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सोनम वांगचुक से नहीं बना था ‘3 इडियट्स’ का रैंचो? राजकुमार हिरानी ने बताई थी असली प्रेरणा
बालीवुड न्यूज़
FTII के एक छात्र की कहानी से आया था दूसरे की पहचान पर पढ़ने वाला किरदार; फिल्म की स्क्रिप्ट और आमिर-सोनम की मुलाकात की टाइमलाइन भी उठाती है सवाल
आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्स’ का नाम आते ही रैंचो यानी रणछोड़दास श्यामलदास चांचड़ और फुंसुख वांगडू का किरदार याद आता है। फिल्म रिलीज होने के बाद वर्षों से यह दावा भी दोहराया जाता रहा है कि इस किरदार के पीछे लद्दाख के शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की कहानी थी। सोशल मीडिया से लेकर कई मीडिया रिपोर्ट्स तक उन्हें ‘रियल लाइफ रैंचो’ कहा जाता रहा।
यह तुलना इतनी बार सामने आई कि धीरे-धीरे बहुत से दर्शकों ने इसे फिल्म से जुड़ा स्थापित तथ्य मान लिया। हालांकि फिल्म के लेखन की टाइमलाइन, इसके लेखक अभिजात जोशी और निर्देशक राजकुमार हिरानी के पुराने बयानों को देखा जाए तो कहानी कुछ अलग दिखाई देती है। रैंचो के मूल किरदार की प्रेरणा को लेकर फिल्म से जुड़े लोगों ने एक दूसरी घटना का जिक्र किया था।
‘3 इडियट्स’ दिसंबर 2009 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। फिल्म में आमिर खान ने ऐसे इंजीनियरिंग छात्र का किरदार निभाया था जो रटकर पढ़ने और केवल अच्छे नंबर हासिल करने वाली शिक्षा व्यवस्था पर लगातार सवाल करता है। उसका मानना था कि पढ़ाई का असली उद्देश्य सीखना और चीजों को समझना होना चाहिए, केवल डिग्री हासिल करना नहीं।
फिल्म की कहानी में आमिर का किरदार शुरुआत में रणछोड़दास श्यामलदास चांचड़ यानी रैंचो के नाम से सामने आता है। बाद में खुलासा होता है कि उसकी वास्तविक पहचान फुंसुख वांगडू है और वह किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था।
कहानी के अंतिम हिस्से में फुंसुख वांगडू को लद्दाख में बच्चों के लिए अलग तरह का स्कूल चलाते दिखाया गया। वहां बच्चे किताबों तक सीमित रहने के बजाय प्रयोग, विज्ञान और व्यावहारिक तरीके से सीखते नजर आते हैं। यहीं से फिल्मी किरदार और सोनम वांगचुक के काम के बीच तुलना सबसे ज्यादा मजबूत हुई।
सोनम वांगचुक भी इंजीनियर और शिक्षा सुधार के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। लद्दाख में शिक्षा के वैकल्पिक मॉडल पर उनके काम को देश और दुनिया में पहचान मिली। शिक्षा को स्थानीय जरूरतों और व्यावहारिक ज्ञान से जोड़ने की उनकी कोशिशों के कारण रैंचो के किरदार से समानताएं तलाशना आसान हो गया।
दोनों नामों ने भी इस धारणा को मजबूत किया। फिल्म में आमिर खान के किरदार का वास्तविक नाम ‘फुंसुख वांगडू’ बताया गया है, जबकि शिक्षा सुधारक का नाम सोनम वांगचुक है। लद्दाख की पृष्ठभूमि, शिक्षा से जुड़ा काम और नाम में सुनाई देने वाली समानता के कारण दोनों को जोड़कर देखा जाने लगा।
लेकिन फिल्म में दिखाई गई रैंचो की पूरी जिंदगी सोनम वांगचुक की वास्तविक जीवन यात्रा से मेल नहीं खाती। रैंचो की मुख्य कहानी इंजीनियरिंग कॉलेज, हॉस्टल, दोस्तों, परीक्षा के दबाव और कॉलेज प्रशासन के साथ उसके वैचारिक टकराव के आसपास घूमती है।
