय के बीच ला खड़ा किया।
अन्नू कपूर इसी अनुभव के जरिए कहते हैं कि कई बार इंसान अपने लिए कुछ और तय करता है, जबकि परिस्थितियां उसे किसी दूसरी भूमिका में पहुंचा देती हैं। यही वजह है कि वह कर्म और भाग्य को पूरी तरह अलग-अलग नहीं देखते। उनके मुताबिक जीवन में होने वाली घटनाओं पर इंसान का नियंत्रण उतना सीधा नहीं होता, जितना अक्सर माना जाता है।
सोशल मीडिया पर किस्मत बदलने के नाम पर चल रहे कारोबार को लेकर भी अन्नू कपूर ने सवाल उठाए। ज्योतिषीय पत्थर, अंगूठियां और अलग-अलग उपायों के जरिए भविष्य बदलने के दावों को वह इंसान के डर और उम्मीद से जुड़ा बाजार मानते हैं।
उनका कहना है कि जब किसी उपाय के बाद संयोग से कोई अच्छी घटना हो जाती है, तो लोग उसका श्रेय उस वस्तु या उपाय को देने लगते हैं। यही विश्वास धीरे-धीरे अंधविश्वास में बदल सकता है। उनके मुताबिक किसी चीज की वास्तविक कीमत परिस्थितियां तय करती हैं, केवल उसके बारे में बनी धारणा नहीं।
इस संदर्भ में उन्होंने कोविड महामारी के दौर का उदाहरण दिया। उस समय लोगों के पास पैसा, सोना और दूसरी महंगी संपत्ति होने के बावजूद सबसे जरूरी चीज ऑक्सीजन बन गई थी। जिस हवा को सामान्य दिनों में कोई संपत्ति नहीं मानता, संकट के वक्त उसी की उपलब्धता जीवन और मृत्यु के बीच फर्क पैदा कर रही थी।
अन्नू कपूर के मुताबिक यही अनुभव बताता है कि किसी वस्तु की कीमत समय और जरूरत के साथ बदलती रहती है। जिस चीज को एक दौर में सबसे मूल्यवान माना जाता है, जरूरी नहीं कि संकट के समय भी वही सबसे काम आए। ‘उत्तर दा पुत्तर’ में अन्नू कपूर एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे हैं, जो विज्ञान पढ़ाने के बावजूद खुद मेटाफिजिक्स और उससे जुड़ी मान्यताओं में उलझ जाता है। यही विरोधाभास उनके किरदार को दिलचस्प बनाता है।
फिल्म के निर्माता संदीप कपूर ने शुरुआत में उनसे निर्देशन की जिम्मेदारी लेने की बात भी कही थी। अन्नू ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उनका कहना है कि अभिनय और निर्देशन दोनों जिम्मेदारियां एक साथ संभालना उनके लिए सहज नहीं है और वह अपनी सीमाओं को पहचानते हैं।
इसी तरह राजनीति को लेकर भी उनका नजरिया साफ है। उनका मानना है कि अच्छा वक्ता होना और शासन चलाने की क्षमता रखना दो अलग बातें हैं। केवल लोकप्रियता या बोलने की कला किसी व्यक्ति को राजनीति के लिए योग्य नहीं बना देती। चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में अन्नू कपूर ने कई ऐसे अनुभव देखे जिन्होंने जीवन और सफलता को लेकर उनकी सोच बदली। ऐसा ही एक अनुभव 1985-86 के आसपास का है, जब वह जयपुर से कोटा की ओर यात्रा कर रहे थे।
रास्ते में टोंक के पास उन्होंने एक खेत के नजदीक गाड़ी रुकवाई और वहां मौजूद किसान से पानी मांगा। किसान ने उन्हें पीतल के गिलास में ठंडा पानी दिया और साथ में खेत की ताजी गाजर खाने को दी। गर्मी और यात्रा के बीच वह साधारण सा पानी और भोजन उन्हें बेहद अच्छा लगा। इसी दौरान किसान की कही एक बात उनके मन में हमेशा के लिए रह गई। किसान का आशय था कि आनंद बड़ी अजीब चीज है—कभी करोड़ों रुपए खर्च करके भी नहीं मिलता और कभी एक गिलास ठंडे पानी में मिल जाता है।
