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विश्व आईवीएफ दिवस पर गाजियाबाद में जागरूकता कार्यक्रम: बांझपन से मातृत्व तक की यात्रा पर विशेषज्ञों ने दिए सुझाव
Jagran Desk
गाजियाबाद के इंदिरापुरम में शुक्रवार को ‘विश्व आईवीएफ दिवस’ के मौके पर एक विशेष परिवर्तनकारी वेलनेस कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
“टेकिंग यू फ्रॉम मेबी टू बेबी” नामक इस आयोजन को गुंजन आईवीएफ वर्ल्ड द्वारा आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य प्रजनन से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे दम्पतियों को मानसिक, शारीरिक और वैज्ञानिक स्तर पर संपूर्ण जानकारी और मार्गदर्शन देना था।
कार्यक्रम की शुरुआत गुंजन आईवीएफ वर्ल्ड की एमडी और संस्थापक डॉ. गुंजन गुप्ता के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने बताया कि यह पहल उन दम्पतियों के लिए है जो आईवीएफ की प्रक्रिया को लेकर भ्रम में हैं या संकोच में जी रहे हैं। डॉ. गुंजन ने कहा, “हमारा प्रयास है कि हम लोगों को न केवल जानकारी दें, बल्कि उन्हें ऐसा आत्मबल भी दें जिससे वे निश्चय से मातृत्व या पितृत्व की ओर बढ़ सकें।”
इस कार्यक्रम में चार प्रमुख पहलुओं को केंद्र में रखा गया—शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, आत्म-देखभाल और आईवीएफ विज्ञान।
योग से शुरू हुआ सकारात्मक बदलाव का संदेश
पहले सत्र में अंतरराष्ट्रीय योग एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञ आइरिस वत्राना ने बांझपन पर योग के प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने कुछ विशेष योगासन भी बताए जो हार्मोन संतुलन बनाने, तनाव घटाने और प्रजनन क्षमता को सुधारने में मददगार हो सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर रहा खास जोर
दूसरे सत्र में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. मंदिरा अधिकारी ने बताया कि आईवीएफ की प्रक्रिया के दौरान मानसिक तनाव सबसे बड़ा अवरोध बन सकता है। उन्होंने प्रजनन यात्रा को शांतिपूर्वक जीने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव साझा किए।
आत्म-देखभाल और महिला सशक्तिकरण पर चर्चा
तीसरे सत्र में वेलनेस एक्सपर्ट और इन्फ्लुएंसर अंशु धवन ने आत्म-देखभाल की जरूरत और मातृत्व के प्रति महिलाओं की मानसिकता को बदलने पर जोर दिया।
आईवीएफ से जुड़े मिथकों पर विशेषज्ञ की राय
अंत में डॉ. गुंजन गुप्ता ने आईवीएफ से जुड़े तीन सामान्य मिथकों—आईवीएफ की उम्र सीमा, बांझपन की जिम्मेदारी और क्लीनिक की गुणवत्ता—पर तथ्यात्मक जानकारी दी। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि न तो आईवीएफ हर उम्र में संभव होता है, न ही बांझपन केवल महिलाओं की समस्या है और न ही हर आईवीएफ क्लिनिक एक जैसा होता है।
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