फिल्म में रैंचो एक संपन्न परिवार के बेटे की जगह इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने पहुंचता है। वह डिग्री किसी और के नाम पर हासिल करता है, जबकि उसका असली मकसद पढ़ना और सीखना होता है। यही कहानी फिल्म के केंद्रीय कथानक की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है। इस हिस्से की प्रेरणा को लेकर राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने अलग कहानी बताई थी। पुराने इंटरव्यू में दोनों ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी FTII से जुड़े एक छात्र की घटना का जिक्र किया था।
बताया गया कि उन्हें एक ऐसे युवक की कहानी के बारे में पता चला था जो औपचारिक डिग्री पाने की इच्छा से ज्यादा सीखने में दिलचस्पी रखता था। वह कथित तौर पर किसी दूसरे छात्र की पहचान के सहारे संस्थान में पहुंचा और वहां पढ़ाई से जुड़ गया। इस घटना ने लेखकों को एक ऐसे किरदार की कल्पना की दिशा दी जो डिग्री अपने नाम पर लेने की बजाय ज्ञान हासिल करने को ज्यादा महत्व देता है। ‘3 इडियट्स’ में रैंचो का दूसरे व्यक्ति की पहचान पर कॉलेज में पढ़ना इसी विचार से जोड़ा गया।
यही बिंदु उस लोकप्रिय दावे से अलग है जिसमें पूरे रैंचो या फुंसुख वांगडू को सीधे सोनम वांगचुक की बायोग्राफिकल छवि माना जाता है। फिल्म से जुड़े लोगों के पुराने बयानों में किरदार की मूल अवधारणा के लिए FTII से जुड़ी घटना का उल्लेख मिलता है। फिल्म की स्क्रिप्ट की टाइमलाइन भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ‘3 इडियट्स’ की पटकथा 1 अगस्त 2007 को स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर कराई गई थी।
दूसरी ओर, आमिर खान और सोनम वांगचुक की सार्वजनिक मुलाकात से जुड़ा उल्लेख अप्रैल 2008 के आसपास मिलता है। यानी जिस समय दोनों की मुलाकात की बात सामने आती है, उससे पहले फिल्म की स्क्रिप्ट रजिस्टर हो चुकी थी। यही समयक्रम सवाल पैदा करता है कि अगर कहानी और मुख्य किरदार की रूपरेखा 2007 तक तैयार होकर रजिस्टर हो चुकी थी, तो बाद में हुई मुलाकात को उसके मूल निर्माण की प्रेरणा कैसे माना जाए।
हालांकि किसी फिल्म की स्क्रिप्ट रजिस्टर होने के बाद उसमें बदलाव होना असामान्य नहीं है। शूटिंग तक पात्रों, दृश्यों और लोकेशन में बदलाव किए जा सकते हैं। इसलिए केवल स्क्रिप्ट रजिस्ट्रेशन की तारीख से हर संभावित प्रभाव को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
फिर भी किरदार की मूल प्रेरणा के सवाल पर राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी के बयान ज्यादा अहम हो जाते हैं। उन्होंने रैंचो की कहानी के पीछे सोनम वांगचुक के जीवन को सीधे आधार बताए जाने की पुष्टि नहीं की। आमिर खान की ओर से भी अलग-अलग मौकों पर यही बात सामने आई कि रैंचो का किरदार सोनम वांगचुक की जिंदगी पर आधारित कोई सीधा बायोग्राफिकल चित्रण नहीं था।
एक और महत्वपूर्ण पहलू फिल्म का 2009 का प्रमोशनल कैंपेन है। ‘3 इडियट्स’ उस साल की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल थी और रिलीज से पहले बड़े स्तर पर इसका प्रचार हुआ था। आमिर खान ने भी फिल्म के प्रमोशन के लिए अलग तरह की रणनीति अपनाई थी।
