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केके मेनन बचपन में बनना चाहते थे ट्रेन ड्राइवर, स्कूल के पुराने किस्से किए शेयर
बालीवुड न्यूज़
‘आदर्श बाल विद्यालय’ की टीम ने खोला यादों का पिटारा, अर्चना पूरन सिंह का सपना था एयर होस्टेस बनना; एग्जाम, चीटिंग और टीचर्स की सजा के किस्से भी सुनाए
स्कूल खत्म होने के कई साल बाद शायद रिपोर्ट कार्ड के नंबर धुंधले पड़ जाएं, लेकिन क्लास की शरारतें, दोस्तों के साथ बिताया वक्त और टीचर की डांट आसानी से नहीं भूलती। कभी रीसेस की घंटी का इंतजार तो कभी अचानक होने वाले यूनिट टेस्ट का डर। ऐसी ही स्कूल लाइफ की यादों को लेकर प्राइम वीडियो की सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ चर्चा में है।
सीरीज से जुड़े कलाकार केके मेनन, नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, समीर सक्सेना और हिमांक गौर ने बातचीत के दौरान अपने स्कूल के दिनों के कई दिलचस्प अनुभव साझा किए। किसी ने बचपन के करियर सपने बताए तो किसी ने टीचर्स से मिली सजा और परीक्षा से जुड़े मजेदार किस्से याद किए।
बातचीत में स्कूल की यादों से शुरू हुआ सिलसिला धीरे-धीरे मौजूदा शिक्षा व्यवस्था तक पहुंच गया। कलाकारों ने शिक्षकों की भूमिका, बच्चों पर मार्क्स के दबाव और टीचिंग प्रोफेशन को मिलने वाले सम्मान जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी।
नवीन कस्तूरिया से जब स्कूल की सबसे मजबूत याद पूछी गई तो उन्हें सबसे पहले रीसेस याद आया। उनके मुताबिक स्कूल के दिनों में पढ़ाई के बीच यही वह समय होता था जिसका बच्चे बेसब्री से इंतजार करते थे। दोस्तों से मिलने, साथ खाना खाने और मस्ती करने का मौका इसी दौरान मिलता था।
नवीन ने स्कूल के दिनों का एक और बड़ा डर याद किया—यूनिट टेस्ट। उस उम्र में छोटी सी परीक्षा भी बहुत बड़ी चुनौती लगती थी। बस यही लगता था कि किसी तरह टेस्ट खत्म हो जाए और कुछ दिनों तक पढ़ाई का दबाव थोड़ा कम हो।
केके मेनन की स्कूल से जुड़ी यादें पढ़ाई के एक खास विषय से भी जुड़ी हैं। उन्हें इतिहास पढ़ना सबसे ज्यादा पसंद था। स्कूल के दिनों में शुरू हुई इतिहास के प्रति उनकी दिलचस्पी आगे भी बनी रही और आज भी वे ऐतिहासिक विषयों को पढ़ना और उनके बारे में जानना पसंद करते हैं।
बात जब बचपन में देखे गए करियर के सपनों तक पहुंची तो कई मजेदार जवाब सामने आए। आज अभिनेता के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके केके मेनन का पहला सपना अभिनय से बिल्कुल अलग था। वह बचपन में ट्रेन चलाना चाहते थे।
केके मेनन को बड़े वाहन और खासकर लोकोमोटिव काफी आकर्षित करते थे। उनके मन में यह जानने की उत्सुकता रहती थी कि इतनी बड़ी और भारी ट्रेन आखिर नियंत्रित कैसे की जाती होगी। इसी उत्सुकता की वजह से एक समय उन्होंने ट्रेन ड्राइवर बनने का सपना देखा था।
अर्चना पूरन सिंह की बचपन की पसंद भी दिलचस्प थी। वह एयर होस्टेस बनना चाहती थीं। इसके पीछे उनका बचपन वाला सीधा सा तर्क था—उन्हें लगता था कि इस नौकरी में पूरी दुनिया घूमने को मिलेगी और बहुत सारी चॉकलेट भी मिलेंगी।
उम्र बढ़ने के साथ अर्चना का सपना बदल गया। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि उन्हें टीचर बनना चाहिए। स्कूल और शिक्षकों से जुड़ी उनकी कई यादें आज भी उनके साथ हैं, जिनका जिक्र उन्होंने बातचीत के दौरान किया।
