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स्टेबलकॉइन्स और अनहोस्टेड वॉलेट्स: एएमएल ढांचे के सामने नई चुनौती
Digital Desk
वर्चुअल डिजिटल एसेट सेक्टर में अस्थिरता लंबे समय से लोगों और निवेशकों के लिए चिंता का विषय रहा है। इसी अस्थिरता के बीच स्टेबलकॉइन्स— ऐसे डिजिटल एसेट जिनके मूल्य भारतीय रुपये या अमेरिकी डॉलर जैसी मुद्राओं से जुड़े होते हैं— एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभरे थे ।
कुछ वर्षों में इनका विस्तार खूब बढ़ा है। 2025 के मध्य तक करीब 250 स्टेबलकॉइन्स प्रचलन में थे, जिनका कुल बाजार मूल्य 300 अरब डॉलर से अधिक था और इनका ट्रेडिंग वॉल्यूम बिटकॉइन से भी आगे निकल चुका है ।
स्टेबलकॉइन्स की खासियत सिर्फ कीमत की स्थिरता तक सीमित नहीं है। इनमें अच्छी तरलता होती है, ये अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर आसानी से काम करते हैं और इनके जरिए तेजी से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन किया जा सकता है। साथ ही में ये मूल्य-संचय का कार्य करती है। यही कारण है कि ये व्यक्तिगत, कंपनियों और संस्थानों के लिए एक उपयोगी वित्तीय साधन बन गए हैं। लेकिन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि इन खूबियों के बावजूद इनका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है।
रिपोर्ट का फोकस अनहोस्टेड वॉलेट्स के बीच होने वाले पीयर-टू-पीयर (P2P) लेनदेन पर है। ये ऐसे ट्रांजैक्शन होते हैं जो सीधे दो लोगों के बीच होते हैं, जिनमें कोई रेगुलेटेड एक्सचेंज या सर्विस प्रोवाइडर शामिल नहीं होता। इस वजह से ये लेनदेन एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) ढांचे और आतंकवादी फंडिंग रोकने वाली जांच से बाहर रह जाते हैं। DPRK और ईरान से जुड़े उदाहरण दिखाते हैं कि अपराधी पहले पैसे को स्टेबलकॉइन्स में बदलते हैं—जैसे ट्रोन ब्लॉकचेन पर रुपये को USDT में—और फिर OTC ब्रोकर या P2P प्लेटफॉर्म के जरिए उसे नकद में बदल लेते हैं।
यह समस्या केवल P2P तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में स्टेबलकॉइन के पूरे जीवनचक्र में – जैसे जारी करने, इस्तेमाल और रिडेम्पशन के दौरान– मौजूद कमजोरियों की पहचान की गई है। इन जोखिम को और बढ़ाते हैं अलग-अलग देशों के नियमों में अंतर, ऑफशोर जारीकर्ता, और OTC ब्रोकर या अनौपचारिक नेटवर्क जैसे विकल्प।जब लेनदेन कई ब्लॉकचेन के बीच होता है, तो ट्रैकिंग और भी कठिन हो जाती है।
इन समस्याओं से निपटने के लिए FATF का कहना है कि सभी देशों को वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (VASPs) को सही तरीके से लाइसेंस देना और उनकी निगरानी करना जरूरी है। साथ ही ये नियम पूरे सिस्टम में समान रूप से लागू होने चाहिए। रिपोर्ट यह भी बताती है कि स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के पास कुछ तकनीकी नियंत्रण होते हैं, जैसे किसी ट्रांजैक्शन को रोकना या फ्रीज़ करना। अगर इनका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो ये सुरक्षा बढ़ाने में मदद हो सकती है।
खास तौर पर P2P लेनदेन और अनहोस्टेड वॉलेट्स पर FATF देशों को सलाह देता है कि वे ये आकलन करें कि गतिविधियां कितनी आम हैं और इनसे किस स्तर का जोखिम जुड़ा है, और तदनुसार उपयुक्त नियम लागू करें।सिंगापुर और जर्मनी जैसे देशों ने इस दिशा में सख्त निगरानी व्यवस्था अपनाई है—जिसमें पहचान सत्यापन, ब्लॉकचेन विश्लेषण, लेनदेन की सीमा तय करना और लगातार निगरानी शामिल है। FATF का मानना है कि बेहतर तकनीक, सख्त निगरानी और सरकार व निजी क्षेत्र के बीच सहयोग से ही इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।
भारत भी इस दिशा में कुछ हद तक तैयार नजर आता है। फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU- IND) के जरिए वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर VASPs पहले से निगरानी में हैं और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयास भी जारी हैं। लेकिन कुछ कमियां अभी भी बरकरार हैं। खासकर P2P लेनदेन से जुड़े जोखिमों को मौजूदा और आने वाले नियमों में संबोधित शामिल करना जरूरी है, क्योंकि ये पारंपरिक निगरानी के बाहर हैं। इन कमियों को दूर करना एक मजबूत और स्पष्ट नियामक ढांचे बनाने के लिए जरूरी होगा। साथ ही, सरकार और निजी प्लेटफॉर्म्स के बीच लगातार सहयोग भी बेहद अहम रहेगा, ताकि स्टेबलकॉइन्स और पूरे क्रिप्टो इकोसिस्टम से जुड़े जोखिमों को बेहतर तरीके से संभाला जा सके।
