भीषण गर्मी की मार: भारत को है अब 'सिस्टेमिक इंश्योरेंस' की दरकार

– राकेश जैन, सीईओ, इंडसइंड जनरल इंश्योरेंस

जब भीषण गर्मी के कारण किसी दिहाड़ी मजदूर को अस्पताल का रुख करना पड़ता है, तो उससे होने वाली आर्थिक चोट अक्सर उस बीमारी से भी ज़्यादा लंबी खिंच जाती है। सिर्फ एक दिन काम पर न जा पाने की कीमत पूरे परिवार की महीने भर की कमाई का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा खत्म करके चुकाना पड़ता है। इसके बावजूद, भारत में इस तरह के बड़े नुकसान की भरपाई के लिए कोई बीमा सुरक्षा (इंश्योरेंस) उपलब्ध नहीं है।

अब जब हम मई 2026 के दौर से गुज़र रहे हैं, तो भीषण गर्मी (हीटवेव) कोई कभी-कभार आने वाली मुसीबत नहीं रह गई है। यह एक ऐसे स्थायी आर्थिक खतरे का रूप ले रही है जो न केवल आम परिवारों की आमदनी को खोखला कर रहा है, बल्कि अब बीमा कंपनियों के खातों (बैलेंस शीट) पर भी भारी पड़ने लगा है।

यह खतरा कितना बड़ा है, यह अब साफ दिखने लगा है। भारत में 2025 के शुरुआती नौ महीनों में खराब मौसम के कारण 4,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई, जो पिछले चार सालों की तुलना में लगभग 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। 2025 का फरवरी का महीना पिछले 124 सालों में सबसे गर्म रहा, जबकि राजस्थान के कुछ हिस्सों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया। और मौजूदा दौर की बात करें, तो भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि इस बार की गर्मी देश के बड़े हिस्से में सामान्य से ज़्यादा और लंबे समय तक चलने वाली होगी।

मौत के आंकड़ों में छिपा गर्मी का प्रकोप

फिर भी, ये आंकड़े असली असर को पूरी तरह नहीं दिखाते। गर्मी शायद ही कभी मौत की सीधी वजह के रूप में सामने आती है। यह अक्सर हार्ट अटैक, किडनी फेल होने या सांस लेने में दिक्कत जैसी बीमारियों के रूप में सामने आती है, जिससे मौत के आंकड़ों में इसका असली रोल छिप जाता है। 'एनवायरनमेंट इंटरनेशनल' में छपे एक अध्ययन के मुताबिक, भीषण गर्मी वाले दिनों में रोज़ होने वाली मौतों में 14.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाती है। इसके कारण भारत के बड़े शहरों में हर साल 1,100 से ज़्यादा अतिरिक्त मौतें होती हैं। यानी असली नुकसान सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा बड़ा है।

अगर इंसानी जान के नुकसान को पूरी तरह नहीं दिखाया जा रहा, तो आर्थिक नुकसान को तो झुठलाया ही नहीं जा सकता। 'द लैंसेट काउंटडाउन' के अनुमान के मुताबिक, सिर्फ 2024 में भीषण गर्मी की वजह से भारत ने काम के 247 अरब घंटे खो दिए, जो प्रति व्यक्ति लगभग 420 घंटे के बराबर है। इससे करीब 194 अरब डॉलर की कमाई का नुकसान हुआ, जो देश की जीडीपी का लगभग 5 प्रतिशत है। इसका सबसे ज़्यादा (करीब दो-तिहाई) असर खेती पर पड़ा, जिसके बाद कंस्ट्रक्शन (भवन निर्माण) और शहरों के अनौपचारिक (मजदूरी वाले) क्षेत्र प्रभावित हुए।

हीटवेव - सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान पहुँचाने वाला खतरा

एक ऐसे देश के लिए जहाँ लगभग 75 प्रतिशत कामकाजी लोग गर्मी में काम करते हैं और 2030 तक 3.4 करोड़ (34 मिलियन) नौकरियों पर खतरा है, यह कोई भविष्य की बात नहीं है। यह आज का आर्थिक संकट है। इस दशक के अंत तक, गर्मी भी बाढ़ और चक्रवात (तूफान) की तरह भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान पहुँचाने वाला खतरा बन सकती है।