नवीन कस्तूरिया का झुकाव कम उम्र से ही अभिनय की तरफ था। उन्होंने बताया कि छठी कक्षा तक वह एक्टर बनने के बारे में सोचते थे। बाद में पढ़ाई की दिशा बदली और उन्होंने IIT की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन सिनेमा और अभिनय के प्रति आकर्षण बना रहा।
स्कूल के टीचर्स का जिक्र शुरू हुआ तो लगभग हर कलाकार के पास कोई न कोई पुराना किस्सा था। इनमें पढ़ाई से ज्यादा वे घटनाएं याद आईं जिनमें टीचर का गुस्सा, सजा देने का अंदाज या क्लास में सुनाई गई कोई दिलचस्प कहानी शामिल थी।
समीर सक्सेना ने अपने स्कूल के एक शिक्षक को याद किया जिनका अनुशासन बनाए रखने का तरीका काफी सख्त था। क्लास में ज्यादा शोर होने पर बच्चों को लाइन में खड़ा कर दिया जाता था और सजा मिलती थी। उस समय डर लगने वाली ऐसी घटनाएं अब पुरानी यादों का हिस्सा बन चुकी हैं।
केके मेनन ने भी बताया कि उनके स्कूल के समय अनुशासन के तरीके आज से काफी अलग हुआ करते थे। क्लास में शरारत करने वाले बच्चों पर कभी चॉक फेंकी जाती थी, कभी डस्टर और कभी कान पकड़कर खड़ा होने की सजा मिलती थी।
पुराने दौर की स्कूली सजा को याद करते हुए कलाकारों ने माना कि उस समय इसे सामान्य अनुशासन का हिस्सा माना जाता था। हालांकि आज शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के साथ व्यवहार को लेकर सोच काफी बदल चुकी है।
अर्चना पूरन सिंह की यादों में एक ऐसे इंग्लिश टीचर भी हैं जिनकी क्लास का बच्चों को खास इंतजार रहता था। इसकी वजह केवल अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं थी। उनके शिक्षक पढ़ाई के बीच अचानक डरावनी कहानियां सुनाना शुरू कर देते थे।
खास तौर पर ड्रैकुला की कहानियां पूरी क्लास को पसंद आती थीं। बच्चे चाहते थे कि पढ़ाई जल्दी खत्म हो और कहानी शुरू हो जाए। अर्चना के लिए शिक्षक का यह अंदाज स्कूल की सबसे यादगार बातों में शामिल रहा।
समीर सक्सेना के स्कूल में भी कुछ ऐसा ही अनुभव था। उनके पीटी टीचर खेल के मैदान में गतिविधियां कराने के बजाय कई बार हॉरर फिल्मों की कहानियां सुनाने लगते थे। बच्चों के लिए पीटी का पीरियड इस वजह से अलग तरह का मनोरंजन बन जाता था।
स्कूल की यादों में परीक्षा का जिक्र हो और नकल की बात न आए, ऐसा कम ही होता है। बातचीत के दौरान कलाकारों ने इस विषय पर भी बिना झिझक अपने पुराने अनुभव साझा किए।
नवीन कस्तूरिया ने अपनी 12वीं की फिजिक्स परीक्षा को याद किया। उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि उस पेपर में उनका पास होना ही अपने आप में बड़ी बात थी। परीक्षा के दिनों का दबाव और कठिन विषयों का डर आज भी उनकी यादों में बना हुआ है।
केके मेनन ने परीक्षा से जुड़ा एक अलग किस्सा सुनाया। एक बार परीक्षा के दौरान पीछे बैठा छात्र उनकी आंसर शीट देखकर जवाब लिख रहा था। उसने लगभग पूरा उत्तर कॉपी कर लिया, लेकिन मामला ज्यादा देर छिप नहीं सका।
आखिरकार शिक्षक को इसकी जानकारी हो गई और दोनों पकड़ लिए गए। केके के मुताबिक मजेदार बात यह थी कि नकल दूसरा छात्र कर रहा था, लेकिन घटना में वह भी फंस गए। वर्षों बाद यह घटना उनके लिए स्कूल की मजेदार यादों में शामिल हो चुकी है।
अर्चना पूरन सिंह का अनुभव इससे बिल्कुल अलग था। उनके स्कूल का माहौल इतना सख्त था कि परीक्षा में नकल करने के बारे में सोचना भी बड़ी बात माना जाता था। अनुशासन और परीक्षा को लेकर नियम काफी कड़े थे।
