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मध्य प्रदेश में पदोन्नति प्रक्रिया फिर होगी शुरू, सरकार ने सभी विभागों को दिए तैयारी के निर्देश
मध्य प्रदेश
सामान्य प्रशासन विभाग ने महाधिवक्ता की कानूनी राय के आधार पर सभी विभागों को पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए, हालांकि सभी प्रमोशन अदालत के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगे।
मध्य प्रदेश के लाखों सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए लंबे इंतजार के बाद राहत भरी खबर सामने आई है। करीब एक दशक से विभिन्न कानूनी कारणों और न्यायालय में लंबित मामलों के चलते रुकी हुई पदोन्नति (प्रमोशन) प्रक्रिया अब दोबारा शुरू होने की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने सोमवार को राज्य के सभी अपर मुख्य सचिवों, विभागाध्यक्षों, संभागायुक्तों और कलेक्टरों को पत्र जारी कर पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। विभागों को यह कार्रवाई महाधिवक्ता की कानूनी राय के आधार पर करने के लिए कहा गया है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि दिए जाने वाले सभी प्रमोशन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। राज्य सरकार के इस फैसले को लंबे समय से प्रमोशन की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। कई विभागों में वर्षों से पदोन्नति नहीं होने के कारण अधिकारी एक ही पद पर लंबे समय से कार्यरत हैं। इसका असर न केवल कर्मचारियों के करियर पर पड़ा, बल्कि विभागों की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। अब सरकार के ताजा निर्देशों के बाद विभागीय स्तर पर पदोन्नति समितियों (DPC) की बैठकें बुलाने की तैयारी शुरू होने की संभावना है।
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी पत्र में बताया गया है कि मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 को लेकर न्यायालय में कई याचिकाएं लंबित हैं। इन मामलों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने महाधिवक्ता से कानूनी राय प्राप्त की थी। महाधिवक्ता ने वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन की राय सरकार को भेजी, जिसके आधार पर विभागों को आगे की कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए हैं। कानूनी राय में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में हाईकोर्ट ने पदोन्नति नियम-2025 पर किसी प्रकार की अंतरिम रोक (स्टे) नहीं लगाई है। पहले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रमोशन नहीं करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन वह न्यायालय के आदेश का हिस्सा नहीं था और न ही किसी आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए जाएगा। ऐसे में सरकार अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए पदोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।
हालांकि कानूनी राय में यह भी कहा गया है कि सभी पदोन्नतियां न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी। इसका मतलब यह है कि यदि भविष्य में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अलग आता है, तो सरकार को उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई करनी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य एक ओर प्रशासनिक कार्यों को सुचारु बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान भी सुनिश्चित करना है। सरकार ने अपने पक्ष में यह भी कहा है कि लंबे समय से प्रमोशन नहीं होने के कारण कई महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। अनेक विभाग अपनी स्वीकृत क्षमता के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं। वरिष्ठ पद रिक्त होने से निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और निचले स्तर पर नई भर्तियां भी समय पर नहीं हो पा रही हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।
यदि पदोन्नति प्रक्रिया समय पर पूरी होती है तो इसका सकारात्मक असर पूरे प्रशासनिक ढांचे पर दिखाई देगा। वरिष्ठ पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति होने से विभागों की कार्यक्षमता बढ़ेगी और खाली पदों पर नई भर्ती का रास्ता भी साफ होगा। इससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी बन सकते हैं। राज्य के कर्मचारी संगठनों ने भी सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि कई अधिकारी और कर्मचारी पिछले आठ से दस वर्षों से प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। पदोन्नति नहीं मिलने के कारण न केवल उनका वेतन और सेवा लाभ प्रभावित हुए, बल्कि मनोबल पर भी असर पड़ा। संगठनों का कहना है कि यदि न्यायालय की शर्तों का पालन करते हुए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो इससे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब सभी विभागों की नजर सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के बाद होने वाली विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकों पर रहेगी। माना जा रहा है कि विभाग अपने-अपने स्तर पर पात्र कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची, सेवा अभिलेख और अन्य आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण शुरू करेंगे। इसके बाद डीपीसी की अनुशंसा के आधार पर पदोन्नति आदेश जारी किए जा सकते हैं। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी आदेश न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। यदि भविष्य में अदालत कोई अलग निर्देश देती है तो उसी के अनुसार संशोधित कार्रवाई की जाएगी। इसलिए कर्मचारियों को प्रमोशन मिलने के बावजूद अंतिम कानूनी स्थिति का इंतजार करना पड़ सकता है।