अन्नू कपूर के मुताबिक उस छोटी सी घटना ने उन्हें संतुष्टि का अर्थ अलग तरीके से समझाया। जीवन में सुख केवल धन या बड़ी उपलब्धियों से नहीं आता। कई बार कोई छोटा अनुभव भी ऐसा सुकून दे जाता है, जो बड़ी सफलता में नहीं मिलता। अपने करियर में ‘कबीर’, ‘अंताक्षरी’ और ‘विक्की डोनर’ जैसे प्रोजेक्ट्स को वह इसी तरह के संतोष से जोड़कर देखते हैं। इन कामों ने उन्हें केवल पेशेवर पहचान नहीं दी, बल्कि एक कलाकार के तौर पर अलग तरह का आत्मिक सुकून भी दिया।
हालांकि इस पहचान तक पहुंचने से पहले अन्नू कपूर की जिंदगी में आर्थिक संकट का बेहद मुश्किल दौर भी आया। उन्होंने बताया कि 4 मई 1992 के आसपास उनकी जिंदगी में ऐसा समय शुरू हुआ, जब कई महीनों तक उनके पास नियमित काम नहीं था।
वह करीब एक हजार रुपए किराए वाले छोटे से कमरे में रहते थे। शूटिंग नहीं थी और आय का कोई निश्चित जरिया भी नहीं बचा था। हालत ऐसी हो गई थी कि जेब में नकद पैसा तक नहीं रहता था।
काम न होने की वजह से दिन काटना भी मुश्किल था। वह कई बार दोस्तों के यहां जाकर समय बिताते और रात में ताश खेलते थे। सुबह देर तक सोने की कोशिश करते ताकि नाश्ता छोड़कर सीधे दोपहर का खाना खाया जा सके और एक वक्त के भोजन का खर्च बच जाए।
आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई थी कि अपने ड्राइवर केशव दत्त की तनख्वाह देना भी मुश्किल हो गया। उस समय ड्राइवर को करीब 750 रुपए मिलते थे। अन्नू कपूर ने उससे कहा कि वह दूसरी जगह नौकरी कर ले, जहां उसे लगभग दो हजार रुपए महीने तक मिल सकते हैं। लेकिन केशव दत्त ने मुश्किल समय में उनका साथ छोड़ने से इनकार कर दिया। उसने साफ कहा कि अच्छे समय में साथ छोड़ना अलग बात होती, लेकिन बुरे दौर में वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगा। तनख्वाह कुछ समय न मिले तो भी वह साथ काम करता रहेगा।
अन्नू कपूर इस घटना को आज भी अपने जीवन की बड़ी यादों में गिनते हैं। उनके मुताबिक पैसा न होने के बावजूद किसी व्यक्ति का बिना स्वार्थ साथ खड़ा रहना बड़ी बात होती है। ऐसे लोग केवल पेशेवर रिश्ते का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि जिंदगी की कहानी में हमेशा के लिए जुड़ जाते हैं।
करीब साढ़े चार महीने तक आर्थिक संकट झेलने के बाद उन्हें पहली छोटी राहत मिली। एक व्यक्ति ने दिल्ली में बनने वाली वीडियो फिल्म के लिए उन्हें काम दिया और पांच हजार रुपए एडवांस मिले। उस समय यह रकम उनके लिए केवल फीस नहीं, बल्कि मुश्किल दौर से निकलने की पहली उम्मीद थी।
इसके बाद 1993 आया और इसी साल एक टीवी कार्यक्रम ने उनके करियर की दिशा बदल दी। 3 सितंबर 1993 की रात वह अपने एक दोस्त के घर मौजूद थे। रोजमर्रा की तरह वहां समय बीत रहा था और टीवी चल रहा था। रात करीब आठ बजे दोस्त की पत्नी ने अचानक उनका ध्यान टीवी स्क्रीन की ओर दिलाया। स्क्रीन पर अन्नू कपूर खुद दिखाई दे रहे थे। यह उस कार्यक्रम का पहला एपिसोड था जिसकी शूटिंग वह करीब डेढ़ महीने पहले कर चुके थे।
