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निफ्टी50 वैल्यू 20 में बड़ा बदलाव, वैल्यू निवेश को मिला नया आधार
Digital Desk
वैल्यू इन्वेस्टिंग एक सरल विचार पर आधारित है। बाजार जिस चीज को इस समय पसंद कर रहा है, उसके लिएअधिक कीमत चुकाने के बजाय ऐसी कंपनियों की तलाश की जाती है, जिनके शेयर उनके मुनाफे, परिसंपत्तियों याबिक्री के मुकाबले अपेक्षाकृत कम वैल्यूएशन पर कारोबार कर रहे हों। इसका आधार यह धारणा है कि समय केसाथ शेयर की कीमत और वास्तविक मूल्य एक-दूसरे के करीब आते हैं।
हाल के वर्षों में इंडेक्स फंड औरएक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) के विस्तार के साथ वैल्यू निवेश का यह तरीका पैसिव निवेश के जरिए भी उपलब्ध होगया है। अब यह केवल सामान्य मार्केट-कैप आधारित बेंचमार्क तक सीमित नहीं है, बल्कि नियम-आधारित स्ट्रैटेजीइंडेक्स तक भी फैल चुका है।
निफ्टी50 वैल्यू 20 ऐसा ही एक इंडेक्स है। यह निफ्टी 50 में शामिल कंपनियों में से वैल्यूएशन के आधार पर 20 कंपनियों का चयन करता है और भारत की सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में वैल्यू सेगमेंट में निवेश का अवसर देता है।जून 2026 में NSE ने इस इंडेक्स के निर्माण की प्रक्रिया में बदलाव किया। ये बदलाव इतने महत्वपूर्ण हैं कि इसइंडेक्स पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इसमें क्या बदला है।
मैकेनिज्म पर आने से पहले यह समझना जरूरी है कि निफ्टी 50 के भीतर वैल्यू स्क्रीन क्या करती है। इसकी शुरुआतभारत की सबसे बड़ी और सबसे अधिक लिक्विड कंपनियों के समूह से होती है, जहां व्यापक बाजार की तुलना मेंकारोबार का पैमाना, लिक्विडिटी और स्थापित बिजनेस फ्रेंचाइजी आमतौर पर मजबूत होती हैं। हालांकि, लार्ज-कैपकंपनियां भी अपने कारोबारी और वैल्यूएशन से जुड़े जोखिमों से मुक्त नहीं होतीं। इसलिए यह स्क्रीन जरूरी नहीं किमुश्किलों से जूझ रहे कारोबारों की तलाश करती हो; बल्कि यह स्थापित कंपनियों में से कीमत और वैल्यूएशन केआधार पर चयन करती है।
अब बात बदलावों की। NSE की जून की अधिसूचना के अनुसार, पहला बड़ा बदलाव मानकीकृत मल्टी-फैक्टरस्कोरिंग है। पहले की पद्धति में रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE), प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E), प्राइस-टू-बुक(P/B) और डिविडेंड यील्ड का इस्तेमाल किया जाता था, जिन्हें क्रमशः 40%, 30%, 20% और 10% का वेटेजदिया गया था। संशोधित पद्धति में इनकी जगह चार वैल्यूएशन मापदंड रखे गए हैं—अर्निंग्स-टू-प्राइस, सेल्स-टू-प्राइस, बुक-वैल्यू-टू-प्राइस और डिविडेंड यील्ड। अब इन चारों को समान रूप से 25%-25% वेटेज दियाजाएगा।
दूसरा बदलाव NSE के अन्य वैल्यू इंडेक्स, जिसमें निफ्टी200 वैल्यू 30 भी शामिल है, की पद्धति के साथ अधिकसामंजस्य लाता है। निफ्टी200 वैल्यू 30 भी इन्हीं चार अनुपातों और वैल्यू-स्कोर आधारित झुकाव का इस्तेमालकरता है। तीसरा बदलाव टिल्ट वेटिंग की शुरुआत है। अब केवल फ्री-फ्लोट वेटिंग पर निर्भर रहने के बजाय ऐसीव्यवस्था होगी, जिसमें कंपनी के फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन को उसके वैल्यू स्कोर से गुणा किया जाएगा।संशोधन के तहत वैल्यू स्कोर के आधार पर अनिवार्य रूप से शामिल की जाने वाली कंपनियों की संख्या भी पांच सेबढ़ाकर 10 कर दी गई है। साथ ही, समीक्षा और रीबैलेंसिंग का चक्र बढ़ाकर साल में दो बार—जून और दिसंबर—कर दिया गया है।
