सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल SIR पर अहम सुनवाई, CM ममता बनर्जी कोर्ट में मौजूद

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नाम सुधार से जुड़े नोटिस वापस लेने की मांग, ममता बोलीं– न्याय नहीं मिला तो लोकतंत्र ही खतरे में

सुप्रीम कोर्ट में आज पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। इस सुनवाई में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं अपने वकीलों के साथ कोर्ट रूम नंबर-1 में मौजूद रहीं। मामला मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नामों की जांच, सुधार और संभावित डिलीशन से जुड़ा है, जिसे लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि SIR के तहत केवल नाम या स्पेलिंग की मामूली गड़बड़ी के आधार पर लाखों मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं, जिससे वास्तविक मतदाताओं के बाहर होने का खतरा पैदा हो गया है।

राज्य सरकार की मांग है कि ऐसे सभी नोटिस वापस लिए जाएं, जो केवल नाम के बेमेल या स्थानीय भाषा से जुड़ी त्रुटियों पर आधारित हैं। दीवान ने कोर्ट को बताया कि करीब 70 लाख मामलों में समस्या केवल स्पेलिंग या टाइटल परिवर्तन की है, जबकि कुल 1.4 करोड़ से अधिक लोगों को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए नोटिस दिए गए हैं।

इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सभी नोटिस वापस लेना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन यह जरूरी है कि मतदाताओं को यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि उनके नाम किन कारणों से फ्लैग किए गए हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि स्थानीय भाषा, बंगाली से अंग्रेजी अनुवाद और AI आधारित मैपिंग के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिन्हित हो सकते हैं।

सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीठ से अनुमति लेकर स्वयं अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वे उसी राज्य से आती हैं और जमीनी हकीकत को समझती हैं। ममता ने कहा, “जब न्याय नहीं मिलता और सब कुछ खत्म होता दिखता है, तब लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद महिलाओं के सरनेम बदलने, गरीब परिवारों के स्थानांतरण और स्थानीय उच्चारण के कारण नामों में अंतर को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ मानना गलत है।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि नोटिस में कारण दर्ज हैं और अधिकृत प्रतिनिधियों के जरिए भी सूचना दी जा रही है। हालांकि कोर्ट ने समय-सीमा को लेकर चिंता जताई और स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया पहले ही तय कार्यक्रम में चल रही है, जिसे लंबा करना संभव नहीं है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब 2026 में पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR को लेकर यह सुनवाई न केवल मतदाता अधिकारों, बल्कि चुनावी पारदर्शिता और संघीय संतुलन के लिहाज से भी अहम साबित हो सकती है। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह ऐसा समाधान तलाशेगा, जिससे कोई भी वास्तविक मतदाता प्रक्रिया से बाहर न हो।

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04 Feb 2026 By Nitin Trivedi

सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल SIR पर अहम सुनवाई, CM ममता बनर्जी कोर्ट में मौजूद

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सुप्रीम कोर्ट में आज पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। इस सुनवाई में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं अपने वकीलों के साथ कोर्ट रूम नंबर-1 में मौजूद रहीं। मामला मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नामों की जांच, सुधार और संभावित डिलीशन से जुड़ा है, जिसे लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलील दी कि SIR के तहत केवल नाम या स्पेलिंग की मामूली गड़बड़ी के आधार पर लाखों मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं, जिससे वास्तविक मतदाताओं के बाहर होने का खतरा पैदा हो गया है।

राज्य सरकार की मांग है कि ऐसे सभी नोटिस वापस लिए जाएं, जो केवल नाम के बेमेल या स्थानीय भाषा से जुड़ी त्रुटियों पर आधारित हैं। दीवान ने कोर्ट को बताया कि करीब 70 लाख मामलों में समस्या केवल स्पेलिंग या टाइटल परिवर्तन की है, जबकि कुल 1.4 करोड़ से अधिक लोगों को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए नोटिस दिए गए हैं।

इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सभी नोटिस वापस लेना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन यह जरूरी है कि मतदाताओं को यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि उनके नाम किन कारणों से फ्लैग किए गए हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि स्थानीय भाषा, बंगाली से अंग्रेजी अनुवाद और AI आधारित मैपिंग के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिन्हित हो सकते हैं।

सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीठ से अनुमति लेकर स्वयं अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वे उसी राज्य से आती हैं और जमीनी हकीकत को समझती हैं। ममता ने कहा, “जब न्याय नहीं मिलता और सब कुछ खत्म होता दिखता है, तब लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद महिलाओं के सरनेम बदलने, गरीब परिवारों के स्थानांतरण और स्थानीय उच्चारण के कारण नामों में अंतर को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ मानना गलत है।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि नोटिस में कारण दर्ज हैं और अधिकृत प्रतिनिधियों के जरिए भी सूचना दी जा रही है। हालांकि कोर्ट ने समय-सीमा को लेकर चिंता जताई और स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया पहले ही तय कार्यक्रम में चल रही है, जिसे लंबा करना संभव नहीं है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब 2026 में पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR को लेकर यह सुनवाई न केवल मतदाता अधिकारों, बल्कि चुनावी पारदर्शिता और संघीय संतुलन के लिहाज से भी अहम साबित हो सकती है। कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह ऐसा समाधान तलाशेगा, जिससे कोई भी वास्तविक मतदाता प्रक्रिया से बाहर न हो।

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