स्कूल की इन हल्की-फुल्की यादों के बीच बातचीत मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर भी पहुंची। कलाकारों ने इस सवाल पर चर्चा की कि बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
नवीन कस्तूरिया का मानना है कि किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था तभी मजबूत हो सकती है, जब सबसे योग्य लोग टीचिंग को करियर के रूप में चुनें। इसके लिए शिक्षक के पेशे को समाज में सम्मान के साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत बनाना जरूरी है।
उनके मुताबिक अगर अच्छे और प्रतिभाशाली लोगों को शिक्षण के क्षेत्र में लाना है तो इस पेशे को आकर्षक बनाना होगा। केवल जिम्मेदारी की बात करने से काम नहीं चलेगा, शिक्षकों को उनकी भूमिका के अनुरूप सुविधाएं और सम्मान भी मिलना चाहिए।
केके मेनन ने भी शिक्षकों की सामाजिक स्थिति को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने भारत की पुरानी गुरु परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षक को कभी समाज में बेहद ऊंचा स्थान दिया जाता था, लेकिन समय के साथ उस सम्मान में बदलाव आया है।
उनका मानना है कि शिक्षक केवल किताब का पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। बच्चों की सोच, व्यवहार और दुनिया को देखने के नजरिए पर शिक्षक का गहरा असर पड़ता है। इसी वजह से टीचिंग प्रोफेशन को ज्यादा गंभीरता से देखने की जरूरत है।
अर्चना पूरन सिंह ने शिक्षा में मार्क्स को जरूरत से ज्यादा महत्व दिए जाने के मुद्दे पर अपनी बात रखी। उनके मुताबिक बच्चों की सफलता केवल परीक्षा में मिले नंबरों से तय नहीं की जानी चाहिए।
बच्चों को अच्छा विद्यार्थी बनाने के साथ एक बेहतर इंसान बनाना भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए। व्यवहार, संवेदनशीलता और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी जैसी चीजें केवल किताबों के नंबरों से नहीं सीखी जा सकतीं।
इन्हीं स्कूल की यादों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को ‘आदर्श बाल विद्यालय’ की कहानी में अलग अंदाज से शामिल किया गया है। सीरीज में कॉमेडी के जरिए स्कूल, शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावकों की दुनिया को दिखाने की कोशिश की गई है।
हिमांक गौर के मुताबिक कहानी देखते हुए दर्शकों को अपने स्कूल का कोई न कोई जाना-पहचाना किरदार जरूर याद आएगा। किसी को अपना सख्त टीचर दिखाई देगा तो किसी को क्लास का शरारती दोस्त या स्कूल के दिनों की कोई पुरानी घटना याद आ सकती है।
समीर सक्सेना का मानना है कि सीरीज में दिखाई देने वाली कई परिस्थितियां पहली नजर में मजेदार लग सकती हैं, लेकिन उनके पीछे वास्तविक जीवन और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल मौजूद हैं।
कलाकारों के मुताबिक स्कूल केवल पढ़ाई और परीक्षा तक सीमित जगह नहीं होती। वहीं दोस्ती बनती है, पहली बार असफलता का सामना होता है, टीचर की डांट मिलती है और कई ऐसी छोटी घटनाएं होती हैं जो वर्षों बाद भी याद रहती हैं।
केके मेनन के अनुसार कहानी का काम केवल दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं है। एक अच्छी कहानी देखने वाले को सोचने पर भी मजबूर करती है। ‘आदर्श बाल विद्यालय’ में स्कूल की पुरानी यादों के साथ शिक्षा व्यवस्था से जुड़े ऐसे ही सवालों को कहानी का हिस्सा बनाया गया है।