घरेलू स्तर पर हीटवेव धीरे-धीरे लेकिन लगातार आर्थिक झटका देती है। दोपहर की भीषण गर्मी के कारण यदि किसी निर्माण मजदूर को काम रोकना पड़े, तो उसकी एक दिन की मजदूरी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खत्म हो सकता है। इसी तरह, सड़क किनारे सामान बेचने वाले छोटे दुकानदारों को भी कई घंटों तक दुकान बंद रखनी पड़ती है, जिससे उनकी पहले से ही सीमित कमाई और घट जाती है। करोड़ों असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए हीटवेव केवल स्वास्थ्य का खतरा नहीं है, बल्कि उनकी रोज़ की आय पर सीधा असर डालने वाला संकट है। ये ऐसी आपदाएं नहीं हैं जो सुर्खियां बनती हों, लेकिन इनसे होने वाला लगातार आर्थिक नुकसान परिवारों की वित्तीय मजबूती को धीरे-धीरे कमजोर करता रहता है।

यहीं पर बीमा सुरक्षा की बड़ी कमी साफ दिखाई देती है। भारत में जलवायु परिवर्तन से होने वाले लगभग 93 प्रतिशत आर्थिक नुकसान का कोई बीमा नहीं है। हीटवेव के मामले में यह अंतर और भी अधिक है, क्योंकि इससे होने वाला नुकसान कई रूपों में और अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। इलाज का कुछ खर्च बीमा से कवर हो सकता है, लेकिन आय में होने वाला नुकसान, जो कुल आर्थिक क्षति का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, अब भी बीमा के दायरे से बाहर है।

बीमा कंपनियों को मिल रहे शुरुआती संकेत

साथ ही, बीमा उद्योग में इसके संकेत भी दिखने लगे हैं। स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के अनुसार, गर्मियों के सबसे अधिक गर्म महीनों में हीट स्ट्रेस से जुड़ी बीमारियों, जैसे डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी), इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, किडनी संबंधी समस्याएं और हृदय संबंधी घटनाओं के दावों (क्लेम) में मौसमी तौर पर 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। यह कोई अस्थायी स्थिति नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रहे ऐसे जोखिम के शुरुआती संकेत हैं, जिन्हें अब बीमा उद्योग नजरअंदाज नहीं कर सकता।

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि हीटवेव का जोखिम है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या बीमा उद्योग इस जोखिम से निपटने के लिए तैयार है।

इसके लिए बीमा क्षेत्र को अपनी सोच और कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव करने होंगे। बीमा उत्पादों में हीटवेव से होने वाली बीमारियों को स्पष्ट रूप से शामिल करना होगा और आपात स्थिति में बिना किसी परेशानी के कैशलेस इलाज की सुविधा सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, बीमा जोखिम का आकलन (अंडरराइटिंग) इस तरह किया जाना चाहिए कि अलग-अलग क्षेत्रों और व्यवसायों के जोखिम को सही ढंग से समझा जा सके। उदाहरण के लिए, पश्चिमी और मध्य भारत में काम करने वाले श्रमिकों का जोखिम ठंडे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की तुलना में कहीं अधिक है।

हेल्थ इंश्योरेंस और नए समाधानों की ज़रूरत

हेल्थ इंश्योरेंस इसमें एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। उसे गर्मी के कारण अस्पताल में भर्ती होने, ओपीडी (बिना भर्ती हुए इलाज) और इमरजेंसी सपोर्ट के दायरे को बढ़ाना चाहिए, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बिना किसी आर्थिक तनाव के तुरंत इलाज मिल सके।

इसी के साथ, 'पैरामेट्रिक इंश्योरेंस' (Parametric Insurance - तापमान आधारित बीमा) को बड़े पैमाने पर शुरू करना बेहद ज़रूरी है। इस मॉडल में, जैसे ही तापमान या गर्मी एक तय सीमा को पार करती है, वैसे ही तुरंत पैसा (क्लेम) मिल जाता हैइसमें क्लेम पास कराने की लंबी और जटिल प्रक्रिया की ज़रूरत नहीं होती। अनौपचारिक मजदूरों और छोटे कारोबारियों के लिए, समय पर मिलने वाली छोटी सी रकम भी उनकी कमाई को टूटने से बचा सकती है और उन्हें मजबूरी में कर्ज़ लेने से रोक सकती है। इन योजनाओं को कंपनियों, गिग प्लेटफॉर्म्स (जैसे डिलीवरी या राइड-शेयरिंग ऐप्स) और सरकारी स्कीमों के ज़रिए लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। जलवायु से जुड़े बीमा के शुरुआती प्रयोगों (पायलट्स) ने इस संभावना को साबित भी किया है।

