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महिला सैन्य अफसरों को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी राहत: स्थायी कमीशन और पेंशन का अधिकार बहाल
नेशनल न्यूज
कोर्ट ने कहा—महिलाओं को परमानेंट कमीशन से वंचित करना भेदभाव, केंद्र को पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सेना में महिला अधिकारियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि आर्मी, नेवी और एयर फोर्स में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला अफसरों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) से वंचित करना व्यवस्था में मौजूद भेदभाव का परिणाम था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह उनकी योग्यता की कमी नहीं, बल्कि मूल्यांकन प्रक्रिया की खामियों का नतीजा था।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जवल भुईयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने निर्देश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को मनमाने या गलत आकलन के कारण स्थायी कमीशन नहीं मिला, उन्हें अब पूर्ण पेंशन का लाभ दिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी माना कि इन अधिकारियों की न्यूनतम 20 वर्ष की सेवा पूरी मानी जाएगी, भले ही वे पहले ही सेवा से बाहर हो चुकी हों।
फैसले में केंद्र सरकार को भविष्य के लिए स्पष्ट और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि मूल्यांकन के सभी मानदंड पहले से बताए जाने चाहिए, ताकि किसी भी तरह का पूर्वाग्रह या भेदभाव न हो।
यह मामला महिला अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें 2019 की सरकारी नीति और सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के फैसलों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्थायी कमीशन से वंचित किया गया।
कोर्ट ने अपने आदेश में तीन प्रमुख राहतें दीं। पहली, जिन अधिकारियों को पहले ही स्थायी कमीशन मिल चुका है, उनका दर्जा बरकरार रहेगा। दूसरी, जो महिला अफसर इस दौरान सेवा से बाहर हो गईं, उन्हें 20 साल की सेवा पूर्ण मानते हुए पेंशन और अन्य लाभ दिए जाएंगे, हालांकि एरियर नहीं मिलेगा। तीसरी, वर्तमान में सेवा में कार्यरत महिला अधिकारियों को निर्धारित मानदंड पूरा करने पर स्थायी कमीशन का अवसर मिलेगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि कई मामलों में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) इस धारणा के साथ तैयार की गई थी कि महिलाओं को आगे स्थायी भूमिका नहीं दी जाएगी। इससे उनकी मेरिट प्रभावित हुई और वे पुरुष अधिकारियों की तुलना में पीछे रह गईं।
यह मामला लंबे समय से न्यायालय में लंबित था। वर्ष 2003 में पहली बार इस मुद्दे को अदालत में उठाया गया था और 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला अधिकारियों के पक्ष में फैसला दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने 2019 में नई नीति बनाई, लेकिन उसमें कुछ सीमाएं जोड़ दी गईं, जिन पर विवाद जारी रहा।
कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले को महिला सशक्तिकरण और समान अवसर की दिशा में बड़ा कदम बताया है। उनका मानना है कि इससे सेना में लैंगिक समानता को मजबूती मिलेगी और भविष्य में चयन प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष हो सकेगी।
फिलहाल, यह फैसला न केवल पूर्व महिला अधिकारियों को राहत देता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
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महिला सैन्य अफसरों को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी राहत: स्थायी कमीशन और पेंशन का अधिकार बहाल
नेशनल न्यूज
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सेना में महिला अधिकारियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि आर्मी, नेवी और एयर फोर्स में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला अफसरों को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) से वंचित करना व्यवस्था में मौजूद भेदभाव का परिणाम था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह उनकी योग्यता की कमी नहीं, बल्कि मूल्यांकन प्रक्रिया की खामियों का नतीजा था।
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जवल भुईयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने निर्देश दिया कि जिन महिला अधिकारियों को मनमाने या गलत आकलन के कारण स्थायी कमीशन नहीं मिला, उन्हें अब पूर्ण पेंशन का लाभ दिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी माना कि इन अधिकारियों की न्यूनतम 20 वर्ष की सेवा पूरी मानी जाएगी, भले ही वे पहले ही सेवा से बाहर हो चुकी हों।
फैसले में केंद्र सरकार को भविष्य के लिए स्पष्ट और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि मूल्यांकन के सभी मानदंड पहले से बताए जाने चाहिए, ताकि किसी भी तरह का पूर्वाग्रह या भेदभाव न हो।
यह मामला महिला अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा था, जिनमें 2019 की सरकारी नीति और सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के फैसलों को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और पूर्वाग्रह के चलते उन्हें स्थायी कमीशन से वंचित किया गया।
कोर्ट ने अपने आदेश में तीन प्रमुख राहतें दीं। पहली, जिन अधिकारियों को पहले ही स्थायी कमीशन मिल चुका है, उनका दर्जा बरकरार रहेगा। दूसरी, जो महिला अफसर इस दौरान सेवा से बाहर हो गईं, उन्हें 20 साल की सेवा पूर्ण मानते हुए पेंशन और अन्य लाभ दिए जाएंगे, हालांकि एरियर नहीं मिलेगा। तीसरी, वर्तमान में सेवा में कार्यरत महिला अधिकारियों को निर्धारित मानदंड पूरा करने पर स्थायी कमीशन का अवसर मिलेगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि कई मामलों में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) इस धारणा के साथ तैयार की गई थी कि महिलाओं को आगे स्थायी भूमिका नहीं दी जाएगी। इससे उनकी मेरिट प्रभावित हुई और वे पुरुष अधिकारियों की तुलना में पीछे रह गईं।
यह मामला लंबे समय से न्यायालय में लंबित था। वर्ष 2003 में पहली बार इस मुद्दे को अदालत में उठाया गया था और 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने महिला अधिकारियों के पक्ष में फैसला दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने 2019 में नई नीति बनाई, लेकिन उसमें कुछ सीमाएं जोड़ दी गईं, जिन पर विवाद जारी रहा।
कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले को महिला सशक्तिकरण और समान अवसर की दिशा में बड़ा कदम बताया है। उनका मानना है कि इससे सेना में लैंगिक समानता को मजबूती मिलेगी और भविष्य में चयन प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष हो सकेगी।
फिलहाल, यह फैसला न केवल पूर्व महिला अधिकारियों को राहत देता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
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