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डॉ. एमएल सोनी के रुद्राभिषेक से दतिया में गूंजा शिव नाम, सावन सोमवार पर ओंकारेश्वर रूप की अनूठी पूजा
दतिया, MP
सावन माह के पहले सोमवार को दतिया स्थित ऐतिहासिक श्री नागेश्वर महादेव मंदिर में शिवभक्तों का उत्साह, आस्था और अध्यात्म का संगम देखने को मिला। मंदिर परिसर सुबह से ही "हर-हर महादेव" के जयघोष से गूंज उठा, जब श्रद्धालुओं की भीड़ भगवान शिव का रुद्राभिषेक देखने पहुँची।
डॉ. एम.एल. सोनी द्वारा रुद्राभिषेक की पौराणिक विधि
प्रातःकालीन बेला में डॉ. एम एल सोनी (भोपाल) द्वारा पूरे वैदिक विधान से रुद्राभिषेक संपन्न किया गया। गाय के दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, बेलफल, अक्षत, पुष्प और धतूरा आदि से भगवान शिव का पूजन कर ‘ॐ नमः शिवाय’ की गूंज के बीच एक दिव्य वातावरण का निर्माण हुआ। डॉ. सोनी ने शास्त्रीय परंपराओं का आदर करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र एवं रुद्रसूक्त से महादेव की आराधना की।
मिट्टी से गढ़े शिव परिवार के जीवंत स्वरूप
श्री नागेश्वर महादेव मंदिर की खास बात यह है कि यहां श्रावण मास में प्रतिदिन शिव परिवार की मूर्तियां मिट्टी से निर्मित की जाती हैं। भोलेनाथ के साथ—गणेशजी, कार्तिकेय, माता पार्वती और नंदी की सुंदर मिट्टी प्रतिमाओं का निर्माण कर उन्हें विधिपूर्वक पूजित किया जाता है। मिट्टी की सादगी और भक्ति की भव्यता के इस संगम ने श्रद्धालुओं को आत्मिक सुख की अनुभूति कराई।

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खंडवा के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृति की पूजा
इस सोमवार की विशेषता यह रही कि मंदिर परिसर में प्राचीन ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की हूबहू आकृति बनाई गई और उसका पूजन शास्त्रोक्त ढंग से किया गया। पूजन के दौरान पुजारियों ने ओंकारेश्वर के इतिहास का जीवंत वर्णन किया, जिससे श्रद्धालु मानो मध्यकालीन भारत की सांस्कृतिक यात्रा पर निकल पड़े।

ओंकारेश्वर: इतिहास के झरोखे से
ओंकारेश्वर का इतिहास बताता है कि यह क्षेत्र धार के परमारों, ग्वालियर के सिंधियाओं और मालवा के सुल्तानों के अधीन रहा। 1894 में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन में आया। इस दौरान आदिवासी भील सरदार नथ्थू भील का स्थानीय अधिपत्य रहा, जिसे चुनौती देने हेतु जयपुर नरेश ने अपने भाई भरतसिंह चौहान को भेजा। संघर्ष का अंत तब हुआ जब भरतसिंह का विवाह नथ्थू भील की पुत्री से हुआ। इससे एक नया सांस्कृतिक-सामाजिक समावेश जन्मा, जिसके वंशज भिलाला राजपूत कहलाए और जिनका ओंकारेश्वर पर शासन वर्षों तक चला। ब्रिटिश काल में इन्हें राव के रूप में जाना गया।
श्री नागेश्वर महादेव मंदिर: आस्था का अखंड दीप
दतिया रेलवे स्टेशन से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित श्री नागेश्वर महादेव मंदिर न केवल दतिया की धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह स्थान शिवभक्तों के लिए एक जीवंत तीर्थ भी बन गया है। सावन में यहाँ प्रतिदिन अलग-अलग ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृति बनाकर पूजन किया जाता है। मिट्टी के माध्यम से शिव महिमा को साकार करने की यह परंपरा श्रद्धा, कला और भक्ति का दुर्लभ संगम है।
डॉ. एम एल सोनी: धर्म, विज्ञान और श्रद्धा के सेतु
भोपाल निवासी डॉ. एम एल सोनी न केवल क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि वे शिवभक्ति की पारंपरिक विधियों में भी पारंगत हैं। उनका संयोजन—आधुनिक चेतना और प्राचीन श्रद्धा—एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। वे प्रतिवर्ष सावन में दतिया आकर भगवान नागेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक करते हैं, जिससे भक्तों में विशेष आकर्षण बना रहता है।
हर सोमवार एक नई ज्योतिर्लिंग प्रतिकृति, एक नई भक्ति अनुभूति
सावन के पावन महीने में दतिया का श्री नागेश्वर मंदिर एक तरह से पूरे भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों की साक्षात झलक बन चुका है। हर दिन एक नया स्वरूप, एक नई पूजा विधि, और हर दिन एक नई श्रद्धा से यह स्थान 'सावन महोत्सव' का जीवंत केंद्र बन गया है।
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डॉ. एमएल सोनी के रुद्राभिषेक से दतिया में गूंजा शिव नाम, सावन सोमवार पर ओंकारेश्वर रूप की अनूठी पूजा
दतिया, MP
डॉ. एम.एल. सोनी द्वारा रुद्राभिषेक की पौराणिक विधि
प्रातःकालीन बेला में डॉ. एम एल सोनी (भोपाल) द्वारा पूरे वैदिक विधान से रुद्राभिषेक संपन्न किया गया। गाय के दूध, दही, शुद्ध देसी घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, बेलफल, अक्षत, पुष्प और धतूरा आदि से भगवान शिव का पूजन कर ‘ॐ नमः शिवाय’ की गूंज के बीच एक दिव्य वातावरण का निर्माण हुआ। डॉ. सोनी ने शास्त्रीय परंपराओं का आदर करते हुए शिव पंचाक्षरी मंत्र एवं रुद्रसूक्त से महादेव की आराधना की।
मिट्टी से गढ़े शिव परिवार के जीवंत स्वरूप
श्री नागेश्वर महादेव मंदिर की खास बात यह है कि यहां श्रावण मास में प्रतिदिन शिव परिवार की मूर्तियां मिट्टी से निर्मित की जाती हैं। भोलेनाथ के साथ—गणेशजी, कार्तिकेय, माता पार्वती और नंदी की सुंदर मिट्टी प्रतिमाओं का निर्माण कर उन्हें विधिपूर्वक पूजित किया जाता है। मिट्टी की सादगी और भक्ति की भव्यता के इस संगम ने श्रद्धालुओं को आत्मिक सुख की अनुभूति कराई।

