वेनेजुएला के 65 अरब बैरल तेल पर अमेरिका का बड़ा दांव, ट्रंप ने बताया ‘इतिहास की सबसे बड़ी डील’

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नए समझौते में अमेरिका को संयुक्त उपक्रम का 55% प्रभावी नियंत्रण मिलेगा; करीब 100 अरब डॉलर के निजी निवेश और वेनेजुएला के लिए 209 अरब डॉलर से ज्यादा टैक्स आय का अनुमान

अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तेल को लेकर हुआ नया समझौता वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि समझौते के तहत अमेरिका को वेनेजुएला के 65 अरब बैरल से ज्यादा प्रमाणित तेल भंडार पर बहुमत नियंत्रण मिलेगा। ट्रंप ने इसे “दुनिया की सबसे बड़ी तेल डील” बताया है। यह समझौता सीधे तौर पर वेनेजुएला का पूरा तेल भंडार अमेरिका को सौंपने वाला सौदा नहीं बताया गया है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, अमेरिकी सरकार एक निजी ऑपरेटर के साथ मिलकर नया संयुक्त उपक्रम बनाएगी, जिसे वेनेजुएला के 17 तेल क्षेत्रों को विकसित करने के अधिकार मिलेंगे। अमेरिकी हिस्सेदारी और तेल खरीद के अधिकारों को मिलाकर उसे नए उपक्रम के 55% प्रभावी आउटपुट पर नियंत्रण मिलने की बात कही गई है।

65 अरब बैरल का आंकड़ा इतना बड़ा क्यों?

वेनेजुएला के जिन क्षेत्रों को इस समझौते के तहत विकसित किया जाना है, उनमें कुल मिलाकर 65 अरब बैरल से ज्यादा प्रमाणित तेल भंडार बताया गया है। यह मात्रा वेनेजुएला के कुल प्रमाणित भंडार का करीब पांचवां हिस्सा है। अमेरिकी सरकारी आंकड़ों के अनुसार वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, जो 300 अरब बैरल से थोड़ा अधिक है। भारत के संदर्भ में देखें तो यह आंकड़ा और बड़ा नजर आता है। भारत की कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। यदि सालाना आयात को करीब 1.6-1.7 अरब बैरल के स्तर पर माना जाए, तो 65 अरब बैरल मात्रा लगभग चार दशकों के आयात के बराबर बैठती है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि यह पूरा तेल तुरंत बाजार में उपलब्ध हो जाएगा। वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों को विकसित करने, उत्पादन बढ़ाने और पुरानी बुनियादी संरचना को सुधारने में काफी समय और निवेश की जरूरत होगी।

अमेरिका को मिलेगा 55% प्रभावी हिस्सा

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, नए संयुक्त उपक्रम में अमेरिका को करीब 55% प्रभावी आउटपुट मिलेगा। इसमें कंपनी में हिस्सेदारी के साथ-साथ लागत मूल्य पर तेल खरीदने के अधिकार भी शामिल हैं। समझौते के तहत वेनेजुएला की अंतरिम सरकार ने संबंधित तेल क्षेत्रों के विकास के लिए लंबे समय की व्यवस्था की है। एक अमेरिकी अधिकारी ने इसे 100 साल तक के अधिकारों वाली व्यवस्था बताया है। अभी जिस निजी कंपनी को इस व्यवस्था में अमेरिकी सरकार का साझेदार बनाया जाएगा, उसका नाम आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया है। कुछ रिपोर्टों में वेनेजुएला में सक्रिय निजी ऊर्जा कंपनियों का जिक्र हुआ है, लेकिन किसी एक कंपनी को इस समझौते का निश्चित साझेदार बताना अभी जल्दबाजी होगी।

करीब 100 अरब डॉलर के निवेश की तैयारी

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि समझौते के जरिए वेनेजुएला के तेल उद्योग में करीब 100 अरब डॉलर का निजी निवेश आ सकता है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इससे तेल उत्पादन बढ़ेगा, हजारों नौकरियां पैदा होंगी और वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने में मदद मिलेगी। वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने भी समझौते को ऐतिहासिक बताया है। उनकी सरकार का अनुमान है कि तेल क्षेत्रों के विकास से वेनेजुएला को आने वाले समय में 209 अरब डॉलर से ज्यादा टैक्स राजस्व मिल सकता है।

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ट्रंप का दावा- अमेरिका की तेल आपूर्ति बढ़ेगी

ट्रंप ने समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि इससे अमेरिकी तेल भंडार में बड़ा इजाफा होगा और देश में ईंधन की कीमतें नीचे लाने में मदद मिलेगी। उन्होंने इसे अमेरिकी करदाताओं पर बिना अतिरिक्त लागत वाला समझौता बताया है। हालांकि, वेनेजुएला से उत्पादन तुरंत बढ़ना आसान नहीं होगा। देश का तेल उद्योग लंबे समय से कम निवेश, पुरानी आधारभूत संरचना और प्रतिबंधों जैसी समस्याओं से जूझता रहा है। इसके अलावा वेनेजुएला का अधिकांश कच्चा तेल भारी और ज्यादा सल्फर वाला है, जिसके उत्पादन और रिफाइनिंग के लिए विशेष व्यवस्था की जरूरत पड़ती है।

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अमेरिका के लिए वेनेजुएला क्यों अहम है?

वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार होने के बावजूद उसका उत्पादन उसकी क्षमता के मुकाबले काफी कम रहा है। कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियां पिछले वर्षों में देश से बाहर निकल गई थीं, जबकि अमेरिकी प्रतिबंधों ने भी निवेश और उत्पादन को प्रभावित किया। अब ट्रंप प्रशासन निजी कंपनियों को दोबारा वेनेजुएला के ऊर्जा क्षेत्र में लाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका के लिए यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति को लेकर दबाव बना हुआ है। ट्रंप प्रशासन अमेरिकी ईंधन कीमतों को कम करने के साथ-साथ देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने पर जोर दे रहा है। रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व में गिरावट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी अस्थिरता ने भी वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार को अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है।

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क्या तुरंत बढ़ेगा तेल उत्पादन?

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि 65 अरब बैरल के भंडार को वास्तविक उत्पादन में बदलने में कितना समय लगेगा। वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में नई तकनीक, पाइपलाइन, रिफाइनिंग क्षमता, बिजली व्यवस्था और बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की जरूरत है। इसलिए समझौते की घोषणा और वास्तविक उत्पादन बढ़ने के बीच लंबा अंतर हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी इस वजह से अमेरिकी ईंधन कीमतों पर तत्काल बड़े असर को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है।

भारत के लिए इसका क्या मतलब?

भारत दुनिया के बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है, इसलिए वैश्विक तेल आपूर्ति में होने वाला कोई बड़ा बदलाव भारतीय बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि आने वाले वर्षों में वेनेजुएला का उत्पादन वास्तव में बढ़ता है और अतिरिक्त कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में आता है, तो इससे वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने की संभावना बाजार की कुल मांग, उत्पादन और अन्य देशों की आपूर्ति पर निर्भर करेगी। हालांकि भारत को इस समझौते से सीधे तौर पर वेनेजुएला का तेल मिलने की गारंटी नहीं है। भारत की तेल खरीदारी में कीमत, गुणवत्ता, रिफाइनरी की क्षमता, भुगतान व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए 65 अरब बैरल के भंडार को भारत की भविष्य की तेल जरूरत से सीधे जोड़ना केवल एक तुलनात्मक गणना होगी, तत्काल आपूर्ति का संकेत नहीं।

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