आगे की राह और चुनौती

अब सरकारी नीतियों में भी बदलाव दिख रहा है। राज्यों में 'हीट एक्शन प्लान' (गर्मी से निपटने की योजनाएं) बढ़ाए जा रहे हैं और सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों को तैयार किया जा रहा है। लेकिन सिर्फ बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) उस आर्थिक झटके को नहीं झेल सकता, जो पहले से ही हर साल अरबों डॉलर का हो रहा है। बीमा क्षेत्र के पास इस संकट में आगे आने की क्षमता भी है और ज़िम्मेदारी भी।

यहाँ दांव पर सिर्फ आम परिवार ही नहीं लगे हैं। लगातार पड़ने वाली भीषण गर्मी का असर मजदूरों की काम करने की क्षमता (प्रोडक्टिविटी), सप्लाई चेन, बाज़ार में मांग और आखिरकार पूरे देश की आर्थिक तरक्की पर पड़ेगा। समय के साथ, यह देश की जीडीपी (GDP) की रफ्तार को धीमा कर सकता है।

अब वक़्त है बदलाव का

बीमा कंपनियों के लिए यह बदलाव का एक साफ मोड़ है। जलवायु का खतरा अब कोई भविष्य की बात नहीं है; यह आज ही बीमा के कारोबार को बदल रहा है। जो कंपनियाँ इसका जल्द समाधान ढूंढेंगी, वे न केवल जोखिम का बेहतर प्रबंधन करेंगी, बल्कि इनोवेशन और ग्रोथ के नए रास्ते भी खोलेंगी।

आने वाले दशक में गर्मी, भारत के आर्थिक परिदृश्य में सबसे बड़े और सबसे कम आंके गए खतरों में से एक बनने जा रही है। इसे नज़रअंदाज़ करना अब कोई विकल्प नहीं है। बीमा क्षेत्र को आपदा आने के बाद कदम उठाने के बजाय, उसके आने से पहले की तैयारी करनी होगी। गर्म होते भारत में, देरी करने की कीमत सिर्फ ज़्यादा क्लेम चुकाना नहीं होगी, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था की आर्थिक मजबूती को धीरे-धीरे खत्म कर देगी।

 

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30 Jun 2026 By दैनिक जागरण

भीषण गर्मी की मार: भारत को है अब 'सिस्टेमिक इंश्योरेंस' की दरकार

– राकेश जैन, सीईओ, इंडसइंड जनरल इंश्योरेंस

अब जब हम मई 2026 के दौर से गुज़र रहे हैं, तो भीषण गर्मी (हीटवेव) कोई कभी-कभार आने वाली मुसीबत नहीं रह गई है। यह एक ऐसे स्थायी आर्थिक खतरे का रूप ले रही है जो न केवल आम परिवारों की आमदनी को खोखला कर रहा है, बल्कि अब बीमा कंपनियों के खातों (बैलेंस शीट) पर भी भारी पड़ने लगा है।

यह खतरा कितना बड़ा है, यह अब साफ दिखने लगा है। भारत में 2025 के शुरुआती नौ महीनों में खराब मौसम के कारण 4,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई, जो पिछले चार सालों की तुलना में लगभग 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। 2025 का फरवरी का महीना पिछले 124 सालों में सबसे गर्म रहा, जबकि राजस्थान के कुछ हिस्सों में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया। और मौजूदा दौर की बात करें, तो भारत मौसम विज्ञान विभाग ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि इस बार की गर्मी देश के बड़े हिस्से में सामान्य से ज़्यादा और लंबे समय तक चलने वाली होगी।

मौत के आंकड़ों में छिपा गर्मी का प्रकोप

फिर भी, ये आंकड़े असली असर को पूरी तरह नहीं दिखाते। गर्मी शायद ही कभी मौत की सीधी वजह के रूप में सामने आती है। यह अक्सर हार्ट अटैक, किडनी फेल होने या सांस लेने में दिक्कत जैसी बीमारियों के रूप में सामने आती है, जिससे मौत के आंकड़ों में इसका असली रोल छिप जाता है। 'एनवायरनमेंट इंटरनेशनल' में छपे एक अध्ययन के मुताबिक, भीषण गर्मी वाले दिनों में रोज़ होने वाली मौतों में 14.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाती है। इसके कारण भारत के बड़े शहरों में हर साल 1,100 से ज़्यादा अतिरिक्त मौतें होती हैं। यानी असली नुकसान सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा बड़ा है।