वह कार्यक्रम था ‘अंताक्षरी’। अन्नू कपूर ने जैसे ही खुद को टीवी पर देखा, उनका पूरा ध्यान कार्यक्रम पर टिक गया। उस समय शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यही शो आने वाले वर्षों में उनकी पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा बनने वाला है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद उनके दोस्त ने उनसे कहा कि अब शायद जिंदगी में पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आने वाले समय में यह बात काफी हद तक सच साबित हुई।
‘अंताक्षरी’ घर-घर देखा जाने वाला कार्यक्रम बना और अन्नू कपूर की होस्टिंग उसकी सबसे बड़ी पहचान में शामिल हो गई। उनकी बोलने की शैली, संगीत की जानकारी और मंच संभालने के अंदाज ने उन्हें टीवी दर्शकों के बीच अलग जगह दिलाई। जिस कलाकार के पास कुछ महीने पहले नियमित काम नहीं था और ड्राइवर की तनख्वाह देने तक की स्थिति नहीं थी, वही चेहरा कुछ समय बाद भारतीय टेलीविजन के सबसे पहचाने जाने वाले होस्ट्स में शामिल हो गया।
अब ‘उत्तर दा पुत्तर’ के जरिए अन्नू कपूर एक बार फिर उसी सवाल के आसपास दिखाई दे रहे हैं जिसने उनके अपने जीवन को भी कई बार प्रभावित किया—इंसान की दिशा उसके कर्म तय करते हैं या किस्मत। फिल्म में उनका किरदार विज्ञान से जुड़ा होने के बावजूद ऐसी मान्यताओं के बीच फंसता है जिन्हें विज्ञान की कसौटी पर आसानी से नहीं रखा जा सकता। कहानी इसी टकराव को गंभीर उपदेश की जगह व्यंग्य और मनोरंजन के साथ सामने लाती है।
अन्नू कपूर के मुताबिक फिल्म दर्शकों को कोई तय जवाब देने का दावा नहीं करती। कहानी के केंद्र में यही सवाल रखा गया है कि जिंदगी में होने वाली घटनाएं केवल हमारे फैसलों और कर्मों का परिणाम हैं या उन घटनाओं के पीछे कोई ऐसी दिशा भी काम कर रही होती है, जिसे इंसान पहले से देख या समझ नहीं पाता।
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IAS बनने का सपना अधूरा रहा, अन्नू कपूर बोले- हालात थिएटर तक ले आए, ‘अंताक्षरी’ से बदली जिंदगी
बालीवुड न्यूज़
दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर की पहचान आज अभिनेता, गायक और टीवी होस्ट के तौर पर है, लेकिन अभिनय कभी उनके जीवन का पहला सपना नहीं था। वह पढ़ाई पूरी करके IAS अधिकारी बनना चाहते थे। घर की आर्थिक स्थिति ने उनकी योजना बदल दी और पढ़ाई बीच में छूटने के बाद उन्हें पिता के थिएटर से जुड़ना पड़ा। यहीं से वह रास्ता शुरू हुआ जिसने बाद में उन्हें फिल्म, टीवी और रंगमंच की दुनिया में अलग पहचान दिलाई।
अपनी फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ को लेकर चर्चा में चल रहे अन्नू कपूर ने अपने जीवन के ऐसे कई दौर याद किए हैं, जब हालात उनके हिसाब से बिल्कुल नहीं चले। उन्होंने अपने अधूरे सपने, आर्थिक तंगी, थिएटर में आने की वजह, अंधविश्वास और ‘अंताक्षरी’ से मिली पहचान तक कई बातें साझा कीं। उनकी नई फिल्म भी कर्म और किस्मत के बीच इसी पुराने सवाल को व्यंग्य के जरिए सामने रखती है।
अन्नू कपूर का मानना है कि इंसान जो कर्म करता है, वह भी कहीं न कहीं उसकी नियति का हिस्सा होता है। उनके मुताबिक जीवन में कई बार व्यक्ति किसी एक दिशा में जाना चाहता है, लेकिन परिस्थितियां उसे बिल्कुल दूसरी जगह पहुंचा देती हैं। उनके अपने जीवन में भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने जिस पेशे के बारे में नहीं सोचा था, आखिरकार उसी ने उनकी पूरी पहचान तय कर दी।