ट्रेलर, प्रेस कॉन्फ्रेंस, इंटरव्यू और फिल्म से जुड़ी प्रचार सामग्री में रैंचो को सोनम वांगचुक पर आधारित किरदार के तौर पर प्रमुखता से पेश किए जाने का कोई व्यापक रिकॉर्ड सामने नहीं आता। अगर फिल्म के निर्माताओं ने शुरुआत से रैंचो को किसी वास्तविक व्यक्ति पर आधारित किरदार के रूप में तैयार किया होता और इसे आधिकारिक रूप से प्रचारित किया होता, तो इसकी चर्चा फिल्म के रिलीज कैंपेन में भी प्रमुखता से दिखाई देने की संभावना थी।
फिल्म की रिलीज के बाद स्थिति धीरे-धीरे बदलती दिखाई देती है। रैंचो के अंतिम रूप यानी फुंसुख वांगडू और सोनम वांगचुक के काम के बीच लोगों ने समानताएं तलाशनी शुरू कीं। करीब 2010 के दौरान ऐसी मीडिया रिपोर्ट्स सामने आने लगीं जिनमें लद्दाख के लोगों द्वारा फिल्म के किरदार और सोनम वांगचुक के बीच समानता महसूस किए जाने की बात कही गई। शुरुआती स्तर पर यह तुलना एक दिलचस्प समानता के रूप में सामने आई।
बाद के वर्षों में यह तुलना और मजबूत होती चली गई। कई मीडिया रिपोर्ट्स, सोशल मीडिया पोस्ट और परिचयात्मक लेखों में सोनम वांगचुक के नाम के साथ ‘रियल लाइफ रैंचो’ लिखा जाने लगा। यहीं से तुलना और तथ्य के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम होता गया। जो बात शुरुआत में दोनों के काम और सोच में समानता बताने के लिए इस्तेमाल की जा रही थी, वह आगे चलकर इस दावे में बदल गई कि फिल्म का रैंचो सीधे सोनम वांगचुक से प्रेरित था।
सोनम वांगचुक के शिक्षा मॉडल ने इस तुलना को और मजबूत किया। वह लद्दाख में लंबे समय से ऐसी शिक्षा व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं जिसमें बच्चों को केवल किताब और परीक्षा तक सीमित न रखा जाए। व्यावहारिक ज्ञान, स्थानीय परिस्थितियों और प्रयोग के जरिए सीखने पर जोर दिया जाए।
‘3 इडियट्स’ में रैंचो भी शिक्षा व्यवस्था की इसी तरह की कई कमियों पर सवाल करता है। वह मशीन की परिभाषा रटने के बजाय उसे समझने की बात करता है और छात्रों की क्षमता को केवल परीक्षा के अंकों से आंकने का विरोध करता दिखाई देता है। फिल्म के अंतिम हिस्से में बच्चों को प्रयोग के जरिए पढ़ाने वाला स्कूल दिखाए जाने से यह समानता और साफ नजर आती है। इसी वजह से दर्शकों और मीडिया के लिए रैंचो तथा सोनम वांगचुक को जोड़ना स्वाभाविक होता चला गया।
लेकिन समान विचारधारा और कुछ परिस्थितियों का मेल होना किसी किरदार के सीधे तौर पर किसी वास्तविक व्यक्ति पर आधारित होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब फिल्म के लेखक और निर्देशक किरदार की मूल प्रेरणा के लिए किसी दूसरी घटना का जिक्र कर चुके हों। ‘3 इडियट्स’ खुद भी पूरी तरह किसी एक वास्तविक व्यक्ति की जीवनी नहीं थी। फिल्म का मूल आधार चेतन भगत के उपन्यास ‘फाइव पॉइंट समवन’ से जुड़ा था, लेकिन स्क्रीनप्ले के लिए कहानी और किरदारों में कई बदलाव किए गए थे।
रैंचो के चरित्र में भी अलग-अलग विचार, अनुभव और घटनाओं को मिलाकर एक फिल्मी व्यक्तित्व तैयार किया गया। FTII के छात्र से जुड़ी कहानी ने दूसरे व्यक्ति की पहचान पर पढ़ने वाले हिस्से को प्रभावित किया, जबकि शिक्षा व्यवस्था को लेकर फिल्म का व्यापक संदेश कहानी के दूसरे स्रोतों और लेखकों की अपनी सोच से विकसित हुआ।