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स्कूल खत्म होने के कई साल बाद शायद रिपोर्ट कार्ड के नंबर धुंधले पड़ जाएं, लेकिन क्लास की शरारतें, दोस्तों के साथ बिताया वक्त और टीचर की डांट आसानी से नहीं भूलती। कभी रीसेस की घंटी का इंतजार तो कभी अचानक होने वाले यूनिट टेस्ट का डर। ऐसी ही स्कूल लाइफ की यादों को लेकर प्राइम वीडियो की सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ चर्चा में है।
सीरीज से जुड़े कलाकार केके मेनन, नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, समीर सक्सेना और हिमांक गौर ने बातचीत के दौरान अपने स्कूल के दिनों के कई दिलचस्प अनुभव साझा किए। किसी ने बचपन के करियर सपने बताए तो किसी ने टीचर्स से मिली सजा और परीक्षा से जुड़े मजेदार किस्से याद किए।
बातचीत में स्कूल की यादों से शुरू हुआ सिलसिला धीरे-धीरे मौजूदा शिक्षा व्यवस्था तक पहुंच गया। कलाकारों ने शिक्षकों की भूमिका, बच्चों पर मार्क्स के दबाव और टीचिंग प्रोफेशन को मिलने वाले सम्मान जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखी।
नवीन कस्तूरिया से जब स्कूल की सबसे मजबूत याद पूछी गई तो उन्हें सबसे पहले रीसेस याद आया। उनके मुताबिक स्कूल के दिनों में पढ़ाई के बीच यही वह समय होता था जिसका बच्चे बेसब्री से इंतजार करते थे। दोस्तों से मिलने, साथ खाना खाने और मस्ती करने का मौका इसी दौरान मिलता था।
नवीन ने स्कूल के दिनों का एक और बड़ा डर याद किया—यूनिट टेस्ट। उस उम्र में छोटी सी परीक्षा भी बहुत बड़ी चुनौती लगती थी। बस यही लगता था कि किसी तरह टेस्ट खत्म हो जाए और कुछ दिनों तक पढ़ाई का दबाव थोड़ा कम हो।
केके मेनन की स्कूल से जुड़ी यादें पढ़ाई के एक खास विषय से भी जुड़ी हैं। उन्हें इतिहास पढ़ना सबसे ज्यादा पसंद था। स्कूल के दिनों में शुरू हुई इतिहास के प्रति उनकी दिलचस्पी आगे भी बनी रही और आज भी वे ऐतिहासिक विषयों को पढ़ना और उनके बारे में जानना पसंद करते हैं।
बात जब बचपन में देखे गए करियर के सपनों तक पहुंची तो कई मजेदार जवाब सामने आए। आज अभिनेता के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके केके मेनन का पहला सपना अभिनय से बिल्कुल अलग था। वह बचपन में ट्रेन चलाना चाहते थे।
केके मेनन को बड़े वाहन और खासकर लोकोमोटिव काफी आकर्षित करते थे। उनके मन में यह जानने की उत्सुकता रहती थी कि इतनी बड़ी और भारी ट्रेन आखिर नियंत्रित कैसे की जाती होगी। इसी उत्सुकता की वजह से एक समय उन्होंने ट्रेन ड्राइवर बनने का सपना देखा था।
अर्चना पूरन सिंह की बचपन की पसंद भी दिलचस्प थी। वह एयर होस्टेस बनना चाहती थीं। इसके पीछे उनका बचपन वाला सीधा सा तर्क था—उन्हें लगता था कि इस नौकरी में पूरी दुनिया घूमने को मिलेगी और बहुत सारी चॉकलेट भी मिलेंगी।
उम्र बढ़ने के साथ अर्चना का सपना बदल गया। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि उन्हें टीचर बनना चाहिए। स्कूल और शिक्षकों से जुड़ी उनकी कई यादें आज भी उनके साथ हैं, जिनका जिक्र उन्होंने बातचीत के दौरान किया।
नवीन कस्तूरिया का झुकाव कम उम्र से ही अभिनय की तरफ था। उन्होंने बताया कि छठी कक्षा तक वह एक्टर बनने के बारे में सोचते थे। बाद में पढ़ाई की दिशा बदली और उन्होंने IIT की तैयारी शुरू कर दी, लेकिन सिनेमा और अभिनय के प्रति आकर्षण बना रहा।