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मध्य प्रदेश में पदोन्नति प्रक्रिया फिर होगी शुरू, सरकार ने सभी विभागों को दिए तैयारी के निर्देश
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश के लाखों सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए लंबे इंतजार के बाद राहत भरी खबर सामने आई है। करीब एक दशक से विभिन्न कानूनी कारणों और न्यायालय में लंबित मामलों के चलते रुकी हुई पदोन्नति (प्रमोशन) प्रक्रिया अब दोबारा शुरू होने की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने सोमवार को राज्य के सभी अपर मुख्य सचिवों, विभागाध्यक्षों, संभागायुक्तों और कलेक्टरों को पत्र जारी कर पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। विभागों को यह कार्रवाई महाधिवक्ता की कानूनी राय के आधार पर करने के लिए कहा गया है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि दिए जाने वाले सभी प्रमोशन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। राज्य सरकार के इस फैसले को लंबे समय से प्रमोशन की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। कई विभागों में वर्षों से पदोन्नति नहीं होने के कारण अधिकारी एक ही पद पर लंबे समय से कार्यरत हैं। इसका असर न केवल कर्मचारियों के करियर पर पड़ा, बल्कि विभागों की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। अब सरकार के ताजा निर्देशों के बाद विभागीय स्तर पर पदोन्नति समितियों (DPC) की बैठकें बुलाने की तैयारी शुरू होने की संभावना है।
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी पत्र में बताया गया है कि मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 को लेकर न्यायालय में कई याचिकाएं लंबित हैं। इन मामलों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने महाधिवक्ता से कानूनी राय प्राप्त की थी। महाधिवक्ता ने वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन की राय सरकार को भेजी, जिसके आधार पर विभागों को आगे की कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए हैं। कानूनी राय में स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में हाईकोर्ट ने पदोन्नति नियम-2025 पर किसी प्रकार की अंतरिम रोक (स्टे) नहीं लगाई है। पहले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रमोशन नहीं करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन वह न्यायालय के आदेश का हिस्सा नहीं था और न ही किसी आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए जाएगा। ऐसे में सरकार अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए पदोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।
हालांकि कानूनी राय में यह भी कहा गया है कि सभी पदोन्नतियां न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी। इसका मतलब यह है कि यदि भविष्य में हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अलग आता है, तो सरकार को उसी के अनुरूप आगे की कार्रवाई करनी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य एक ओर प्रशासनिक कार्यों को सुचारु बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान भी सुनिश्चित करना है। सरकार ने अपने पक्ष में यह भी कहा है कि लंबे समय से प्रमोशन नहीं होने के कारण कई महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। अनेक विभाग अपनी स्वीकृत क्षमता के मुकाबले लगभग 40 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं। वरिष्ठ पद रिक्त होने से निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और निचले स्तर पर नई भर्तियां भी समय पर नहीं हो पा रही हैं। इससे प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।
यदि पदोन्नति प्रक्रिया समय पर पूरी होती है तो इसका सकारात्मक असर पूरे प्रशासनिक ढांचे पर दिखाई देगा। वरिष्ठ पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति होने से विभागों की कार्यक्षमता बढ़ेगी और खाली पदों पर नई भर्ती का रास्ता भी साफ होगा। इससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी बन सकते हैं। राज्य के कर्मचारी संगठनों ने भी सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि कई अधिकारी और कर्मचारी पिछले आठ से दस वर्षों से प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। पदोन्नति नहीं मिलने के कारण न केवल उनका वेतन और सेवा लाभ प्रभावित हुए, बल्कि मनोबल पर भी असर पड़ा। संगठनों का कहना है कि यदि न्यायालय की शर्तों का पालन करते हुए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो इससे कर्मचारियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब सभी विभागों की नजर सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के बाद होने वाली विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकों पर रहेगी। माना जा रहा है कि विभाग अपने-अपने स्तर पर पात्र कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची, सेवा अभिलेख और अन्य आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण शुरू करेंगे। इसके बाद डीपीसी की अनुशंसा के आधार पर पदोन्नति आदेश जारी किए जा सकते हैं। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी आदेश न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। यदि भविष्य में अदालत कोई अलग निर्देश देती है तो उसी के अनुसार संशोधित कार्रवाई की जाएगी। इसलिए कर्मचारियों को प्रमोशन मिलने के बावजूद अंतिम कानूनी स्थिति का इंतजार करना पड़ सकता है।