बहस का एक हिस्सा अब भी इस सवाल के आसपास है कि फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार होने से पहले क्या राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी या फिल्म की टीम के किसी प्रमुख सदस्य का सोनम वांगचुक से कोई संपर्क हुआ था। उपलब्ध सार्वजनिक बयानों में ऐसी मुलाकात की स्पष्ट पुष्टि नहीं मिलती।
इसी तरह यह भी सवाल बना हुआ है कि क्या फिल्म की टीम ने कहानी लिखने के शुरुआती दौर में लद्दाख के उस शिक्षा मॉडल का अध्ययन किया था, जिससे सोनम वांगचुक जुड़े रहे हैं। फिल्म से जुड़े पुराने बयानों में इसे रैंचो की मूल प्रेरणा के रूप में स्थापित करने वाला स्पष्ट दावा सामने नहीं आता।
आमिर खान और सोनम वांगचुक की 2008 की मुलाकात तथा 2007 में स्क्रिप्ट रजिस्ट्रेशन की टाइमलाइन इस दावे को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में रहती है। इससे कम से कम इतना सवाल जरूर उठता है कि रैंचो के मूल किरदार को पूरी तरह सोनम वांगचुक की जिंदगी से निकला हुआ बताना कितना सही है।
फिल्म रिलीज होने के बाद ‘रियल लाइफ रैंचो’ शब्द इतना लोकप्रिय हुआ कि यह सोनम वांगचुक की सार्वजनिक पहचान के साथ जुड़ गया। बाद के वर्षों में शिक्षा, पर्यावरण और लद्दाख से जुड़े उनके अभियानों की खबरों में भी इस विशेषण का इस्तेमाल लगातार होता रहा।
राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी द्वारा बताई गई FTII छात्र की घटना, फिल्म की स्क्रिप्ट की टाइमलाइन और 2009 के प्रमोशनल रिकॉर्ड इस लोकप्रिय धारणा से अलग तस्वीर पेश करते हैं। वहीं रैंचो और सोनम वांगचुक के बीच शिक्षा, इंजीनियरिंग और लद्दाख से जुड़ी समानताएं यह समझाती हैं कि दोनों को जोड़ने वाली धारणा आखिर इतनी मजबूत कैसे होती चली गई।
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सोनम वांगचुक से नहीं बना था ‘3 इडियट्स’ का रैंचो? राजकुमार हिरानी ने बताई थी असली प्रेरणा
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आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्स’ का नाम आते ही रैंचो यानी रणछोड़दास श्यामलदास चांचड़ और फुंसुख वांगडू का किरदार याद आता है। फिल्म रिलीज होने के बाद वर्षों से यह दावा भी दोहराया जाता रहा है कि इस किरदार के पीछे लद्दाख के शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक की कहानी थी। सोशल मीडिया से लेकर कई मीडिया रिपोर्ट्स तक उन्हें ‘रियल लाइफ रैंचो’ कहा जाता रहा।
यह तुलना इतनी बार सामने आई कि धीरे-धीरे बहुत से दर्शकों ने इसे फिल्म से जुड़ा स्थापित तथ्य मान लिया। हालांकि फिल्म के लेखन की टाइमलाइन, इसके लेखक अभिजात जोशी और निर्देशक राजकुमार हिरानी के पुराने बयानों को देखा जाए तो कहानी कुछ अलग दिखाई देती है। रैंचो के मूल किरदार की प्रेरणा को लेकर फिल्म से जुड़े लोगों ने एक दूसरी घटना का जिक्र किया था।
‘3 इडियट्स’ दिसंबर 2009 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। फिल्म में आमिर खान ने ऐसे इंजीनियरिंग छात्र का किरदार निभाया था जो रटकर पढ़ने और केवल अच्छे नंबर हासिल करने वाली शिक्षा व्यवस्था पर लगातार सवाल करता है। उसका मानना था कि पढ़ाई का असली उद्देश्य सीखना और चीजों को समझना होना चाहिए, केवल डिग्री हासिल करना नहीं।