स्कूल के टीचर्स का जिक्र शुरू हुआ तो लगभग हर कलाकार के पास कोई न कोई पुराना किस्सा था। इनमें पढ़ाई से ज्यादा वे घटनाएं याद आईं जिनमें टीचर का गुस्सा, सजा देने का अंदाज या क्लास में सुनाई गई कोई दिलचस्प कहानी शामिल थी।
समीर सक्सेना ने अपने स्कूल के एक शिक्षक को याद किया जिनका अनुशासन बनाए रखने का तरीका काफी सख्त था। क्लास में ज्यादा शोर होने पर बच्चों को लाइन में खड़ा कर दिया जाता था और सजा मिलती थी। उस समय डर लगने वाली ऐसी घटनाएं अब पुरानी यादों का हिस्सा बन चुकी हैं।
केके मेनन ने भी बताया कि उनके स्कूल के समय अनुशासन के तरीके आज से काफी अलग हुआ करते थे। क्लास में शरारत करने वाले बच्चों पर कभी चॉक फेंकी जाती थी, कभी डस्टर और कभी कान पकड़कर खड़ा होने की सजा मिलती थी।
पुराने दौर की स्कूली सजा को याद करते हुए कलाकारों ने माना कि उस समय इसे सामान्य अनुशासन का हिस्सा माना जाता था। हालांकि आज शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के साथ व्यवहार को लेकर सोच काफी बदल चुकी है।
अर्चना पूरन सिंह की यादों में एक ऐसे इंग्लिश टीचर भी हैं जिनकी क्लास का बच्चों को खास इंतजार रहता था। इसकी वजह केवल अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं थी। उनके शिक्षक पढ़ाई के बीच अचानक डरावनी कहानियां सुनाना शुरू कर देते थे।
खास तौर पर ड्रैकुला की कहानियां पूरी क्लास को पसंद आती थीं। बच्चे चाहते थे कि पढ़ाई जल्दी खत्म हो और कहानी शुरू हो जाए। अर्चना के लिए शिक्षक का यह अंदाज स्कूल की सबसे यादगार बातों में शामिल रहा।
समीर सक्सेना के स्कूल में भी कुछ ऐसा ही अनुभव था। उनके पीटी टीचर खेल के मैदान में गतिविधियां कराने के बजाय कई बार हॉरर फिल्मों की कहानियां सुनाने लगते थे। बच्चों के लिए पीटी का पीरियड इस वजह से अलग तरह का मनोरंजन बन जाता था।
स्कूल की यादों में परीक्षा का जिक्र हो और नकल की बात न आए, ऐसा कम ही होता है। बातचीत के दौरान कलाकारों ने इस विषय पर भी बिना झिझक अपने पुराने अनुभव साझा किए।
नवीन कस्तूरिया ने अपनी 12वीं की फिजिक्स परीक्षा को याद किया। उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि उस पेपर में उनका पास होना ही अपने आप में बड़ी बात थी। परीक्षा के दिनों का दबाव और कठिन विषयों का डर आज भी उनकी यादों में बना हुआ है।
केके मेनन ने परीक्षा से जुड़ा एक अलग किस्सा सुनाया। एक बार परीक्षा के दौरान पीछे बैठा छात्र उनकी आंसर शीट देखकर जवाब लिख रहा था। उसने लगभग पूरा उत्तर कॉपी कर लिया, लेकिन मामला ज्यादा देर छिप नहीं सका।
आखिरकार शिक्षक को इसकी जानकारी हो गई और दोनों पकड़ लिए गए। केके के मुताबिक मजेदार बात यह थी कि नकल दूसरा छात्र कर रहा था, लेकिन घटना में वह भी फंस गए। वर्षों बाद यह घटना उनके लिए स्कूल की मजेदार यादों में शामिल हो चुकी है।
अर्चना पूरन सिंह का अनुभव इससे बिल्कुल अलग था। उनके स्कूल का माहौल इतना सख्त था कि परीक्षा में नकल करने के बारे में सोचना भी बड़ी बात माना जाता था। अनुशासन और परीक्षा को लेकर नियम काफी कड़े थे।
स्कूल की इन हल्की-फुल्की यादों के बीच बातचीत मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर भी पहुंची। कलाकारों ने इस सवाल पर चर्चा की कि बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
