ग्रामीण प्रतिभाओं को साइकिलों के रूप में मिला सम्मान, अवादा फाउंडेशन ने 176 छात्रों को दी नई उड़ान

मऊ (उत्तर प्रदेश)

दूरदराज़ के गाँवों से स्कूल तक रोज़ पैदल सफर करने वाले छात्र-छात्राओं के चेहरों पर सोमवार को एक नई चमक देखने को मिली। कारण था — अवादा फाउंडेशन की वह प्रेरणादायक पहल, जिसके अंतर्गत 105 गांवों के 36 सरकारी स्कूलों के 176 मेधावी बच्चों को निःशुल्क साइकिलें वितरित की गईं।

शहर से दूर, इन गाँवों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ये 56 छात्र और 120 छात्राएँ — आज खुद को किसी बड़े बदलाव का हिस्सा मानते हैं। यह बदलाव सिर्फ एक साइकिल से नहीं आया, बल्कि उन संवेदनाओं से आया है, जो बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उन्हें सामाजिक दूरी से मुक्त करने का कार्य कर रही हैं।


शिक्षा को साधन नहीं, संबल बनाने की कोशिश

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के ऊर्जा मंत्री  ए.के. शर्मा ने बतौर मुख्य अतिथि भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा:

“जब गाँव के होनहार बच्चों को समाज का सहयोग मिलता है, तब समावेशी विकास केवल विचार नहीं, व्यवहार बनता है। अवादा जैसी संस्थाएं इस बदलाव की बुनियाद रख रही हैं।”

छात्रों के चेहरों पर जो मुस्कान थी, वह सिर्फ नई साइकिल की खुशी नहीं थी — वह उस सामाजिक मान्यता की भी अभिव्यक्ति थी, जो इन बच्चों को पहली बार मंच पर खड़ा देख रही थी।


संघर्ष की पगडंडियों से सपनों के राजपथ तक

इन बच्चों में से कई ऐसे थे, जो प्रतिदिन 5 से 7 किलोमीटर तक पैदल स्कूल जाते हैं। ग्रामीण पगडंडियों, बारिश और धूप — हर चुनौती को पार कर वे पढ़ाई तक पहुँचते हैं। साइकिल उनके लिए केवल यात्रा का साधन नहीं, उनके आत्मसम्मान की पहली गूंज है।

अवादा ग्रुप के चेयरमैन  विनीत मित्तल ने कहा:

“हम चाहते हैं कि हर बच्चा अपने सपनों तक आसानी से पहुँच सके। यह साइकिल केवल लोहे का एक ढांचा नहीं, बल्कि उस यात्रा की चाबी है, जो उन्हें अपने जीवन के लक्ष्य तक लेकर जाएगी।”

अवादा फाउंडेशन की डायरेक्टर  ऋतु पटवारी के शब्दों में,

“इन साइकिलों में रफ्तार ही नहीं, सम्मान भी है। ये बच्चों के हौसले की पहली सवारी है।”

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अवादा फाउंडेशन: जहां CSR सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं, संवेदना है

अवादा फाउंडेशन भारत के 20 राज्यों में शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर सक्रिय है। अकेले शिक्षा के क्षेत्र में अब तक 3 लाख से अधिक छात्रों को निःशुल्क ट्यूशन, डिजिटल साक्षरता, कंप्यूटर कोचिंग और मूलभूत विद्यालयीय सुविधाएँ प्रदान की जा चुकी हैं।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए गए गाँवोंजयापुर और नागेपुर में पिछले 8 वर्षों से शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में निरंतर कार्य

  • सोनभद्र के दूरस्थ आदिवासी इलाकों में साइकिल, टैबलेट, कंप्यूटर वितरण, खेल, कोचिंग, सिलाई केंद्र और पेयजल सुविधा

  • मथुरा के 3 जर्जर स्कूलों का नवीनीकरण, जहाँ अब स्पोकन इंग्लिश और कंप्यूटर कक्षाएं भी चल रही हैं

इन पहलों के ज़रिए फाउंडेशन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में वह सुधार ला रहा है, जो विकास की मुख्यधारा से कटे लोगों को जोड़ता है।

 