फिल्म की कहानी में आमिर का किरदार शुरुआत में रणछोड़दास श्यामलदास चांचड़ यानी रैंचो के नाम से सामने आता है। बाद में खुलासा होता है कि उसकी वास्तविक पहचान फुंसुख वांगडू है और वह किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था।
कहानी के अंतिम हिस्से में फुंसुख वांगडू को लद्दाख में बच्चों के लिए अलग तरह का स्कूल चलाते दिखाया गया। वहां बच्चे किताबों तक सीमित रहने के बजाय प्रयोग, विज्ञान और व्यावहारिक तरीके से सीखते नजर आते हैं। यहीं से फिल्मी किरदार और सोनम वांगचुक के काम के बीच तुलना सबसे ज्यादा मजबूत हुई।
सोनम वांगचुक भी इंजीनियर और शिक्षा सुधार के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। लद्दाख में शिक्षा के वैकल्पिक मॉडल पर उनके काम को देश और दुनिया में पहचान मिली। शिक्षा को स्थानीय जरूरतों और व्यावहारिक ज्ञान से जोड़ने की उनकी कोशिशों के कारण रैंचो के किरदार से समानताएं तलाशना आसान हो गया।
दोनों नामों ने भी इस धारणा को मजबूत किया। फिल्म में आमिर खान के किरदार का वास्तविक नाम ‘फुंसुख वांगडू’ बताया गया है, जबकि शिक्षा सुधारक का नाम सोनम वांगचुक है। लद्दाख की पृष्ठभूमि, शिक्षा से जुड़ा काम और नाम में सुनाई देने वाली समानता के कारण दोनों को जोड़कर देखा जाने लगा।
लेकिन फिल्म में दिखाई गई रैंचो की पूरी जिंदगी सोनम वांगचुक की वास्तविक जीवन यात्रा से मेल नहीं खाती। रैंचो की मुख्य कहानी इंजीनियरिंग कॉलेज, हॉस्टल, दोस्तों, परीक्षा के दबाव और कॉलेज प्रशासन के साथ उसके वैचारिक टकराव के आसपास घूमती है।
फिल्म में रैंचो एक संपन्न परिवार के बेटे की जगह इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने पहुंचता है। वह डिग्री किसी और के नाम पर हासिल करता है, जबकि उसका असली मकसद पढ़ना और सीखना होता है। यही कहानी फिल्म के केंद्रीय कथानक की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है। इस हिस्से की प्रेरणा को लेकर राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने अलग कहानी बताई थी। पुराने इंटरव्यू में दोनों ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया यानी FTII से जुड़े एक छात्र की घटना का जिक्र किया था।
बताया गया कि उन्हें एक ऐसे युवक की कहानी के बारे में पता चला था जो औपचारिक डिग्री पाने की इच्छा से ज्यादा सीखने में दिलचस्पी रखता था। वह कथित तौर पर किसी दूसरे छात्र की पहचान के सहारे संस्थान में पहुंचा और वहां पढ़ाई से जुड़ गया। इस घटना ने लेखकों को एक ऐसे किरदार की कल्पना की दिशा दी जो डिग्री अपने नाम पर लेने की बजाय ज्ञान हासिल करने को ज्यादा महत्व देता है। ‘3 इडियट्स’ में रैंचो का दूसरे व्यक्ति की पहचान पर कॉलेज में पढ़ना इसी विचार से जोड़ा गया।
यही बिंदु उस लोकप्रिय दावे से अलग है जिसमें पूरे रैंचो या फुंसुख वांगडू को सीधे सोनम वांगचुक की बायोग्राफिकल छवि माना जाता है। फिल्म से जुड़े लोगों के पुराने बयानों में किरदार की मूल अवधारणा के लिए FTII से जुड़ी घटना का उल्लेख मिलता है। फिल्म की स्क्रिप्ट की टाइमलाइन भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ‘3 इडियट्स’ की पटकथा 1 अगस्त 2007 को स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन में रजिस्टर कराई गई थी।