अगर इंसानी जान के नुकसान को पूरी तरह नहीं दिखाया जा रहा, तो आर्थिक नुकसान को तो झुठलाया ही नहीं जा सकता। 'द लैंसेट काउंटडाउन' के अनुमान के मुताबिक, सिर्फ 2024 में भीषण गर्मी की वजह से भारत ने काम के 247 अरब घंटे खो दिए, जो प्रति व्यक्ति लगभग 420 घंटे के बराबर है। इससे करीब 194 अरब डॉलर की कमाई का नुकसान हुआ, जो देश की जीडीपी का लगभग 5 प्रतिशत है। इसका सबसे ज़्यादा (करीब दो-तिहाई) असर खेती पर पड़ा, जिसके बाद कंस्ट्रक्शन (भवन निर्माण) और शहरों के अनौपचारिक (मजदूरी वाले) क्षेत्र प्रभावित हुए।

हीटवेव - सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान पहुँचाने वाला खतरा

एक ऐसे देश के लिए जहाँ लगभग 75 प्रतिशत कामकाजी लोग गर्मी में काम करते हैं और 2030 तक 3.4 करोड़ (34 मिलियन) नौकरियों पर खतरा है, यह कोई भविष्य की बात नहीं है। यह आज का आर्थिक संकट है। इस दशक के अंत तक, गर्मी भी बाढ़ और चक्रवात (तूफान) की तरह भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान पहुँचाने वाला खतरा बन सकती है।

घरेलू स्तर पर हीटवेव धीरे-धीरे लेकिन लगातार आर्थिक झटका देती है। दोपहर की भीषण गर्मी के कारण यदि किसी निर्माण मजदूर को काम रोकना पड़े, तो उसकी एक दिन की मजदूरी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खत्म हो सकता है। इसी तरह, सड़क किनारे सामान बेचने वाले छोटे दुकानदारों को भी कई घंटों तक दुकान बंद रखनी पड़ती है, जिससे उनकी पहले से ही सीमित कमाई और घट जाती है। करोड़ों असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए हीटवेव केवल स्वास्थ्य का खतरा नहीं है, बल्कि उनकी रोज़ की आय पर सीधा असर डालने वाला संकट है। ये ऐसी आपदाएं नहीं हैं जो सुर्खियां बनती हों, लेकिन इनसे होने वाला लगातार आर्थिक नुकसान परिवारों की वित्तीय मजबूती को धीरे-धीरे कमजोर करता रहता है।

यहीं पर बीमा सुरक्षा की बड़ी कमी साफ दिखाई देती है। भारत में जलवायु परिवर्तन से होने वाले लगभग 93 प्रतिशत आर्थिक नुकसान का कोई बीमा नहीं है। हीटवेव के मामले में यह अंतर और भी अधिक है, क्योंकि इससे होने वाला नुकसान कई रूपों में और अप्रत्यक्ष तरीके से होता है। इलाज का कुछ खर्च बीमा से कवर हो सकता है, लेकिन आय में होने वाला नुकसान, जो कुल आर्थिक क्षति का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, अब भी बीमा के दायरे से बाहर है।

बीमा कंपनियों को मिल रहे शुरुआती संकेत

साथ ही, बीमा उद्योग में इसके संकेत भी दिखने लगे हैं। स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के अनुसार, गर्मियों के सबसे अधिक गर्म महीनों में हीट स्ट्रेस से जुड़ी बीमारियों, जैसे डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी), इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, किडनी संबंधी समस्याएं और हृदय संबंधी घटनाओं के दावों (क्लेम) में मौसमी तौर पर 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है। यह कोई अस्थायी स्थिति नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रहे ऐसे जोखिम के शुरुआती संकेत हैं, जिन्हें अब बीमा उद्योग नजरअंदाज नहीं कर सकता।

अब सवाल यह नहीं रह गया है कि हीटवेव का जोखिम है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या बीमा उद्योग इस जोखिम से निपटने के लिए तैयार है।