बचपन और युवावस्था में अन्नू पढ़ाई को लेकर गंभीर थे। उनका अकादमिक रिकॉर्ड भी अच्छा था और वह सिविल सेवा में जाने का सपना देखते थे। उनकी इच्छा IAS अधिकारी बनने की थी, लेकिन परिवार के पास आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने के पर्याप्त साधन नहीं थे। न कोई ऐसा सहारा था जो उनकी शिक्षा की जिम्मेदारी उठा सके और न परिस्थितियां इंतजार करने वाली थीं।
पढ़ाई रुकने के बाद उनके सामने भविष्य का बड़ा सवाल खड़ा हो गया। ऐसे समय में वह अपने पिता के थिएटर से जुड़ गए। अन्नू कपूर इसे किसी पहले से बनाई गई करियर योजना की तरह नहीं देखते। उनके मुताबिक परिस्थितियां ऐसी थीं कि परिवार के काम से जुड़ना पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे रोजगार का दूसरा रास्ता न मिलने पर कोई युवक अपने पिता के कारोबार में हाथ बंटाने लगता है।
आज लोग उनके अभिनेता बनने को अच्छी किस्मत मानते हैं, लेकिन अन्नू इस कहानी को दूसरे नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि जिस मुकाम तक वह पहुंचे, वह उनकी नियति हो सकती है, मगर सच यह भी है कि जिस पेशे में वह जाना चाहते थे, वहां नहीं पहुंच पाए। समय के साथ उन्होंने इस वास्तविकता को स्वीकार करना सीखा।
अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने बचपन के एक दोस्त का किस्सा भी साझा किया। उनका एक दोस्त पढ़ाई में काफी तेज था और उसकी रुचि शिक्षा में थी, लेकिन परिवार का बड़ा व्यापार होने के कारण उसे कारोबार संभालना पड़ा। उसका मन किसी दूसरी दिशा में था, जबकि जिंदगी ने उसे पारिवारिक व्यवसाय के बीच ला खड़ा किया।
अन्नू कपूर इसी अनुभव के जरिए कहते हैं कि कई बार इंसान अपने लिए कुछ और तय करता है, जबकि परिस्थितियां उसे किसी दूसरी भूमिका में पहुंचा देती हैं। यही वजह है कि वह कर्म और भाग्य को पूरी तरह अलग-अलग नहीं देखते। उनके मुताबिक जीवन में होने वाली घटनाओं पर इंसान का नियंत्रण उतना सीधा नहीं होता, जितना अक्सर माना जाता है।
सोशल मीडिया पर किस्मत बदलने के नाम पर चल रहे कारोबार को लेकर भी अन्नू कपूर ने सवाल उठाए। ज्योतिषीय पत्थर, अंगूठियां और अलग-अलग उपायों के जरिए भविष्य बदलने के दावों को वह इंसान के डर और उम्मीद से जुड़ा बाजार मानते हैं।
उनका कहना है कि जब किसी उपाय के बाद संयोग से कोई अच्छी घटना हो जाती है, तो लोग उसका श्रेय उस वस्तु या उपाय को देने लगते हैं। यही विश्वास धीरे-धीरे अंधविश्वास में बदल सकता है। उनके मुताबिक किसी चीज की वास्तविक कीमत परिस्थितियां तय करती हैं, केवल उसके बारे में बनी धारणा नहीं।
इस संदर्भ में उन्होंने कोविड महामारी के दौर का उदाहरण दिया। उस समय लोगों के पास पैसा, सोना और दूसरी महंगी संपत्ति होने के बावजूद सबसे जरूरी चीज ऑक्सीजन बन गई थी। जिस हवा को सामान्य दिनों में कोई संपत्ति नहीं मानता, संकट के वक्त उसी की उपलब्धता जीवन और मृत्यु के बीच फर्क पैदा कर रही थी।
अन्नू कपूर के मुताबिक यही अनुभव बताता है कि किसी वस्तु की कीमत समय और जरूरत के साथ बदलती रहती है। जिस चीज को एक दौर में सबसे मूल्यवान माना जाता है, जरूरी नहीं कि संकट के समय भी वही सबसे काम आए। ‘उत्तर दा पुत्तर’ में अन्नू कपूर एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे हैं, जो विज्ञान पढ़ाने के बावजूद खुद मेटाफिजिक्स और उससे जुड़ी मान्यताओं में उलझ जाता है। यही विरोधाभास उनके किरदार को दिलचस्प बनाता है।