दूसरी ओर, आमिर खान और सोनम वांगचुक की सार्वजनिक मुलाकात से जुड़ा उल्लेख अप्रैल 2008 के आसपास मिलता है। यानी जिस समय दोनों की मुलाकात की बात सामने आती है, उससे पहले फिल्म की स्क्रिप्ट रजिस्टर हो चुकी थी। यही समयक्रम सवाल पैदा करता है कि अगर कहानी और मुख्य किरदार की रूपरेखा 2007 तक तैयार होकर रजिस्टर हो चुकी थी, तो बाद में हुई मुलाकात को उसके मूल निर्माण की प्रेरणा कैसे माना जाए।
हालांकि किसी फिल्म की स्क्रिप्ट रजिस्टर होने के बाद उसमें बदलाव होना असामान्य नहीं है। शूटिंग तक पात्रों, दृश्यों और लोकेशन में बदलाव किए जा सकते हैं। इसलिए केवल स्क्रिप्ट रजिस्ट्रेशन की तारीख से हर संभावित प्रभाव को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
फिर भी किरदार की मूल प्रेरणा के सवाल पर राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी के बयान ज्यादा अहम हो जाते हैं। उन्होंने रैंचो की कहानी के पीछे सोनम वांगचुक के जीवन को सीधे आधार बताए जाने की पुष्टि नहीं की। आमिर खान की ओर से भी अलग-अलग मौकों पर यही बात सामने आई कि रैंचो का किरदार सोनम वांगचुक की जिंदगी पर आधारित कोई सीधा बायोग्राफिकल चित्रण नहीं था।
एक और महत्वपूर्ण पहलू फिल्म का 2009 का प्रमोशनल कैंपेन है। ‘3 इडियट्स’ उस साल की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल थी और रिलीज से पहले बड़े स्तर पर इसका प्रचार हुआ था। आमिर खान ने भी फिल्म के प्रमोशन के लिए अलग तरह की रणनीति अपनाई थी।
ट्रेलर, प्रेस कॉन्फ्रेंस, इंटरव्यू और फिल्म से जुड़ी प्रचार सामग्री में रैंचो को सोनम वांगचुक पर आधारित किरदार के तौर पर प्रमुखता से पेश किए जाने का कोई व्यापक रिकॉर्ड सामने नहीं आता। अगर फिल्म के निर्माताओं ने शुरुआत से रैंचो को किसी वास्तविक व्यक्ति पर आधारित किरदार के रूप में तैयार किया होता और इसे आधिकारिक रूप से प्रचारित किया होता, तो इसकी चर्चा फिल्म के रिलीज कैंपेन में भी प्रमुखता से दिखाई देने की संभावना थी।
फिल्म की रिलीज के बाद स्थिति धीरे-धीरे बदलती दिखाई देती है। रैंचो के अंतिम रूप यानी फुंसुख वांगडू और सोनम वांगचुक के काम के बीच लोगों ने समानताएं तलाशनी शुरू कीं। करीब 2010 के दौरान ऐसी मीडिया रिपोर्ट्स सामने आने लगीं जिनमें लद्दाख के लोगों द्वारा फिल्म के किरदार और सोनम वांगचुक के बीच समानता महसूस किए जाने की बात कही गई। शुरुआती स्तर पर यह तुलना एक दिलचस्प समानता के रूप में सामने आई।
बाद के वर्षों में यह तुलना और मजबूत होती चली गई। कई मीडिया रिपोर्ट्स, सोशल मीडिया पोस्ट और परिचयात्मक लेखों में सोनम वांगचुक के नाम के साथ ‘रियल लाइफ रैंचो’ लिखा जाने लगा। यहीं से तुलना और तथ्य के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम होता गया। जो बात शुरुआत में दोनों के काम और सोच में समानता बताने के लिए इस्तेमाल की जा रही थी, वह आगे चलकर इस दावे में बदल गई कि फिल्म का रैंचो सीधे सोनम वांगचुक से प्रेरित था।
सोनम वांगचुक के शिक्षा मॉडल ने इस तुलना को और मजबूत किया। वह लद्दाख में लंबे समय से ऐसी शिक्षा व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं जिसमें बच्चों को केवल किताब और परीक्षा तक सीमित न रखा जाए। व्यावहारिक ज्ञान, स्थानीय परिस्थितियों और प्रयोग के जरिए सीखने पर जोर दिया जाए।