इसके लिए बीमा क्षेत्र को अपनी सोच और कार्यप्रणाली में बड़े बदलाव करने होंगे। बीमा उत्पादों में हीटवेव से होने वाली बीमारियों को स्पष्ट रूप से शामिल करना होगा और आपात स्थिति में बिना किसी परेशानी के कैशलेस इलाज की सुविधा सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, बीमा जोखिम का आकलन (अंडरराइटिंग) इस तरह किया जाना चाहिए कि अलग-अलग क्षेत्रों और व्यवसायों के जोखिम को सही ढंग से समझा जा सके। उदाहरण के लिए, पश्चिमी और मध्य भारत में काम करने वाले श्रमिकों का जोखिम ठंडे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की तुलना में कहीं अधिक है।

हेल्थ इंश्योरेंस और नए समाधानों की ज़रूरत

हेल्थ इंश्योरेंस इसमें एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। उसे गर्मी के कारण अस्पताल में भर्ती होने, ओपीडी (बिना भर्ती हुए इलाज) और इमरजेंसी सपोर्ट के दायरे को बढ़ाना चाहिए, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बिना किसी आर्थिक तनाव के तुरंत इलाज मिल सके।

इसी के साथ, 'पैरामेट्रिक इंश्योरेंस' (Parametric Insurance - तापमान आधारित बीमा) को बड़े पैमाने पर शुरू करना बेहद ज़रूरी है। इस मॉडल में, जैसे ही तापमान या गर्मी एक तय सीमा को पार करती है, वैसे ही तुरंत पैसा (क्लेम) मिल जाता हैइसमें क्लेम पास कराने की लंबी और जटिल प्रक्रिया की ज़रूरत नहीं होती। अनौपचारिक मजदूरों और छोटे कारोबारियों के लिए, समय पर मिलने वाली छोटी सी रकम भी उनकी कमाई को टूटने से बचा सकती है और उन्हें मजबूरी में कर्ज़ लेने से रोक सकती है। इन योजनाओं को कंपनियों, गिग प्लेटफॉर्म्स (जैसे डिलीवरी या राइड-शेयरिंग ऐप्स) और सरकारी स्कीमों के ज़रिए लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। जलवायु से जुड़े बीमा के शुरुआती प्रयोगों (पायलट्स) ने इस संभावना को साबित भी किया है।

आगे की राह और चुनौती

अब सरकारी नीतियों में भी बदलाव दिख रहा है। राज्यों में 'हीट एक्शन प्लान' (गर्मी से निपटने की योजनाएं) बढ़ाए जा रहे हैं और सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों को तैयार किया जा रहा है। लेकिन सिर्फ बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) उस आर्थिक झटके को नहीं झेल सकता, जो पहले से ही हर साल अरबों डॉलर का हो रहा है। बीमा क्षेत्र के पास इस संकट में आगे आने की क्षमता भी है और ज़िम्मेदारी भी।

यहाँ दांव पर सिर्फ आम परिवार ही नहीं लगे हैं। लगातार पड़ने वाली भीषण गर्मी का असर मजदूरों की काम करने की क्षमता (प्रोडक्टिविटी), सप्लाई चेन, बाज़ार में मांग और आखिरकार पूरे देश की आर्थिक तरक्की पर पड़ेगा। समय के साथ, यह देश की जीडीपी (GDP) की रफ्तार को धीमा कर सकता है।

अब वक़्त है बदलाव का

बीमा कंपनियों के लिए यह बदलाव का एक साफ मोड़ है। जलवायु का खतरा अब कोई भविष्य की बात नहीं है; यह आज ही बीमा के कारोबार को बदल रहा है। जो कंपनियाँ इसका जल्द समाधान ढूंढेंगी, वे न केवल जोखिम का बेहतर प्रबंधन करेंगी, बल्कि इनोवेशन और ग्रोथ के नए रास्ते भी खोलेंगी।

आने वाले दशक में गर्मी, भारत के आर्थिक परिदृश्य में सबसे बड़े और सबसे कम आंके गए खतरों में से एक बनने जा रही है। इसे नज़रअंदाज़ करना अब कोई विकल्प नहीं है। बीमा क्षेत्र को आपदा आने के बाद कदम उठाने के बजाय, उसके आने से पहले की तैयारी करनी होगी। गर्म होते भारत में, देरी करने की कीमत सिर्फ ज़्यादा क्लेम चुकाना नहीं होगी, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था की आर्थिक मजबूती को धीरे-धीरे खत्म कर देगी।

 

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