फिल्म के निर्माता संदीप कपूर ने शुरुआत में उनसे निर्देशन की जिम्मेदारी लेने की बात भी कही थी। अन्नू ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उनका कहना है कि अभिनय और निर्देशन दोनों जिम्मेदारियां एक साथ संभालना उनके लिए सहज नहीं है और वह अपनी सीमाओं को पहचानते हैं।
इसी तरह राजनीति को लेकर भी उनका नजरिया साफ है। उनका मानना है कि अच्छा वक्ता होना और शासन चलाने की क्षमता रखना दो अलग बातें हैं। केवल लोकप्रियता या बोलने की कला किसी व्यक्ति को राजनीति के लिए योग्य नहीं बना देती। चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में अन्नू कपूर ने कई ऐसे अनुभव देखे जिन्होंने जीवन और सफलता को लेकर उनकी सोच बदली। ऐसा ही एक अनुभव 1985-86 के आसपास का है, जब वह जयपुर से कोटा की ओर यात्रा कर रहे थे।
रास्ते में टोंक के पास उन्होंने एक खेत के नजदीक गाड़ी रुकवाई और वहां मौजूद किसान से पानी मांगा। किसान ने उन्हें पीतल के गिलास में ठंडा पानी दिया और साथ में खेत की ताजी गाजर खाने को दी। गर्मी और यात्रा के बीच वह साधारण सा पानी और भोजन उन्हें बेहद अच्छा लगा। इसी दौरान किसान की कही एक बात उनके मन में हमेशा के लिए रह गई। किसान का आशय था कि आनंद बड़ी अजीब चीज है—कभी करोड़ों रुपए खर्च करके भी नहीं मिलता और कभी एक गिलास ठंडे पानी में मिल जाता है।
अन्नू कपूर के मुताबिक उस छोटी सी घटना ने उन्हें संतुष्टि का अर्थ अलग तरीके से समझाया। जीवन में सुख केवल धन या बड़ी उपलब्धियों से नहीं आता। कई बार कोई छोटा अनुभव भी ऐसा सुकून दे जाता है, जो बड़ी सफलता में नहीं मिलता। अपने करियर में ‘कबीर’, ‘अंताक्षरी’ और ‘विक्की डोनर’ जैसे प्रोजेक्ट्स को वह इसी तरह के संतोष से जोड़कर देखते हैं। इन कामों ने उन्हें केवल पेशेवर पहचान नहीं दी, बल्कि एक कलाकार के तौर पर अलग तरह का आत्मिक सुकून भी दिया।
हालांकि इस पहचान तक पहुंचने से पहले अन्नू कपूर की जिंदगी में आर्थिक संकट का बेहद मुश्किल दौर भी आया। उन्होंने बताया कि 4 मई 1992 के आसपास उनकी जिंदगी में ऐसा समय शुरू हुआ, जब कई महीनों तक उनके पास नियमित काम नहीं था।
वह करीब एक हजार रुपए किराए वाले छोटे से कमरे में रहते थे। शूटिंग नहीं थी और आय का कोई निश्चित जरिया भी नहीं बचा था। हालत ऐसी हो गई थी कि जेब में नकद पैसा तक नहीं रहता था।
काम न होने की वजह से दिन काटना भी मुश्किल था। वह कई बार दोस्तों के यहां जाकर समय बिताते और रात में ताश खेलते थे। सुबह देर तक सोने की कोशिश करते ताकि नाश्ता छोड़कर सीधे दोपहर का खाना खाया जा सके और एक वक्त के भोजन का खर्च बच जाए।
आर्थिक तंगी इतनी बढ़ गई थी कि अपने ड्राइवर केशव दत्त की तनख्वाह देना भी मुश्किल हो गया। उस समय ड्राइवर को करीब 750 रुपए मिलते थे। अन्नू कपूर ने उससे कहा कि वह दूसरी जगह नौकरी कर ले, जहां उसे लगभग दो हजार रुपए महीने तक मिल सकते हैं। लेकिन केशव दत्त ने मुश्किल समय में उनका साथ छोड़ने से इनकार कर दिया। उसने साफ कहा कि अच्छे समय में साथ छोड़ना अलग बात होती, लेकिन बुरे दौर में वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगा। तनख्वाह कुछ समय न मिले तो भी वह साथ काम करता रहेगा।