‘3 इडियट्स’ में रैंचो भी शिक्षा व्यवस्था की इसी तरह की कई कमियों पर सवाल करता है। वह मशीन की परिभाषा रटने के बजाय उसे समझने की बात करता है और छात्रों की क्षमता को केवल परीक्षा के अंकों से आंकने का विरोध करता दिखाई देता है। फिल्म के अंतिम हिस्से में बच्चों को प्रयोग के जरिए पढ़ाने वाला स्कूल दिखाए जाने से यह समानता और साफ नजर आती है। इसी वजह से दर्शकों और मीडिया के लिए रैंचो तथा सोनम वांगचुक को जोड़ना स्वाभाविक होता चला गया।
लेकिन समान विचारधारा और कुछ परिस्थितियों का मेल होना किसी किरदार के सीधे तौर पर किसी वास्तविक व्यक्ति पर आधारित होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब फिल्म के लेखक और निर्देशक किरदार की मूल प्रेरणा के लिए किसी दूसरी घटना का जिक्र कर चुके हों। ‘3 इडियट्स’ खुद भी पूरी तरह किसी एक वास्तविक व्यक्ति की जीवनी नहीं थी। फिल्म का मूल आधार चेतन भगत के उपन्यास ‘फाइव पॉइंट समवन’ से जुड़ा था, लेकिन स्क्रीनप्ले के लिए कहानी और किरदारों में कई बदलाव किए गए थे।
रैंचो के चरित्र में भी अलग-अलग विचार, अनुभव और घटनाओं को मिलाकर एक फिल्मी व्यक्तित्व तैयार किया गया। FTII के छात्र से जुड़ी कहानी ने दूसरे व्यक्ति की पहचान पर पढ़ने वाले हिस्से को प्रभावित किया, जबकि शिक्षा व्यवस्था को लेकर फिल्म का व्यापक संदेश कहानी के दूसरे स्रोतों और लेखकों की अपनी सोच से विकसित हुआ।
बहस का एक हिस्सा अब भी इस सवाल के आसपास है कि फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार होने से पहले क्या राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी या फिल्म की टीम के किसी प्रमुख सदस्य का सोनम वांगचुक से कोई संपर्क हुआ था। उपलब्ध सार्वजनिक बयानों में ऐसी मुलाकात की स्पष्ट पुष्टि नहीं मिलती।
इसी तरह यह भी सवाल बना हुआ है कि क्या फिल्म की टीम ने कहानी लिखने के शुरुआती दौर में लद्दाख के उस शिक्षा मॉडल का अध्ययन किया था, जिससे सोनम वांगचुक जुड़े रहे हैं। फिल्म से जुड़े पुराने बयानों में इसे रैंचो की मूल प्रेरणा के रूप में स्थापित करने वाला स्पष्ट दावा सामने नहीं आता।
आमिर खान और सोनम वांगचुक की 2008 की मुलाकात तथा 2007 में स्क्रिप्ट रजिस्ट्रेशन की टाइमलाइन इस दावे को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में रहती है। इससे कम से कम इतना सवाल जरूर उठता है कि रैंचो के मूल किरदार को पूरी तरह सोनम वांगचुक की जिंदगी से निकला हुआ बताना कितना सही है।
फिल्म रिलीज होने के बाद ‘रियल लाइफ रैंचो’ शब्द इतना लोकप्रिय हुआ कि यह सोनम वांगचुक की सार्वजनिक पहचान के साथ जुड़ गया। बाद के वर्षों में शिक्षा, पर्यावरण और लद्दाख से जुड़े उनके अभियानों की खबरों में भी इस विशेषण का इस्तेमाल लगातार होता रहा।
राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी द्वारा बताई गई FTII छात्र की घटना, फिल्म की स्क्रिप्ट की टाइमलाइन और 2009 के प्रमोशनल रिकॉर्ड इस लोकप्रिय धारणा से अलग तस्वीर पेश करते हैं। वहीं रैंचो और सोनम वांगचुक के बीच शिक्षा, इंजीनियरिंग और लद्दाख से जुड़ी समानताएं यह समझाती हैं कि दोनों को जोड़ने वाली धारणा आखिर इतनी मजबूत कैसे होती चली गई।
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