प्रयागराज में चल रहे ऐतिहासिक माघ मेले के दौरान गंगा पंडाल में आयोजित सांस्कृतिक संध्याओं ने श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों को विशेष रूप से आकर्षित किया। संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में प्रतिदिन हो रहे इन कार्यक्रमों की श्रृंखला में प्रसिद्ध भजन गायक राजीव आचार्य की प्रस्तुति ने श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।
राजीव आचार्य के भजनों को सुनने के लिए मेला क्षेत्र में बड़ी संख्या में श्रोता उमड़े। दूर-दराज़ से आए श्रद्धालु गंगा पंडाल में घंटों पहले से मौजूद रहे। जैसे ही मंच से भक्ति संगीत की शुरुआत हुई, पूरा वातावरण राममय हो गया। ‘हे मेरे राम’, ‘पधारे फिर से मेरे राम’, ‘चलो फिर से अयोध्या नगरिया’, ‘माधो माधो मन का मान त्यागो’ और ‘प्रेम गीत तेरा हर दिल में जल रहा है’ जैसे लोकप्रिय भजनों पर श्रोताओं की भावनाएं स्वतः ही झलकने लगीं।
कार्यक्रम के दौरान ‘अवध के दुलारे राम सुनो’ और ‘धर्म ध्वजा मेरे साथ थाम लो’ जैसे ऊर्जावान भजनों ने श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया। गंगा पंडाल तालियों और जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने भक्ति रस में डूबकर न सिर्फ संगीत का आनंद लिया, बल्कि उसे अपनी आस्था से भी जोड़ा।
राजीव आचार्य की खासियत यह रही कि उनके भजन केवल संगीत तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक संदेश भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। उनके कई भजन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पहले से ही लोकप्रिय हैं, जिसके चलते युवा वर्ग की भी उल्लेखनीय उपस्थिति देखने को मिली।
कार्यक्रम के दौरान बातचीत में राजीव आचार्य ने कहा कि श्रोताओं द्वारा उनके भजनों को मिल रहा प्रेम और सम्मान उनके लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि भक्ति संगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा है और युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे आधुनिकता के साथ-साथ अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें।
संस्कृति विभाग के अधिकारियों के अनुसार, माघ मेले में इस प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्देश्य न केवल मनोरंजन करना है, बल्कि भारतीय लोक परंपराओं, भक्ति संगीत और सांस्कृतिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना भी है। गंगा तट पर आयोजित ये संध्याएं श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक अनुभव का केंद्र बन रही हैं।
कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों द्वारा राजीव आचार्य और उनकी पूरी टीम के कलाकारों को सम्मानित किया गया। दर्शकों ने खड़े होकर तालियों के साथ कलाकारों का अभिनंदन किया। माघ मेले की इस संगीतमय संध्या ने यह साबित कर दिया कि भक्ति संगीत आज भी लोगों के दिलों को जोड़ने और संस्कृति से जोड़ने की अपार शक्ति रखता है।
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