अन्नू कपूर इस घटना को आज भी अपने जीवन की बड़ी यादों में गिनते हैं। उनके मुताबिक पैसा न होने के बावजूद किसी व्यक्ति का बिना स्वार्थ साथ खड़ा रहना बड़ी बात होती है। ऐसे लोग केवल पेशेवर रिश्ते का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि जिंदगी की कहानी में हमेशा के लिए जुड़ जाते हैं।
करीब साढ़े चार महीने तक आर्थिक संकट झेलने के बाद उन्हें पहली छोटी राहत मिली। एक व्यक्ति ने दिल्ली में बनने वाली वीडियो फिल्म के लिए उन्हें काम दिया और पांच हजार रुपए एडवांस मिले। उस समय यह रकम उनके लिए केवल फीस नहीं, बल्कि मुश्किल दौर से निकलने की पहली उम्मीद थी।
इसके बाद 1993 आया और इसी साल एक टीवी कार्यक्रम ने उनके करियर की दिशा बदल दी। 3 सितंबर 1993 की रात वह अपने एक दोस्त के घर मौजूद थे। रोजमर्रा की तरह वहां समय बीत रहा था और टीवी चल रहा था। रात करीब आठ बजे दोस्त की पत्नी ने अचानक उनका ध्यान टीवी स्क्रीन की ओर दिलाया। स्क्रीन पर अन्नू कपूर खुद दिखाई दे रहे थे। यह उस कार्यक्रम का पहला एपिसोड था जिसकी शूटिंग वह करीब डेढ़ महीने पहले कर चुके थे।
वह कार्यक्रम था ‘अंताक्षरी’। अन्नू कपूर ने जैसे ही खुद को टीवी पर देखा, उनका पूरा ध्यान कार्यक्रम पर टिक गया। उस समय शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यही शो आने वाले वर्षों में उनकी पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा बनने वाला है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद उनके दोस्त ने उनसे कहा कि अब शायद जिंदगी में पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आने वाले समय में यह बात काफी हद तक सच साबित हुई।
‘अंताक्षरी’ घर-घर देखा जाने वाला कार्यक्रम बना और अन्नू कपूर की होस्टिंग उसकी सबसे बड़ी पहचान में शामिल हो गई। उनकी बोलने की शैली, संगीत की जानकारी और मंच संभालने के अंदाज ने उन्हें टीवी दर्शकों के बीच अलग जगह दिलाई। जिस कलाकार के पास कुछ महीने पहले नियमित काम नहीं था और ड्राइवर की तनख्वाह देने तक की स्थिति नहीं थी, वही चेहरा कुछ समय बाद भारतीय टेलीविजन के सबसे पहचाने जाने वाले होस्ट्स में शामिल हो गया।
अब ‘उत्तर दा पुत्तर’ के जरिए अन्नू कपूर एक बार फिर उसी सवाल के आसपास दिखाई दे रहे हैं जिसने उनके अपने जीवन को भी कई बार प्रभावित किया—इंसान की दिशा उसके कर्म तय करते हैं या किस्मत। फिल्म में उनका किरदार विज्ञान से जुड़ा होने के बावजूद ऐसी मान्यताओं के बीच फंसता है जिन्हें विज्ञान की कसौटी पर आसानी से नहीं रखा जा सकता। कहानी इसी टकराव को गंभीर उपदेश की जगह व्यंग्य और मनोरंजन के साथ सामने लाती है।
अन्नू कपूर के मुताबिक फिल्म दर्शकों को कोई तय जवाब देने का दावा नहीं करती। कहानी के केंद्र में यही सवाल रखा गया है कि जिंदगी में होने वाली घटनाएं केवल हमारे फैसलों और कर्मों का परिणाम हैं या उन घटनाओं के पीछे कोई ऐसी दिशा भी काम कर रही होती है, जिसे इंसान पहले से देख या समझ नहीं पाता।
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