इन साइकिलों की आवाज़ दूर तक जाएगी — गाँव की गलियों से लेकर शहर की सड़कों तक। और हर बार जब कोई बच्चा इस साइकिल पर स्कूल जाएगा, वह यह साबित करेगा कि शिक्षा की राह में कोई दूरी नहीं बड़ी होती — अगर समाज साथ चले।

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www.dainikjagranmpcg.com
30 Jun 2025 By दैनिक जागरण

ग्रामीण प्रतिभाओं को साइकिलों के रूप में मिला सम्मान, अवादा फाउंडेशन ने 176 छात्रों को दी नई उड़ान

मऊ (उत्तर प्रदेश)

शहर से दूर, इन गाँवों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ये 56 छात्र और 120 छात्राएँ — आज खुद को किसी बड़े बदलाव का हिस्सा मानते हैं। यह बदलाव सिर्फ एक साइकिल से नहीं आया, बल्कि उन संवेदनाओं से आया है, जो बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उन्हें सामाजिक दूरी से मुक्त करने का कार्य कर रही हैं।


शिक्षा को साधन नहीं, संबल बनाने की कोशिश

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश सरकार के ऊर्जा मंत्री  ए.के. शर्मा ने बतौर मुख्य अतिथि भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा:

“जब गाँव के होनहार बच्चों को समाज का सहयोग मिलता है, तब समावेशी विकास केवल विचार नहीं, व्यवहार बनता है। अवादा जैसी संस्थाएं इस बदलाव की बुनियाद रख रही हैं।”

छात्रों के चेहरों पर जो मुस्कान थी, वह सिर्फ नई साइकिल की खुशी नहीं थी — वह उस सामाजिक मान्यता की भी अभिव्यक्ति थी, जो इन बच्चों को पहली बार मंच पर खड़ा देख रही थी।


संघर्ष की पगडंडियों से सपनों के राजपथ तक

इन बच्चों में से कई ऐसे थे, जो प्रतिदिन 5 से 7 किलोमीटर तक पैदल स्कूल जाते हैं। ग्रामीण पगडंडियों, बारिश और धूप — हर चुनौती को पार कर वे पढ़ाई तक पहुँचते हैं। साइकिल उनके लिए केवल यात्रा का साधन नहीं, उनके आत्मसम्मान की पहली गूंज है।

अवादा ग्रुप के चेयरमैन  विनीत मित्तल ने कहा:

“हम चाहते हैं कि हर बच्चा अपने सपनों तक आसानी से पहुँच सके। यह साइकिल केवल लोहे का एक ढांचा नहीं, बल्कि उस यात्रा की चाबी है, जो उन्हें अपने जीवन के लक्ष्य तक लेकर जाएगी।”

अवादा फाउंडेशन की डायरेक्टर  ऋतु पटवारी के शब्दों में,

“इन साइकिलों में रफ्तार ही नहीं, सम्मान भी है। ये बच्चों के हौसले की पहली सवारी है।”

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अवादा फाउंडेशन भारत के 20 राज्यों में शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर सक्रिय है। अकेले शिक्षा के क्षेत्र में अब तक 3 लाख से अधिक छात्रों को निःशुल्क ट्यूशन, डिजिटल साक्षरता, कंप्यूटर कोचिंग और मूलभूत विद्यालयीय सुविधाएँ प्रदान की जा चुकी हैं।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए गए गाँवोंजयापुर और नागेपुर में पिछले 8 वर्षों से शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में निरंतर कार्य

  • सोनभद्र के दूरस्थ आदिवासी इलाकों में साइकिल, टैबलेट, कंप्यूटर वितरण, खेल, कोचिंग, सिलाई केंद्र और पेयजल सुविधा

  • मथुरा के 3 जर्जर स्कूलों का नवीनीकरण, जहाँ अब स्पोकन इंग्लिश और कंप्यूटर कक्षाएं भी चल रही हैं

इन पहलों के ज़रिए फाउंडेशन ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में वह सुधार ला रहा है, जो विकास की मुख्यधारा से कटे लोगों को जोड़ता है।

 

इन साइकिलों की आवाज़ दूर तक जाएगी — गाँव की गलियों से लेकर शहर की सड़कों तक। और हर बार जब कोई बच्चा इस साइकिल पर स्कूल जाएगा, वह यह साबित करेगा कि शिक्षा की राह में कोई दूरी नहीं बड़ी होती — अगर समाज साथ चले।

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