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कॉकरोच तो गंदगी फैलाता है, भारतीय युवा तो राष्ट्रीय चेतना का संवाहक
नीलेश वर्मा
हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे लोगों पर कठोर टिप्पणी की, जो कथित रूप से फर्जी डिग्रियों, निरर्थक याचिकाओं और सोशल मीडिया आधारित अराजक सक्रियता के माध्यम से संस्थाओं पर निरंतर हमले करते हैं। उनके वक्तव्य के एक हिस्से को “कॉकरोच” शब्द के साथ व्यापक रूप से प्रचारित किया गया, जिसके बाद यह धारणा बनाई गई कि उन्होंने भारतीय युवाओं का “कॉकरोच” कहकर अपमान किया है। बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी देश के युवाओं के लिए नहीं थी, बल्कि उन “परजीवी तत्वों” के लिए थी जो व्यवस्था का दुरुपयोग कर समाज में अविश्वास और अव्यवस्था फैलाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय युवा विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति और प्रेरणा हैं। इसके विपरीत कॉकरोच अंधेरे और गंदगी में पनपता है, जबकि भारतीय युवा तो चेतना, ऊर्जा और निर्माण का प्रतीक होता है। राष्ट्र विरोधी ताकतों के षड्यंत्र में न फसकर भारत का युवा वर्ग सही दिशा में आगे बढ़े तो वह केवल अपने जीवन ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है। इसलिए राष्ट्रहित के विपरीत भारतीय युवाओं को नकारात्मकता, अफवाह और संस्थागत अविश्वास का माध्यम बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछना और जवाब मांगना बहुत जरूरी है। सूचना का अधिकार, मीडिया और सामाजिक सक्रियता लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। लेकिन जब यही सक्रियता जिम्मेदारी और तथ्यों से हटकर संस्थाओं को बदनाम करने या गलत माहौल बनाने का साधन बन जाए, तो वह रचनात्मक आलोचना नहीं रहती, बल्कि अराजकता की ओर बढ़ने लगती है। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का भी मूल भाव यही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ संस्थागत मर्यादा और जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
आज भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति वाला देश है। यह शक्ति केवल संख्या नहीं, बल्कि परिवर्तन की क्षमता है। पिछले कुछ वर्षों में शासन की अनेक नीतियों ने युवाओं को नई दिशा देने का कार्य किया है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया और राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं को अवसर, तकनीक और आत्मविश्वास प्रदान किया है। आज भारतीय युवा नौकरी खोजने तक सीमित नहीं है, वह रोजगार सृजन, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का भी केंद्र बन चुका है। केंद्र सरकार की सकारात्मक नीतियों का प्रभाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों और कस्बों से निकलने वाले युवा आज डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्टार्टअप, कृषि नवाचार, रक्षा तकनीक और खेल जगत में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यह वही पीढ़ी है जो “लोकल से ग्लोबल” की अवधारणा को वास्तविकता में बदल रही है। ऐसे समय में युवाओं को निराशा और नकारात्मक विमर्श में उलझाना राष्ट्र की ऊर्जा को कमजोर करना होगा।
सोशल मीडिया के दौर में आधी-अधूरी सूचनाएँ, भ्रामक प्रचार और उत्तेजक कथन अत्यंत तेजी से फैलते हैं, जिससे युवा वर्ग कई बार भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और भ्रम का शिकार हो जाता है। हाल ही में “कॉकरोज जनता पार्टी” जैसे उपहासपूर्ण और गैर-गंभीर राजनीतिक प्रयोग भी सामने आए हैं, क्योंकि लोकतंत्र जागरूकता, मर्यादा और जिम्मेदारी से चलता है, केवल सनसनी और वायरल प्रवृत्तियों से नहीं। विशेष रूप से भारत के जेन-जी को चाहिए कि वह किसी भी विचार, अभियान या संगठन को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय तथ्यों, विवेक और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर परख कर निर्णय लें। भारतीय युवा का इतिहास संघर्ष, अनुशासन और राष्ट्र निर्माण का रहा है तथा स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विज्ञान, सेना, खेल और तकनीक तक हर क्षेत्र में युवाओं ने देश को नई दिशा दी है। विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सबसे बड़ी भूमिका युवा शक्ति की ही होगी, इसलिए युवाओं को केवल विरोध नहीं, बल्कि भागीदारी, समाधान और सकारात्मक राष्ट्र निर्माण की सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

भारतीय युवा कॉकरोच नहीं है जो गंदगी फैलाए, वह राष्ट्रीय चेतना का संवाहक है जो समाज को दिशा देता है। वह अंधकार में पनपने वाली मानसिकता का प्रतीक नहीं, बल्कि नए भारत की ऊर्जा, आत्मविश्वास और जागरण का प्रतीक है। यदि यह युवा सोशल मीडिया और एआई के झूठ और भ्रामक प्रचार में न फंसकर सकारात्मकता, जिम्मेदारी और राष्ट्रहित को अपना मार्ग बना ले, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक और लोकतांत्रिक नेतृत्व का भी वैश्विक उदाहरण बन सकता है।
- लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।
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कॉकरोच तो गंदगी फैलाता है, भारतीय युवा तो राष्ट्रीय चेतना का संवाहक