चुने गए चारों मापदंड कंपनी की वित्तीय स्थिति के अलग-अलग पहलुओं को कवर करते हैं—मुनाफा, राजस्व, बैलेंसशीट और शेयरधारकों को लौटाई गई नकदी। इनमें से हर एक मापदंड अपने आप में अपूर्ण है। एकमुश्त मदों केकारण कमाई प्रभावित हो सकती है, कुछ एसेट-लाइट कंपनियों के लिए बुक वैल्यू ज्यादा मायने नहीं रखती, बिक्रीमें लाभप्रदता का पता नहीं चलता और शेयर की कीमत गिरने के कारण डिविडेंड यील्ड केवल अधिक दिखाई देसकती है। इन चारों का इस्तेमाल किसी एक अनुपात की तुलना में वैल्यूएशन का व्यापक आकलन देता है। समान25% वेटेज को इस रूप में देखना बेहतर है कि यह एक डिजाइन विकल्प है। इसका मतलब यह नहीं है कि चारोंसंकेतक सभी सेक्टर और बाजार चक्रों में समान रूप से भविष्यवाणी करने में सक्षम हैं।
कंपनी का आकार अब भी महत्वपूर्ण है। बहुत बड़ी कंपनी अपेक्षाकृत मामूली वैल्यू स्कोर के बावजूद इंडेक्स मेंमहत्वपूर्ण वेट रख सकती है। हालांकि, वैल्यू स्कोर अंतिम वेटिंग को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है। एकलशेयर पर 15% की सीमा, जिसे साल में दो बार लागू किया जाएगा, किसी एक कंपनी को इंडेक्स पर हावी होने सेरोकती है।
दो सावधानियां महत्वपूर्ण हैं। पहली, वैल्यूएशन स्कोरिंग पूरे निफ्टी 50 पर की जाती है, सेक्टर के भीतर नहीं। साथही, किसी सेक्टर के लिए कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है। ऐसे में संरचनात्मक रूप से सस्ता सेक्टर इंडेक्स मेंअधिक वेट हासिल कर सकता है। वित्तीय क्षेत्र इसका एक उदाहरण हो सकता है, क्योंकि वहां बुक वैल्यू अधिकप्रासंगिक होती है। चार मापदंडों का इस्तेमाल इस प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करता है, लेकिन निवेशकों कोकुछ सेक्टर झुकाव की उम्मीद रखनी चाहिए।
दूसरी सावधानी यह है कि ROCE को चयन प्रक्रिया से हटा दिया गया है। इसलिए यह अब वैल्यू इंडेक्स है, नकि वैल्यू-प्लस-क्वालिटी इंडेक्स। निफ्टी 50 का यूनिवर्स कंपनियों के आकार और लिक्विडिटी के लिए एक फिल्टरजरूर देता है, लेकिन यह वैल्यू ट्रैप के जोखिम को खत्म नहीं करता। बड़ी कंपनी के मुनाफे में गिरावट आ सकती है, पूंजी का खराब आवंटन हो सकता है या उसके उद्योग में कोई संरचनात्मक बदलाव आ सकता है।
कुल मिलाकर, यह संशोधन इंडेक्स के लिए वैल्यू की परिभाषा को व्यापक बनाता है और इसे NSE के अन्य वैल्यूइंडेक्स की निर्माण पद्धति के अधिक अनुरूप करता है। निवेशकों के लिए व्यावहारिक बदलाव यह है कि अब चयनऔर वेटिंग दोनों ही व्यापक वैल्यूएशन संकेतकों पर आधारित होंगे और इन्हें साल में एक बार के बजाय दो बारअपडेट किया जाएगा। इस रणनीति का आकलन पूरे बाजार चक्र में करना अधिक उचित होगा, क्योंकिफैक्टर-आधारित निवेश रणनीतियां अक्सर लंबे चरणों में प्रदर्शन करती हैं। इसलिए इसके प्रदर्शन को परखने केलिए पांच साल या उससे अधिक की निवेश अवधि अधिक उपयुक्त मानी जानी चाहिए।
– चिंतन हरिया, प्रिंसिपल – इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एएमसी
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