नवीन कस्तूरिया का मानना है कि किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था तभी मजबूत हो सकती है, जब सबसे योग्य लोग टीचिंग को करियर के रूप में चुनें। इसके लिए शिक्षक के पेशे को समाज में सम्मान के साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत बनाना जरूरी है।
उनके मुताबिक अगर अच्छे और प्रतिभाशाली लोगों को शिक्षण के क्षेत्र में लाना है तो इस पेशे को आकर्षक बनाना होगा। केवल जिम्मेदारी की बात करने से काम नहीं चलेगा, शिक्षकों को उनकी भूमिका के अनुरूप सुविधाएं और सम्मान भी मिलना चाहिए।
केके मेनन ने भी शिक्षकों की सामाजिक स्थिति को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने भारत की पुरानी गुरु परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षक को कभी समाज में बेहद ऊंचा स्थान दिया जाता था, लेकिन समय के साथ उस सम्मान में बदलाव आया है।
उनका मानना है कि शिक्षक केवल किताब का पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। बच्चों की सोच, व्यवहार और दुनिया को देखने के नजरिए पर शिक्षक का गहरा असर पड़ता है। इसी वजह से टीचिंग प्रोफेशन को ज्यादा गंभीरता से देखने की जरूरत है।
अर्चना पूरन सिंह ने शिक्षा में मार्क्स को जरूरत से ज्यादा महत्व दिए जाने के मुद्दे पर अपनी बात रखी। उनके मुताबिक बच्चों की सफलता केवल परीक्षा में मिले नंबरों से तय नहीं की जानी चाहिए।
बच्चों को अच्छा विद्यार्थी बनाने के साथ एक बेहतर इंसान बनाना भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए। व्यवहार, संवेदनशीलता और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी जैसी चीजें केवल किताबों के नंबरों से नहीं सीखी जा सकतीं।
इन्हीं स्कूल की यादों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवालों को ‘आदर्श बाल विद्यालय’ की कहानी में अलग अंदाज से शामिल किया गया है। सीरीज में कॉमेडी के जरिए स्कूल, शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावकों की दुनिया को दिखाने की कोशिश की गई है।
हिमांक गौर के मुताबिक कहानी देखते हुए दर्शकों को अपने स्कूल का कोई न कोई जाना-पहचाना किरदार जरूर याद आएगा। किसी को अपना सख्त टीचर दिखाई देगा तो किसी को क्लास का शरारती दोस्त या स्कूल के दिनों की कोई पुरानी घटना याद आ सकती है।
समीर सक्सेना का मानना है कि सीरीज में दिखाई देने वाली कई परिस्थितियां पहली नजर में मजेदार लग सकती हैं, लेकिन उनके पीछे वास्तविक जीवन और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल मौजूद हैं।
कलाकारों के मुताबिक स्कूल केवल पढ़ाई और परीक्षा तक सीमित जगह नहीं होती। वहीं दोस्ती बनती है, पहली बार असफलता का सामना होता है, टीचर की डांट मिलती है और कई ऐसी छोटी घटनाएं होती हैं जो वर्षों बाद भी याद रहती हैं।
केके मेनन के अनुसार कहानी का काम केवल दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं है। एक अच्छी कहानी देखने वाले को सोचने पर भी मजबूर करती है। ‘आदर्श बाल विद्यालय’ में स्कूल की पुरानी यादों के साथ शिक्षा व्यवस्था से जुड़े ऐसे ही सवालों को कहानी का हिस्सा बनाया गया है।
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