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स्टेबलकॉइन्स और अनहोस्टेड वॉलेट्स: एएमएल ढांचे के सामने नई चुनौती
Digital Desk
कुछ वर्षों में इनका विस्तार खूब बढ़ा है। 2025 के मध्य तक करीब 250 स्टेबलकॉइन्स प्रचलन में थे, जिनका कुल बाजार मूल्य 300 अरब डॉलर से अधिक था और इनका ट्रेडिंग वॉल्यूम बिटकॉइन से भी आगे निकल चुका है ।
स्टेबलकॉइन्स की खासियत सिर्फ कीमत की स्थिरता तक सीमित नहीं है। इनमें अच्छी तरलता होती है, ये अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर आसानी से काम करते हैं और इनके जरिए तेजी से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन किया जा सकता है। साथ ही में ये मूल्य-संचय का कार्य करती है। यही कारण है कि ये व्यक्तिगत, कंपनियों और संस्थानों के लिए एक उपयोगी वित्तीय साधन बन गए हैं। लेकिन फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि इन खूबियों के बावजूद इनका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है।
रिपोर्ट का फोकस अनहोस्टेड वॉलेट्स के बीच होने वाले पीयर-टू-पीयर (P2P) लेनदेन पर है। ये ऐसे ट्रांजैक्शन होते हैं जो सीधे दो लोगों के बीच होते हैं, जिनमें कोई रेगुलेटेड एक्सचेंज या सर्विस प्रोवाइडर शामिल नहीं होता। इस वजह से ये लेनदेन एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) ढांचे और आतंकवादी फंडिंग रोकने वाली जांच से बाहर रह जाते हैं। DPRK और ईरान से जुड़े उदाहरण दिखाते हैं कि अपराधी पहले पैसे को स्टेबलकॉइन्स में बदलते हैं—जैसे ट्रोन ब्लॉकचेन पर रुपये को USDT में—और फिर OTC ब्रोकर या P2P प्लेटफॉर्म के जरिए उसे नकद में बदल लेते हैं।
यह समस्या केवल P2P तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में स्टेबलकॉइन के पूरे जीवनचक्र में – जैसे जारी करने, इस्तेमाल और रिडेम्पशन के दौरान– मौजूद कमजोरियों की पहचान की गई है। इन जोखिम को और बढ़ाते हैं अलग-अलग देशों के नियमों में अंतर, ऑफशोर जारीकर्ता, और OTC ब्रोकर या अनौपचारिक नेटवर्क जैसे विकल्प।जब लेनदेन कई ब्लॉकचेन के बीच होता है, तो ट्रैकिंग और भी कठिन हो जाती है।
इन समस्याओं से निपटने के लिए FATF का कहना है कि सभी देशों को वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर्स (VASPs) को सही तरीके से लाइसेंस देना और उनकी निगरानी करना जरूरी है। साथ ही ये नियम पूरे सिस्टम में समान रूप से लागू होने चाहिए। रिपोर्ट यह भी बताती है कि स्टेबलकॉइन जारी करने वाली कंपनियों के पास कुछ तकनीकी नियंत्रण होते हैं, जैसे किसी ट्रांजैक्शन को रोकना या फ्रीज़ करना। अगर इनका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो ये सुरक्षा बढ़ाने में मदद हो सकती है।
खास तौर पर P2P लेनदेन और अनहोस्टेड वॉलेट्स पर FATF देशों को सलाह देता है कि वे ये आकलन करें कि गतिविधियां कितनी आम हैं और इनसे किस स्तर का जोखिम जुड़ा है, और तदनुसार उपयुक्त नियम लागू करें।सिंगापुर और जर्मनी जैसे देशों ने इस दिशा में सख्त निगरानी व्यवस्था अपनाई है—जिसमें पहचान सत्यापन, ब्लॉकचेन विश्लेषण, लेनदेन की सीमा तय करना और लगातार निगरानी शामिल है। FATF का मानना है कि बेहतर तकनीक, सख्त निगरानी और सरकार व निजी क्षेत्र के बीच सहयोग से ही इन जोखिमों को कम किया जा सकता है।
भारत भी इस दिशा में कुछ हद तक तैयार नजर आता है। फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU- IND) के जरिए वर्चुअल एसेट सर्विस प्रोवाइडर VASPs पहले से निगरानी में हैं और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के प्रयास भी जारी हैं। लेकिन कुछ कमियां अभी भी बरकरार हैं। खासकर P2P लेनदेन से जुड़े जोखिमों को मौजूदा और आने वाले नियमों में संबोधित शामिल करना जरूरी है, क्योंकि ये पारंपरिक निगरानी के बाहर हैं। इन कमियों को दूर करना एक मजबूत और स्पष्ट नियामक ढांचे बनाने के लिए जरूरी होगा। साथ ही, सरकार और निजी प्लेटफॉर्म्स के बीच लगातार सहयोग भी बेहद अहम रहेगा, ताकि स्टेबलकॉइन्स और पूरे क्रिप्टो इकोसिस्टम से जुड़े जोखिमों को बेहतर तरीके से संभाला जा सके।