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खंडवा के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृति की पूजा
इस सोमवार की विशेषता यह रही कि मंदिर परिसर में प्राचीन ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की हूबहू आकृति बनाई गई और उसका पूजन शास्त्रोक्त ढंग से किया गया। पूजन के दौरान पुजारियों ने ओंकारेश्वर के इतिहास का जीवंत वर्णन किया, जिससे श्रद्धालु मानो मध्यकालीन भारत की सांस्कृतिक यात्रा पर निकल पड़े।

ओंकारेश्वर: इतिहास के झरोखे से
ओंकारेश्वर का इतिहास बताता है कि यह क्षेत्र धार के परमारों, ग्वालियर के सिंधियाओं और मालवा के सुल्तानों के अधीन रहा। 1894 में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन में आया। इस दौरान आदिवासी भील सरदार नथ्थू भील का स्थानीय अधिपत्य रहा, जिसे चुनौती देने हेतु जयपुर नरेश ने अपने भाई भरतसिंह चौहान को भेजा। संघर्ष का अंत तब हुआ जब भरतसिंह का विवाह नथ्थू भील की पुत्री से हुआ। इससे एक नया सांस्कृतिक-सामाजिक समावेश जन्मा, जिसके वंशज भिलाला राजपूत कहलाए और जिनका ओंकारेश्वर पर शासन वर्षों तक चला। ब्रिटिश काल में इन्हें राव के रूप में जाना गया।
श्री नागेश्वर महादेव मंदिर: आस्था का अखंड दीप
दतिया रेलवे स्टेशन से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित श्री नागेश्वर महादेव मंदिर न केवल दतिया की धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह स्थान शिवभक्तों के लिए एक जीवंत तीर्थ भी बन गया है। सावन में यहाँ प्रतिदिन अलग-अलग ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृति बनाकर पूजन किया जाता है। मिट्टी के माध्यम से शिव महिमा को साकार करने की यह परंपरा श्रद्धा, कला और भक्ति का दुर्लभ संगम है।
डॉ. एम एल सोनी: धर्म, विज्ञान और श्रद्धा के सेतु
भोपाल निवासी डॉ. एम एल सोनी न केवल क्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि वे शिवभक्ति की पारंपरिक विधियों में भी पारंगत हैं। उनका संयोजन—आधुनिक चेतना और प्राचीन श्रद्धा—एक अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। वे प्रतिवर्ष सावन में दतिया आकर भगवान नागेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक करते हैं, जिससे भक्तों में विशेष आकर्षण बना रहता है।
हर सोमवार एक नई ज्योतिर्लिंग प्रतिकृति, एक नई भक्ति अनुभूति
सावन के पावन महीने में दतिया का श्री नागेश्वर मंदिर एक तरह से पूरे भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों की साक्षात झलक बन चुका है। हर दिन एक नया स्वरूप, एक नई पूजा विधि, और हर दिन एक नई श्रद्धा से यह स्थान 'सावन महोत्सव' का जीवंत केंद्र बन गया है।
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