नीलेश वर्मा
हाल ही में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। अदालत की कार्यवाही के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे लोगों पर कठोर टिप्पणी की, जो कथित रूप से फर्जी डिग्रियों, निरर्थक याचिकाओं और सोशल मीडिया आधारित अराजक सक्रियता के माध्यम से संस्थाओं पर निरंतर हमले करते हैं। उनके वक्तव्य के एक हिस्से को “कॉकरोच” शब्द के साथ व्यापक रूप से प्रचारित किया गया, जिसके बाद यह धारणा बनाई गई कि उन्होंने भारतीय युवाओं का “कॉकरोच” कहकर अपमान किया है। बाद में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी देश के युवाओं के लिए नहीं थी, बल्कि उन “परजीवी तत्वों” के लिए थी जो व्यवस्था का दुरुपयोग कर समाज में अविश्वास और अव्यवस्था फैलाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय युवा विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति और प्रेरणा हैं। इसके विपरीत कॉकरोच अंधेरे और गंदगी में पनपता है, जबकि भारतीय युवा तो चेतना, ऊर्जा और निर्माण का प्रतीक होता है। राष्ट्र विरोधी ताकतों के षड्यंत्र में न फसकर भारत का युवा वर्ग सही दिशा में आगे बढ़े तो वह केवल अपने जीवन ही नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है। इसलिए राष्ट्रहित के विपरीत भारतीय युवाओं को नकारात्मकता, अफवाह और संस्थागत अविश्वास का माध्यम बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
लोकतंत्र में प्रश्न पूछना और जवाब मांगना बहुत जरूरी है। सूचना का अधिकार, मीडिया और सामाजिक सक्रियता लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। लेकिन जब यही सक्रियता जिम्मेदारी और तथ्यों से हटकर संस्थाओं को बदनाम करने या गलत माहौल बनाने का साधन बन जाए, तो वह रचनात्मक आलोचना नहीं रहती, बल्कि अराजकता की ओर बढ़ने लगती है। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का भी मूल भाव यही है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ संस्थागत मर्यादा और जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
आज भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति वाला देश है। यह शक्ति केवल संख्या नहीं, बल्कि परिवर्तन की क्षमता है। पिछले कुछ वर्षों में शासन की अनेक नीतियों ने युवाओं को नई दिशा देने का कार्य किया है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया और राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं को अवसर, तकनीक और आत्मविश्वास प्रदान किया है। आज भारतीय युवा नौकरी खोजने तक सीमित नहीं है, वह रोजगार सृजन, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का भी केंद्र बन चुका है। केंद्र सरकार की सकारात्मक नीतियों का प्रभाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा। छोटे शहरों और कस्बों से निकलने वाले युवा आज डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्टार्टअप, कृषि नवाचार, रक्षा तकनीक और खेल जगत में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यह वही पीढ़ी है जो “लोकल से ग्लोबल” की अवधारणा को वास्तविकता में बदल रही है। ऐसे समय में युवाओं को निराशा और नकारात्मक विमर्श में उलझाना राष्ट्र की ऊर्जा को कमजोर करना होगा।
सोशल मीडिया के दौर में आधी-अधूरी सूचनाएँ, भ्रामक प्रचार और उत्तेजक कथन अत्यंत तेजी से फैलते हैं, जिससे युवा वर्ग कई बार भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और भ्रम का शिकार हो जाता है। हाल ही में “कॉकरोज जनता पार्टी” जैसे उपहासपूर्ण और गैर-गंभीर राजनीतिक प्रयोग भी सामने आए हैं, क्योंकि लोकतंत्र जागरूकता, मर्यादा और जिम्मेदारी से चलता है, केवल सनसनी और वायरल प्रवृत्तियों से नहीं। विशेष रूप से भारत के जेन-जी को चाहिए कि वह किसी भी विचार, अभियान या संगठन को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय तथ्यों, विवेक और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर परख कर निर्णय लें। भारतीय युवा का इतिहास संघर्ष, अनुशासन और राष्ट्र निर्माण का रहा है तथा स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विज्ञान, सेना, खेल और तकनीक तक हर क्षेत्र में युवाओं ने देश को नई दिशा दी है। विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सबसे बड़ी भूमिका युवा शक्ति की ही होगी, इसलिए युवाओं को केवल विरोध नहीं, बल्कि भागीदारी, समाधान और सकारात्मक राष्ट्र निर्माण की सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

भारतीय युवा कॉकरोच नहीं है जो गंदगी फैलाए, वह राष्ट्रीय चेतना का संवाहक है जो समाज को दिशा देता है। वह अंधकार में पनपने वाली मानसिकता का प्रतीक नहीं, बल्कि नए भारत की ऊर्जा, आत्मविश्वास और जागरण का प्रतीक है। यदि यह युवा सोशल मीडिया और एआई के झूठ और भ्रामक प्रचार में न फंसकर सकारात्मकता, जिम्मेदारी और राष्ट्रहित को अपना मार्ग बना ले, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक और लोकतांत्रिक नेतृत्व का भी वैश्विक उदाहरण बन सकता है।
- लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।
